Opinion about Search for life values, ozone layer loss effects & Environment - Jansatta
ताज़ा खबर
 

राजनीतिः जीवन मूल्यों की खोज

आज दुनिया को एक ऐसे वैकल्पिक रास्ते की तलाश है जिसमें सभी लोग पर्यावरण को संकट में डाले बिना अपनी रोजी-रोटी प्राप्त कर सकें, जिसमें न तो हिंसा रहे तथा न ही हिंसा के कारण रहें। इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए मनुष्य के अन्य मनुष्यों, जीव-जंतुओं व प्रकृति के साथ जो संबंध हैं, उनमें आधिपत्य की भावना को समूल हटाया जाए।

Author December 2, 2017 2:42 AM
आज की दुनिया की हकीकत यह है कि एक ओर प्रतिवर्ष एक करोड़ बच्चों की मृत्यु गरीबी के कारण होती है, तथा दूसरी ओर गांवों में दो वक्त की रोटी न मिलने के कारण लाखों परिवारों को बिछुड़ना पड़ता है।

भारत डोगरा

एक बहुत विकट स्थिति विश्व के सामने है। चुनौतियां बहुत बड़ी हैं, पर उनका सामना करने के प्रयास नहीं हो पा रहे हैं। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने तो अपनी स्पष्ट राय दे दी है कि जलवायु बदलाव व उससे जुड़े पर्यावरण के अन्य संकट हों या महाविनाशक हथियार हों, जीवन के अस्तित्व मात्र को खतरे में डालने वाले संकट अब धरती पर उपस्थित हैं। इन चेतावनियों की गंभीरता पर व्यापक सहमति के बावजूद इनके समाधान के उचित उपाय नहीं हो पा रहे हैं। एक बड़ी वजह यह है कि इन बड़ी जिम्मेदारियों को संभालने के लिए जो बड़े जन-अभियान चाहिए, जो व्यापक समझ व एकजुटता चाहिए उसके अनुकूल जीवन-मूल्य ही अब व्यापक स्तर पर नजर नहीं आ रहे हैं। क्या इन जीवन-मूल्यों की तलाश में हम इतिहास के पृष्ठों से कुछ सीख सकते हैं, कोई बड़ी प्रेरणा वहां से प्राप्त कर सकते हैं?

आज की दुनिया की हकीकत यह है कि एक ओर प्रतिवर्ष एक करोड़ बच्चों की मृत्यु गरीबी के कारण होती है, तथा दूसरी ओर गांवों में दो वक्त की रोटी न मिलने के कारण लाखों परिवारों को बिछुड़ना पड़ता है। यह एक ऐसी दुनिया है जिसकी विषमता की जड़ों से तरह-तरह की हिंसा फूट रही है। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद भी यह दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी नजर आती है। जीवन के अस्तित्व को खतरा केवल अणु हथियारों के भंडार से नहीं है, पर्यावरण का गहराता संकट भी तो नित्य नए खतरे और बीमारियां उत्पन्न कर रहा है, जैसे ओजोन परत के लुप्त होने से त्वचा कैंसर का खतरा, सूर्य की किरणों के द्वारा, जो हमेशा हमारे लिए जीवनदायिनी रही हैं। आज दुनिया को एक ऐसे वैकल्पिक रास्ते की तलाश है जिसमें सभी लोग पर्यावरण को संकट में डाले बिना संतोषजनक ढंग से अपनी रोजी-रोटी प्राप्त कर सकें, जिसमें सभी मनुष्यों और जीव-जंतुओं के प्रति करुणा का भाव हो तथा जहां तक संभव हो, न तो हिंसा रहे तथा न ही हिंसा के कारण रहें। इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए सबसे बुनियादी बात यह है कि मनुष्य के अन्य मनुष्यों के साथ, अन्य जीव-जंतुओं के साथ व प्रकृति के साथ जो संबंध हैं, उनमें आधिपत्य की भावना को समूल हटाया जाए व उसके स्थान पर सह-अस्तित्व की भावना को इन संबंधों का आधार बनाया जाए।

निश्चय ही यह एक कठिन चुनौती है और गहरे आध्यात्मिक और नैतिक प्रयासों के बिना इस रास्ते पर आगे बढ़ना कठिन है। क्या विकास के इस वैकल्पिक रास्ते की तलाश करने में, उसे एक व्यावहारिक रूप देने में हमारे देश की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है? क्या इस सिद्धांत को जनसाधारण के सामने ऐसे रूप में रखा जा सकता है कि अपनी बहुत-सी समस्याओं के व्यावहारिक और स्थायी हल के रूप में तथा दुनिया को एक नई राह दिखाने के रूप में भी वे इससे प्रेरित हों तथा इसके लिए एक होकर, जी-जान से मेहनत करें?
वैसे तो दुनिया के किसी भी देश में ऐसे प्रयास हो सकते हैं। पर कुछ कारणों से, भारत में ऐसा प्रयास हो, तो उसका विशेष महत्त्व होगा। आज भारत को सबसे समस्याग्रस्त देशों में जाना जाता है। फिर, हमारी जनसंख्या भी इतनी है कि विश्व के हर छह व्यक्तियों में से एक भारतवासी है। तिस पर हमारी विरासत में, हमारी संस्कृति में सादगी, संयम और भाईचारे के पक्ष में बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो ऐसी भूमिका निभाने में विशेष रूप से सहायक सिद्ध हो सकती हैं।

हमारे इतिहास में ऐसे चार समय तो निश्चित तौर पर नजर आते हैं। ऐसा पहला समय ईसा पूर्व छठी शताब्दी का था। उस समय गंगा के मैदानों में या इसके आसपास अनेक सुधारवादी धार्मिक संप्रदायों का जन्म हुआ जिन्होंने प्रचलित कुरीतियों का विरोध करते हुए सादगी, अहिंसा, मेलभाव और समता का संदेश दिया। इनमें से दो संप्रदायों का इतिहास पर अमिट प्रभाव बौद्ध और जैन धर्म के रूप में हुआ। महावीर जैन ने अहिंसा के बहुत व्यापक रूप का प्रचार किया। अपरिग्रह के उनके सिद्धांत ने सादगी के जीवन को प्रतिपादित किया व आधिपत्य पर आधारित संबंधों का विरोध किया। बुद्ध ने समता और अहिंसा पर जोर देने के साथ-साथ धर्म के रास्ते को कर्मकांडों से मुक्त कर व्यावहारिक बनाया। मध्यम मार्ग का संदेश देते हुए उन्होंने कहा- जीवन रूपी वीणा को इतना मत कसो कि वह टूट जाए। उसे इतना ढीला भी मत छोड़ो कि उसमें से स्वर ही न निकले।

दूसरा समय आज से लगभग 2250 वर्ष पहले का है जब कलिंग-युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने एक बहुत शक्तिशाली सेना होने के बावजूद आक्रमण और विजय की नीति को पूरी तरह छोड़ दिया व इसके स्थान पर धर्म विजय को अपनाया। कुछ हद तक मिस्र के अखनातोन को छोड़ कर प्राचीन विश्व के इतिहास में ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता है। उसने अपने जीवन को जन-कल्याण और पशु-पक्षियों के कल्याण में लगा दिया। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार दूर-दूर तक किया, साथ ही अन्य धर्मों के प्रति पूरी सहनशीलता दिखाई। पूरी तरह अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए ही अशोक ने देश में अद््भुत राजनीतिक एकता स्थापित की।

भारतीय इतिहास में ऐसा तीसरा ऐतिहासिक दौर तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी के भक्ति और सूफी आंदोलन का है जिसे हम आध्यात्मिकता की गहराइयों में उतर कर जीवन की एक सार्थक समझ बनाने की दृष्टि से देख सकते हैं। प्रचलित सामाजिक कुरीतियों और उनके पोषक निहित स्वार्थों के विरुद्ध बहादुरी और दिलेरी से किए गए विद्र्रोह की दृष्टि से देखें या दो समुदायों द्वारा एक दूसरे को समझने व भाईचारे से रहने की दृष्टि से देखें, हर दृष्टि से यह बहुत प्रेरणादायक समय था।
हमारे इतिहास का ऐसा चौथा प्रेरणादायक दौर निश्चय ही ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आजादी की लड़ाई का था, जिसके साथ समाज-सुधार के अनेक आंदोलन भी अनिवार्य तौर पर जुड़े हुए थे। एक पवित्र और बेहद जरूरी उद््देश्य की प्राप्ति के लिए कितनी कुर्बानी दी जा सकती हैं, कितना कष्ट सहा जा सकता है- इसकी बहुत ही हिम्मत बंधाने वाली अनेक मिसालें इस दौर में कायम हुर्इं। साथ ही यह सामाजिक बदलाव के अनेक महत्त्वपूर्ण प्रयोगों का समय था, जिन्हें वांछित सफलता मिली हो या न मिली हो, उनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

आज हमारी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में इतनी कमियां और विसंगतियां हैं कि अपने अतीत की उपलब्धियों को देख कर भी हम आह भर कर बस इतना ही कह पाते हैं कि अब हम इतना ऊपर उठने की क्षमता खो बैठे हैं। अत: यह याद दिलाना जरूरी है कि इन सभी चार ऐतिहासिक समयों में जो प्रेरक कार्य हुए, उससे पहले समाज की स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी।
बौद्ध और जैन धर्म के उदय से पहले हिंसा, विषमता और कर्मकांडों से समाज बुरी तरह ग्रस्त था। अशोक द्वारा शांति का मार्ग अपनाने से पहले कलिंग युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे व कई लाख लोग बर्बाद हुए थे। भक्ति और सूफी आंदोलन की जरूरत को जिस समाज ने पहचाना वह तरह-तरह के भेदभाव, निरर्थक हिंसा और अंधविश्वास से उत्पन्न कष्ट भुगत रहा था। आजादी की लड़ाई के कुछ सबसे साहसी और नई समझ बनाने वाले कार्य तब हुए जब शोषण और जुल्म से समाज बुरी तरह त्रस्त हो चुका था। अत: वर्तमान कमजोरियों के बावजूद ऐसी प्रेरणादायक शुरुआत हो सकती है जो हमारी समस्याओं के वास्तविक और स्थायी हल खोजने के साथ-साथ बाकी दुनिया के लिए भी एक वैकल्पिक रास्ते की उम्मीद जगाए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App