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राजनीतिः हिंदु अखाड़ा

सांस्कृतिक-धार्मिक राजनीति का अखाड़ा विकास के अखाडे से अधिक आसान और आकर्षक अखाड़ा है। सेकुलर अखाड़ा अपने अल्पसंख्यकवाद के कारण संदिग्ध हो चुका है। यह बात कांग्रेस को एंटनी कमेटी की रपट ने समझा दी है। इसलिए जो बचता है वह हिंदू अखाड़ा बचता है। आज असल अखाड़ा हिंदू अखाड़ा है, सेकुलर अखाड़ा नहीं!

Author December 22, 2017 2:30 AM
मंदर में राहुल गांधी (फाइल फोटो)

गुजरात के चुनाव में सबसे दिलचस्प क्षण तब बना जब राहुल ने स्वयं को शिवभक्त कह, मंदिरों के दर्शन कर और अपने जनेऊ को दिखवाकर अपने हिंदू होने का दावा किया। यह एक जबर्दस्त सांस्कृतिक-धार्मिक विमर्श का क्षण भी था। कोई नहीं कह सकता कि इसका चुनाव पर कितना असर पड़ा, लेकिन भाजपा ने जिस आकुलता से राहुल के हिंदू दर्शन पर हमले किए उसने जाहिर कर दिया कि जाने-अनजाने राहुल के जनेऊ ने भाजपा को उसी के अखाडेÞ में चुनौती दे दी है। समकालीन चुनाव विश्लेषणों में मोटे-मोटे राजनीतिक चिह्नों के हेर-फेर की चर्चा तो रही है लेकिन हिंदुत्वमूलक नए सांस्कृतिक-धार्मिक विमर्शों और उनके असरों का जिक्र तक नहीं दिखता है। यह हमारे राजनीतिक विश्लेषकों की सेकुलरवादी सीमा है।

चुनाव को विकास बरक्स जाति के समीकरणों के जरिए समझने के चक्कर में विश्लेषक गुजरात की जनता के मन में बहती जागृत या प्रसुप्त हिंदुत्व की अंतर्धारा को एकदम भूल ही जाते हैं, मानो दो हजार दो हुआ ही न हो और उसकी स्मृतियां और डर पिछली पीढ़ी के दिमाग में हों ही नहीं। राहुल का नरम हिंदू होने का दावा और इस तरह गुजरात के हिंदुओं तक संदेश भेजने की कोशिश करना, एक नया निराला सांस्कृतिक-धार्मिक विमर्श था जिसे राहुल ने एकदम मीठे तरीके से चलाया। अपने अखाडेÞ में राहुल को घुसता देख भाजपा ने इसे नाटक बताकर इसके असर को कम करने की कोशिश की। लेकिन राहुल का हिंदू कार्ड परेशान करने वाला बना रहा। यह आगे भी बन सकता है।

अगर ध्यान से देखें तो समकालीन राजनीतिक विमर्श मूलत: अनेक प्रकार के सांस्कृतिक- धार्मिक विमर्शों से लदे हैं जो दिन-रात सक्रिय रखे जाते हैं। उनके कई स्तर हैं और उनमें एक तरह की अनाधिकारिक किस्म की स्वत:स्फूर्तता नजर आती है। ‘लव जिहाद’, ‘बीफ विजिलांतिज्म’, ‘गोरक्षक विजिलांतिज्म’ से लेकर कब्रिस्तान-श्मशान तक में ये झलकते हैं। हिंदू अखाडेÞ से निकले ये सांस्कृतिक-धार्मिक विमर्श तब भी सक्रिय रहते हैं जब चुनाव नहीं होते!

ऊपर से देखने में ये विमर्श विकास-विरोधी नजर आते हैं। शायद इसी कारण कुछ उदारमना विचारक अपेक्षा करते हैं कि सरकार इन ‘फ्रिंज’ पलटनों के हमलों को हतोत्साहित करे ताकि विकास में बाधा न पडेÞ। लेकिन विकास के नारे और इन सांस्कृतिक-धार्मिक विमर्शों के बीच कोई लड़ाई नहीं नजर आती। पिछले दिनों पद्मावती को लेकर जिस तरह से कई सरकारों ने मिथक, परंपरा और जातीय स्वाभिमान के सवालों पर अपनी आवाज ‘फ्रिंज’ पलटनों से मिलाई और गुजरात के चुनाव के ऐन पहले तक चलाई उससे यही जाहिर होता है कि ऐसे कट्टरतावादी सांस्कृतिक-धार्मिक विमर्श राज्यसत्ताओं ने गोद ले लिये हैं।

राहुल के नरम हिंदुत्व के कार्ड को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। यह एक ‘डबल डिसरप्टिव’ पैंतरा है। कट्टर हिंदुत्व ने कांग्रेस के सेकुलरिज्म को ‘डिसरप्ट’ किया तो अब कांग्रेस कट्टरतावादी हिंदुत्व को ‘डिसरप्ट’ करने के लिए नरम हिंदुत्व का जनेऊ दिखा रही है। भाजपा की परेशानी का एक बड़ा कारण यही था कि चुनाव के ऐन बीच में कांग्रेस सेकुलर अखाड़ा बदल कर हिंदू अखाडे में उतर कर उसे ही चुनौती देने लगी। जिस हिंदू समाज पर भाजपा अपना एकाधिकार समझती रही उसी को अपने साथ लगाने के लिए कांग्रेस वैकल्पिक हिंदुत्व परोसने लगी। यह एक मर्मान्तक चोट थी। इसीलिए राहुल के हिंदू होने पर तीखे हमले किए गए। कहने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस की यह एक महत्त्वपूर्ण शिफ्ट रही।

गांधी ने कभी अपने वैष्णवत्व से अपने समय में कट्टरतावादी हिंदुओं जैसे हिंदू महासभा आदि को चुनौती देते हुए अपना उदार हिंदू अखाड़ा खोला था और कट्टरता के नखदंत कमजोर किए थे। लगभग उसी तरह से राहुल करना चाहते हैं, लेकिन हम जानते हैं कि राहुल न गांधी हैं न हो सकते हैं। तब भी यह कहना अनुचित न होगा कि उनका यह प्रयोग साहस-भरा है जिसका नोटिस भाजपा को लेना पड़ा है।

चंूकि गुुजरात के चुनाव की चुटियल सफलता को भी मीडिया का एक हिस्सा दो हजार उन्नीस तक इसी तरह बजाने वाला है और बीच में होने वाले राज्यों के चुनावों को भी इसी हवा को समर्पित करने वाला है इसलिए कहा जा सकता है कि गुजरात वाला राहुल का नरम हिंदू अखाड़ा भी खुले रहना है कांग्रेस हिंदुत्व के अखाडे में क्यों उतर रही है? इसका कारण गुजराती मॉडल है। गुजराती मॉडल को मानने वाले जब उपलब्धियां गिनाते हैं तो सड़क, बिजली, उद्योग को गिनाते हैं, वहां की जनता के मिजाज को इस मॉडल में शामिल नहीं करते।
विकास के समकालीन रूपक में भी हिंदू तत्त्व काम करता है। सवा सौ करोड़ जनता में जो बहुमत में है उसका दैनिक जीवन सांस्कृतिक विमर्शों में बार-बार बोलता है। उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों को टिकट न देकर भी भाजपा ने एक यूपी मॉडल बनाया है। उसमें गुजरात के मॉडल का कुछ हाथ तो है ही। हमारे विमर्शों में गुजरात के मॉडल का यह तत्त्व अक्सर अनदेखा रह जाता है।

अब तक के राजनीतिक विमर्श अपने इकहरेपन में यह मानते रहते हैं कि विकास का पैमाना आर्थिक-राजनीतिक होता है जिसका जनता के बीच चलने वाले सांस्कृतिक-धार्मिक स्पर्धात्मक विमर्शों से कोई लेना-देना नहीं होता। एक बार विकास हो जाता है तो सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान के कट्टर प्रश्न अपने आप नरम हो जाते हैं। उत्तर आधुनिक सांस्कृतिक सिद्धांतिकियों के अनुसार, ऐसा न संभव है न हुआ करता है। ‘धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्र’ और ‘आर्थिक क्षेत्र’ एक दूसरे को काटे बिना भी अपना काम उसी तरह करते रह सकते हैं जिस तरह धर्म तत्त्ववाद आजकल इंटरनेट के सहारे अपना काम करते रहते हैं।
कांग्रेस ने शायद इस राजनीतिक-सांस्कृतिक शिफ्ट को समझा है। जब से भाजपा सत्ता में आई है तभी से कांग्रेस समेत भाजपा विरोधी दल और विचारक इस ताक में हैं कि किसी तरह भाजपा अपनी ही गलतियों से ध्वस्त हो जाए और जनता फरियाद करने लगे कि सर जी आइए आप ही संभालिए!
गुजरात में राहुल का अपने नरम हिंदुत्व के साथ गरम हिंदुत्व के अखाडेÞ में उतरना यही बताता है कि अगली लड़ाई हिंदू अखाडेÞ में ही होनी है।
भाजपा का सौभाग्य यह है कि उसकी सटीक आलोचना के औजार अभी बनने हैं जबकि कांग्रेस की आलोचना के औजार पैंसठ-सत्तर साल के शासन में उसके दिए जनतंत्र में लगातार बनते रहे जिसका सबसे अधिक लाभ भाजपा ने उठाया!

किसी भी सत्ता का प्रति-विमर्श धीरे-धीरे बनता है और हिंदू अखाडेÞ का प्रति-विमर्श हिंदू अखाडेÞ में ही बन सकता है, और चूंकि हमारे बहुत-से विचारकों के लिए हिंदू विमर्श अब भी एक षडयंत्र या अचानक पैदा हो गई आफत है इसलिए भी वे उसे लेकर कोई सकारात्मक आलोचनात्मक विमर्श नही बना सकते। गनीमत है कि राहुल और कांग्रेस ने इस कमजोरी को समझा है और अपने नरम हिंदुत्व से भाजपा को भौंचक कर दिखा दिया है कि हिंदू समाज पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता और कि हिंदुत्व का कोई भी बेहतरीन संस्करण गरम हिंदुत्व के लिए परेशानी का विषय हो सकता है।

अटल की सरकार तक हिंदुत्व और सत्ता के बीच एक दूरी रह गई थी वो इस बार पूरी तरह पाट दी गई है, इसलिए एक ओर सबका साथ सबका विकास होता रहता है, दूसरी ओर आम दैनिक जनक्षेत्रों में ‘फ्रिंज’ समूहों द्वारा एक खास समूह-वर्चस्व बढ़ाया जाता रहता है। समकालीन सत्तासीन गरम हिंदुत्ववादी विमर्श अब तक सक्रिय सेकुलर अखाडे को विदेशी, निष्क्रिय और संदिग्ध बनाने में कामयाब रहा है। साथ ही आइएसआइएस और इस्लामी कट्टरताओं ने भी कट्टरतावादी हिंदुत्व के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाया है।

सांस्कृतिक-धार्मिक राजनीति का अखाड़ा विकास के अखाडेÞ से अधिक आसान और आकर्षक अखाड़ा है। सेकुलर अखाड़ा अपने अल्पसंख्यकवाद के कारण संदिग्ध हो चुका है। यह बात कांग्रेस को एंटनी कमेटी की रपट ने समझा दी है। इसलिए जो बचता है वह हिंदू अखाड़ा बचता है। आज असल अखाड़ा हिंदू अखाड़ा है, सेकुलर अखाड़ा नहीं! लड़ाई मुसलमानों को जीतने की नहीं बल्कि हिंदू चित्त को समझने और उसे जीतने की है, साथ ही उसे उसके उदार स्वभाव की याद दिलाने की है। राहुल ने एक हद तक यही किया है और इस तरह ‘हिंदू पद पादशाही’ के सपने को नरम हिंदुत्व का झटका दिया है। अगले बरस होने वाले आठ राज्यों के चुनावों से लेकर दो हजार उन्नीस तक चुनावों का अखाड़ा ‘हिंदू अखाड़ा’ ही है। गुजरात का चुनाव यही बताता है।

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