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राजनीतिः अक्षय ऊर्जा से दूर होगा अंधेरा

भारत विश्व का पहला देश है, जहां अक्षय ऊर्जा के विकास के लिए एक अलग मंत्रालय है। वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र को विकसित करने के लिए दूसरे चरण में बीस हजार मेगावॉट क्षमता वाले सौर ऊर्जा पार्क शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। बजट में सात हजार रेलवे स्टेशनों में सौर ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने का भी लक्ष्य रखा गया है। अक्षय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए बायोगैस और पवन ऊर्जा की मशीनरी पर लगने वाले शुल्क में भी कमी की गई है।

Author March 16, 2018 2:36 AM

हमारे जीवन में ऊर्जा का महत्त्व अतुलनीय है। इसके बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। सदियों से मानव अपनी आवश्यकता के लिए ऊष्मा, प्रकाश आदि को ऊर्जा के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। ऊर्जा की कमी की वजह से हमारा देश दूसरे देशों से पिछड़ रहा है। ऊर्जा की बदौलत ही औद्योगिक विकास में बढ़ोतरी, रोजगार में इजाफा, ग्रामीण पिछड़ेपन को दूर करने में मदद, अर्थव्यवस्था में मजबूती, विकास दर में तेजी आदि संभव हो सकती है। वर्तमान में ऊर्जा का मुख्य स्रोत कोयला है। लेकिन कोयले की उपलब्धता सीमित है। एक निश्चित समय के बाद इसका भंडार भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए, एक लंबे समय से वैकल्पिक ऊर्जा की खोज की जा रही थी। इसी क्रम में अक्षय ऊर्जा की खोज की गई है। अक्षय का अर्थ होता है असीमित। अर्थात जिसका उत्पादन हमेशा किया जा सके। अक्षय ऊर्जा सस्ती और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली नहीं है। देश में अक्षय ऊर्जा के स्रोत मसलन, सूर्य की रोशनी, नदी, पवन, ज्वार-भाटा आदि हैं। जरूरत है इन स्रोतों का दोहन घरेलू, उद्योग, कृषि आदि क्षेत्रों के विकास के लिए किया जाए।

ऊर्जा के स्रोत को दो भागों में विभाजित किया गया है। पहले वर्ग में ऐसे स्रोत आते हैं जो कभी खत्म नहीं होंगे। इस वर्ग में सौर व वायु ऊर्जा, जल ऊर्जा, जैव र्इंधन ऊर्जा आदि को रखा जाता है। दूसरे वर्ग में वे स्रोत आते हैं जिनके भंडार सीमित हैं। प्राकृतिक गैस, कोयला, पेट्रोलियम आदि ऊर्जा के स्रोत को इस श्रेणी में रखा जाता है। चूंकि, ऊर्जा के भंडार तेजी से समाप्त हो रहे हैं, इसलिए जरूरत इस बात की है कि अक्षय ऊर्जा के विविध विकल्पों का इस्तेमाल किया जाए। भारत में अक्षय ऊर्जा के उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। लिहाजा, अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र को व्यापक और प्रभावी बनाने के लिए ‘नवीन एवं अक्षय ऊर्जा’ नाम से एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाया गया है। भारत विश्व का पहला देश है, जहां अक्षय ऊर्जा के विकास के लिए एक अलग मंत्रालय है। वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र को विकसित करने के लिए दूसरे चरण में बीस हजार मेगावॉट क्षमता वाले सौर ऊर्जा पार्क शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। बजट में सात हजार रेलवे स्टेशनों में सौर ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने का भी लक्ष्य रखा गया है। अक्षय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए बायोगैस और पवन ऊर्जा की मशीनरी पर लगने वाले शुल्क भी कमी की गई है। बजट में अक्षय ऊर्जा की क्षमता को 2022 तक पौने दो लाख मेगावाट बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें सौर ऊर्जा का हिस्सा एक लाख मेगावाट, पवन ऊर्जा का हिस्सा साठ हजार मेगावाट, जैव र्इंधन का हिस्सा दस हजार मेगावाट और जल ऊर्जा का हिस्सा पांच हजार मेगावाट रहेगा।

अक्षय ऊर्जा का सबसे अधिक उत्पादन पवन सौर ऊर्जा के जरिए होता है। भारत में पवन ऊर्जा के उत्पादन की शुरुआत 1990 में हुई थी। लेकिन हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में बहुत तेजी से प्रगति हुई है। आज भारत के पवन ऊर्जा उद्योग की तुलना विश्व के प्रमुख पवन ऊर्जा उत्पादक देशों अमेरिका और डेनमार्क से की जाती है। भारत में पवन ऊर्जा उत्पादित करने वाले राज्यों में तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश हैं। भारत के बड़े पवन ऊर्जा पार्कों में तमिलनाडु का मुपेंडल, राजस्थान का जैसलमेर, महाराष्ट्र का ब्रहमनवेल, ढालगांव, चकाला, वासपेट आदि हैं। पवन ऊर्जा के मुकाबले सौर ऊर्जा का उत्पादन भारत में अभी भी शैशवावस्था में है। तकनीक की कमी और जानकारी के अभाव में भारत अभी ज्यादा मात्रा में सौर ऊर्जा नहीं उत्पादित कर पा रहा है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत वर्ष 2000 के बाद से ज्यादा सक्रिय हुआ है। भारत में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। खासकररेगिस्तानी इलाकों में। भारत के सौर ऊर्जा कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र का भी समर्थन मिला हुआ है। भारत के इस कार्यक्रम को ‘एनर्जी ग्लोब वर्ल्ड’ पुरस्कार मिल चुका है। भारत चाहता है कि सौर ऊर्जा मौजूदा बिजली से सस्ती हो। इस लक्ष्य को अनुसंधान एवं नवोन्मेष उपायों की मदद से हासिल किया जा सकता है।

विश्व बैंक ने भारत में सौर ऊर्जा कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए चालीस अरब रुपए से ज्यादा की राशि मंजूर की है। विश्व बैंक के बोर्ड ने लगभग आठ अरब रुपए के सह-वित्तपोषण एवं क्लाइमेट इनवेस्टमेंट फंड के क्लीन टेक्नोलॉजी फंड के रूप में तैंतीस करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। विश्व बैंक के मुताबिक इस पैसे से कम से कम 400 मेगावाट की सौर ऊर्जा परियोजनाओं का निर्माण किया जाएगा, जिससे स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन हो सकेगा और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा। ग्रामीण क्षेत्र में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने सोलर फोटोवॉल्टिक लाईटिंग प्रणाली की स्थापना के लिए एलईडी आधारित योजना को शुरू किया है। इस योजना के अंतर्गत अनुदान केवल उन्हीं सौर संयंत्रों के लिए उपलब्ध होगा, जो भारत सरकार द्वारा पैनल में शामिल किए गए निमार्ताओं और उद्यमियों से जुड़े हुए हों।

आठवीं विश्व अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकी कांग्रेस में अगले पांच साल में सबके लिए ऊर्जा स्वतंत्रता और बिजली प्राप्त करने के भारत के नजरिए की पृष्ठभूमि तैयार की गई। सम्मेलन में स्वच्छ, विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा आपूर्तियां सुनिश्चित करने के लिए नवीन हरित प्रौद्योगिकी पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसने विशेषज्ञों, निवेशकों और अन्य हितधारकों जैसे सार्वजनिक और निजी क्षेत्र, सलाहकार समूहों, सरकारों, गैर सरकारी संगठनों, गैर लाभकारी संगठनों, पर्यावरणविदों और शिक्षाविदों को एक मंच पर लाते हुए सूचना का आदान-प्रदान करने, अनुभव और बेहतरीन पद्धतियों को साझा करने का अवसर भी प्रदान किया।

पेरिस समझौते के बाद समूचे विश्व ने स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर मसला है और दुनियाभर में इस समस्या का समाधान प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए। भारत इस चुनौती से निपटने के लिए वैश्विक मंच पर अनेक अनुबंधों की अगुवाई कर रहा है, जिनमें अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आइएसए), नवोन्मेष पहल, अफ्रीकी अक्षय ऊर्जा आदि जैसे बड़े कदम शामिल हैं। माइक्रो ग्रिड की स्थापना और कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयास भी हो रहे हैं। मोदी सरकार का लक्ष्य ‘सबका साथ सबका विकास’ को साकार करने के लिए ग्रामीण इलाकों में अक्षय ऊर्जा की मदद से माइक्रो ग्रिड स्थापित करने का है। माना जा रहा है कि गैर पारंपरिक तरीके से बिजली उत्पादन करने से कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। नवोन्मेषण एवं शोध के जरिए बिजली उत्पादन की लागत को कम किया जा सकेगा। इस क्षेत्र में बेहतर एवं तेजी से काम करके ही विकास के उच्चतम स्तर पर पहुंचा जा सकता है।

अक्षय ऊर्जा से इंसान की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। इसके अलावा कृषि, कुटीर, लघु और बड़े उद्योगों के लिए भी ऊर्जा की जरूरतों को अक्षय ऊर्जा से आसानी से पूरा किया जा सकता है। भले ही पवन ऊर्जा का उत्पादन पूरे देश में संभव नहीं है, लेकिन सौर ऊर्जा के क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावना है। आज देश के दूर-दराज के गांवों में भी छोटे सौर ऊर्जा घरों से ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है। अपशिष्ट से भी घर-घर में ऊर्जा उत्पादन किया जा सकता है। इसमें सबसे प्रचलित जैव र्इंधन है। अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में जल एवं ज्वार-भाटा से भी ऊर्जा बनाया जाता है, लेकिन भारत में इसकी संभावना सीमित है। कहा जा सकता है कि अक्षय ऊर्जा के माध्यम से हम अंधेरे को दूर भगा सकते हैं।

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