ताज़ा खबर
 

राजनीतिः एक विकार का नाम है सेल्फी

यह विडंबना ही है कि आज जिस समाज में एक व्यक्ति अपने पड़ोसी को ही नहीं जानता-पहचानता है, वह अपनी सेल्फी के जरिये पूरी दुनिया की तारीफ (लाइक्स) पा लेना चाहता है। लेकिन यह मामला सिर्फ झूठी तारीफ पाने या दिखावे का डिजिटल प्रबंध करने मात्र का नहीं है बल्कि इसके कई सामाजिक और कानूनी पहलू भी हैं जिन पर अब गौर किया जाना चाहिए।

Author January 3, 2018 02:48 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

मनीषा सिंह

ऐसे वक्त में जबकि देश में हर दूसरा स्मार्टफोन ‘सेल्फी एक्सपर्ट’ बता कर बेचा जा रहा हो, यह पता चले कि दुनिया में सेल्फी के कारण एक नई बीमारी ‘सेल्फाइटिस’ ने जन्म ले लिया है, तो दिल बेचैन हो उठता है। इस जानकारी के अलावा यह तथ्य भी भारतीयों को परेशान करने वाला है कि सेल्फी के कारण सबसे ज्यादा मौतें हमारे ही देश में हो रही हैं। स्मार्टफोन के रूप में हमारे देश में तकनीक तेजी से बढ़ रही है, वह ज्यादा से ज्यादा हाथों में पहुंच रही है, लेकिन जिस तरह से लोग इसी तकनीक के हाथों गुलाम बनते जा रहे हैं, वह हमारे भविष्य के लिए खतरनाक है।

लंदन के नॉटिंघम ट्रेंट विश्वविद्यालय और तमिलनाडु के त्यागराज स्कूल आॅफ मैनेजमेंट के साझा अध्ययन का निष्कर्ष है कि दिन भर में तीन से ज्यादा सेल्फी लेने वाला शख्स ‘सेल्फाइटिस’ नामक नई बीमारी का शिकार है। यह शोध ‘इंटरनेशनल जर्नल आॅफ मेंटल हेल्थ एंड एडिक्शन’ में प्रकाशित किया गया है। इसमें कहा गया है कि सेल्फी से जुड़े इस ‘डिसआॅर्डर’ सेल्फाइटिस से ग्रसित लोग अपना आत्मविश्वास बढ़ाने, अपना मूड ठीक करने, अपनी यादें संजोने, अपना प्रचार करने और खुद को दूसरों से आगे दिखाने के उद््देश्य से बार-बार सेल्फी खींचते रहते हैं। ऐसा करने वालों की आदतें एक हद तक नशेड़ियों की तरह होती हैं, जिन्हें अपने किए का कोई होश नहीं रहता। हालांकि सेल्फी को बीमारी घोषित करने वाला यह अपने किस्म का पहला शोध था, पर सेल्फी पर पहले भी कई रिपोर्टें आ चुकी हैं और उनके आधार पर चेतावनियां भी जारी की जा चुकी हैं। इनमें सबसे घातक समस्या सेल्फी लेते समय किसी दुर्घटना का शिकार हो जाना है, जो तमाम सतर्कताएं बरतने के बावजूद जस की तस बनी हुई है। इसी साल, कार्नेड मेलन विश्वविद्यालय और इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट आॅफ दिल्ली ने एक रिपोर्ट ‘मी माइसेल्फ एंड माइकिल्फी’ नाम से जारी की थी, जिसमें बताया गया था कि मार्च 2014 से सितंबर 2016 के बीच पूरी दुनिया में सेल्फी लेते वक्त असावधानी के कारण 127 मौतें हुर्इं, जिनमें से आधे से ज्यादा यानी 72 मौतें अकेले भारत में हुर्इं।

समुद्री किनारों पर तेज लहरों के बीच, रेल पटरियों के पास ट्रेन गुजरते वक्त, किसी ऊंची इमारत की छत पर, किसी ऊंची पहाड़ी के गहरी खाई वाले किनारे पर सेल्फी लेते समय दर्जनों हादसे देश में हो चुके हैं, पर शायद ये घटनाएं हमारे समाज को कोई सबक नहीं दे पाई हैं। मनोविज्ञान कहता है कि मोबाइल कैमरे से ली जाने वाली सेल्फी दरअसल व्यक्ति के अहंकार का प्रदर्शन प्रस्तुत करती है। लगता है, सेल्फियां आत्ममुग्धता के ऐसे हिंसक मोड़ तक पहुंच गई हैं, जहां लोगों को अपनी या दूसरों की जान के बजाय इसकी फिक्र ज्यादा है कि सेल्फी लेने का कोई अपूर्व, दुर्लभ और रोमांचक, सनसनी पैदा करने वाला बेहद खतरनाक मौका उनसेछूट न जाए। खासतौर से युवा पीढ़ी सेल्फी-विशेषज्ञ स्मार्टफोन पर हजारों रुपए फूंकने के बाद जोखिम वाली सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर अपने लिए ढेरों लाइक बटोर लेना चाहती है।

कहने को सेल्फी का इतिहास सदियों पुराना बताया जाता है, दावा है कि 1838 में अमेरिका में फिलाडेलफिया के फोटोग्राफी के एक शौकीन दवा विक्रेता रॉबर्ट कॉर्नेलियस ने अपनी तस्वीर को खुद ही अपने कैमरे में कैद किया था। यह दुनिया की पहली सेल्फी थी। पर करीब दो सदी पहले की इस घटना से दुनिया में सेल्फी खींचने का चलन नहीं हुआ। यह तो एकदम हाल की यानी करीब पांच साल पहले शुरू हुई परिघटना है। दावा है कि वर्ष 2013 से सेल्फी-युग की शुरुआत मानी जा सकती है, जब एक ही साल में करोड़ों सेल्फियां खींच डाली गई थीं। उस साल दुनिया में 23.80 करोड़ सेल्फी खींच कर फेसबुक पर अपलोड की गई थीं। यह आंकड़ा ऐसे मामलों पर नजर रखने वाली एक संस्था- सिम्प्लीफाई360 ने जारी किया था। सोशल मीडिया के दूसरे मंचों को इसमें जोड़ा जाए तो आंकड़ा कई गुना ज्यादा हो सकता है। अब तो हालत यह है कि व्यक्ति सोते-जागते अपनी हर गतिविधि की सेल्फी खींच कर उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित कर देना चाहता है। यह विडंबना ही है कि आज जिस समाज में एक व्यक्ति अपने पड़ोसी को ही नहीं जानता-पहचानता है, वह अपनी सेल्फी के जरिये पूरी दुनिया की तारीफ (लाइक्स) पा लेना चाहता है। लेकिन यह मामला सिर्फ झूठी तारीफ पाने या दिखावे का डिजिटल प्रबंध करने मात्र का नहीं है बल्कि इसके कई सामाजिक और कानूनी पहलू भी हैं जिन पर अब गौर किया जाना चाहिए।

आम तौर पर सेल्फी इसलिए खींची जाती है कि उसके जरिये लोग सोशल मीडिया के किसी मंच पर किसी अनोखे मौके पर खुद की तस्वीर (सेल्फी) को इस आशय के साथ पेश कर सकें ताकि दूसरे लोग उसे साझा करें, और झूठ ही सही, लेकिन उसकी तारीफ करें। सेल्फी से जुड़े अध्ययनों के अनुसार किशोरियां और युवतियां हर हफ्ते कम से कम पांच घंटे सेल्फी खींचने में बिताती हैं। इनमें से 27 फीसद लड़कियों ने स्वीकार किया है कि अगर उन्हें सेल्फी पर तारीफ (लाइक) नहीं मिलती है, तो वे उस सेल्फी को सोशल मीडिया से हटा देती हैं। दुनिया में जब से मोबाइल क्रांति हुई है और जब से फेसबुक-ट्विटर-इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के तौर-तरीके अस्तित्व में आए हैं, लोगों में दिखावा करने की यह प्रवृत्ति आसमान पर पहुंच गई है।

अमेरिका के हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में किया गया एक अध्ययन बताता है कि सत्तर फीसद अमेरिकी सुबह उठ कर अपने परिजनों की खैर-खबर लेने के बजाय सबसे पहले अपना मोबाइल फोन उठा कर यह देखते हैं कि जब वे सो रहे थे, तो उस दौरान कितने लोगों ने सोशल मीडिया पर डाली गई उनकी सेल्फियों को कितने लाइक्स दिए या कमेंट किए। इस बारे में एक सर्वेक्षण ‘फीलिंग यूनीक डॉट कॉम’ नामक वेबसाइट ने किया है, जिसके अनुसार सेल्फी की दीवानगी एक मानसिक विकार के रूप में सामने आ रही है। अमेरिका का साइकेटिक एसोसिएशन भी सेल्फी खींचने के चलन को ‘मेंटल डिसआॅर्डर’ घोषित कर चुका है। भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने भी इसे एक समस्या करार दिया है और सेल्फी खींचते रहने वालों को सचेत करते हुए उनमें मानसिक बीमारी के लक्षणों की मौजूदगी की बात कही है।

सोशल मीडिया के जिस आभासी संसार में हजारों दोस्त होने के बावजूद एक भी अपना सच्चा दोस्त नहीं होता, उन्हें रिझाने या उन पर अपना रौब डालने के लिए लोग अपने निजी संसार को खोल कर सामने रख देना चाहते हैं। इसके लिए वे न तो जगह देखते हैं, न मौका और न ही इसके लिए उन्हें दूसरों को हो रही तकलीफ नजर आती है। सेल्फी के रूप में दिखावे और आत्म-प्रचार की यह प्रवृत्ति कुछ लोगों को थोड़ी देर के लिए दूसरों के मुकाबले मुकाबले श्रेष्ठ होने का क्षणिक अहसास भले ही करा दे, लेकिन बाद में इसके काफी अधिक कुप्रभाव दिखाई पड़ते हैं और अंतत: यह सनक एक बीमारी और सामाजिक समस्या के रूप में ही प्रकट होती है। ऐसे में सवाल है कि क्या अब हमारे देश और समाज को सेल्फी की आचारसंहिता के बारे में विचार नहीं करना चाहिए। क्या लोगों को इस बारे में सचेत नहीं किया जाना चाहिए कि वे कब और किस मौके, स्थान पर सेल्फी लें और ऐसा करते वक्त क्या-क्या सावधानियां बरतें। स्मार्टफोन निर्माताओं को भी यह हिदायत देने की जरूरत है कि वे अब अपने फोन सेल्फी-एक्सपर्ट कह कर न बेचें, तो बेहतर होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App