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राजनीतिः फंसे कर्ज का बढ़ता मर्ज

भले ही एनपीए का मर्ज बढ़ रहा है, लेकिन सरकार इसके समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार ने फंसे कर्ज के बोझ तले दबे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए पुनर्पूंजीकरण पैकेज के अलावा बैंकिंग क्षेत्र के लिए कई सुधारों की भी घोषणा की है। पुनर्पूंजीकरण पैकेज से कमजोर बैंकों को वैश्विक पूंजी पर्याप्तता की जरूरत सुनिश्चित करने के लिए धन मिलेगा। बैंकों में पूंजी निवेश से उन्हें नियामकीय जरूरतें पूरी करने में मदद मिलेगी, जिससे बैंक ज्यादा कर्ज देने में भी सक्षम होंगे।
Author April 4, 2018 03:19 am
(Illustration: C R Sasikumar)

एक तरफ भारतीय बैंक पहले से ही फंसे कर्ज (एनपीए) की समस्या से जूझ रहे थे, दूसरी तरफ पंजाब नेशनल बैंक में हुए फर्जीवाड़े ने एनपीए की समस्या को और गंभीर बना दिया है, क्योंकि इस फर्जीवाड़े का आंशिक असर यूनियन बैंक आॅफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक और ऐक्सिस बैंक पर पड़ सकता है, क्योंकि इन तीनों बैंकों ने पीएनबी द्वारा जारी किए गए एलओयू के आधार पर नीरव मोदी की कंपनियों को कर्ज दिया था। वैसे, जांच की प्रक्रिया के आगे बढ़ने पर फर्जीवाड़े की आंच कुछ और बैंकों पर भी पड़ सकती है। अगर पंजाब नेशनल बैंक में हुए फर्जीवाड़े की पूरी रकम एनपीए में तब्दील होती है तो बैंक की अनुमानित 480 अरब रुपए की हैसियत पर पच्चीस प्रतिशत तक का असर पड़ सकता है। हालांकि, फर्जीवाड़े वाले लेन-देन की प्रकृति आकस्मिक है। लिहाजा, जिस रकम की वास्तविक देनदारी बनेगी, उतना ही बैंक को अतिरिक्त प्रावधान करना होगा, जिससे चालू वित्तवर्ष की अंतिम तिमाही में बैंक की संपत्ति की गुणवत्ता उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होगी।

हालांकि बैंकिंग कारोबार में फर्जीवाड़े की घटनाएं, भारत ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी होती रहती हैं। वर्ष 2015 में बैंक आॅफ बड़ौदा में दिल्ली के दो कारोबारियों ने 6,000 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की थी। वर्ष 2012 से वर्ष 2016 के बीच सरकारी बैंकों को विभिन्न बैंकिंग धोखाधड़ी के चलते कुल 227.43 अरब रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के हवाले से संसद में हाल ही में कहा था कि बैंकिंग धोखाधड़ी के 25,600 से ज्यादा मामले दिसंबर, 2017 तक दर्ज हुए, जिसके जरिए 1.79 अरब रुपए की धोखाधड़ी की गई। सच कहा जाए तो फर्जीवाड़े में बैंककर्मियों की संलिप्तता अकसर देखी जाती रही है। इसके अलावा भी बैंकों द्वारा परिचालन स्तर पर बैंक परिपत्रों तथा नियामकों के दिशा-निर्देशों की अनदेखी की जा रही है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में एनपीए के नियमों में संशोधन किया है, जिससे फंसे कर्ज का मर्ज और भी ज्यादा बढ़ सकता है।
नए नियमों की वजह से साठ से नब्बे दिनों तक के बकाया खाते एनपीए में तब्दील हो सकते हैं। रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2017 तक अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों का फंसा कर्ज करीब 8 लाख करोड़ रुपए था और आगामी कुछ तिमाहियों में नए नियम के कारण लगभग 2.8 लाख करोड़ रुपए इसमें और भी जुड़ सकते हैं। साफ है, इससे फंसे कर्ज के लिए ज्यादा प्रावधान करने पड़ेंगे और सरकार द्वारा बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए दिए जाने वाले पैसे प्रावधान में चले जाएंगे।
सितंबर 2017 तक बैंकों के कुल ऋण में ऐसे ऋण की हिस्सेदारी कुल कर्ज का तकरीबन साढ़े तीन प्रतिशत है। नए नियम से एसएमए 2 खातों के एनपीए होने की आशंका ज्यादा है और सकल एनपीए का आंकड़ा बढ़ने पर आगामी तिमाहियों में बैंकों पर ज्यादा प्रावधान करने का दबाव बढ़ेगा। गौरतलब है कि बैंकिंग क्षेत्र में ऐसे खातों- जिनका भुगतान साठ से नब्बे दिनों के अंदर नहीं हुआ हो- को विशेष निगरानी वाले खाते या एसएमए-2 कहते हैं। रिजर्व बैंक के नए नियम के अनुसार बैंकों को एक वर्ग में वर्गीकृत सभी खातों को एक समान देखना होगा अर्थात अगर कोई बैंक किसी खाते को एनपीए के तौर पर देखता है और दूसरे बैंक को भी उसी के अनुरूप उक्त खाते को अपने बही-खाते में एनपीए के तौर पर वर्गीकृत करना होगा।
दिवालिया कानून के तहत अगर बैंक 2,000 करोड़ रुपए और इससे अधिक के कर्जदारों के लिए समाधान योजना लागू करने में समर्थ नहीं हो पाता है तो ऐसे मामलों को ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण के पास भेजे जाने का प्रावधान है। रिजर्व बैंक द्वारा जारी चूककर्ता कंपनियों की दूसरी सूची में अधिकतर ऐसी ही चूककर्ता कंपनियां हैं। बहरहाल, ऐसा करने से बैंकों को इसके लिए वित्तवर्ष 2019 में ज्यादा प्रावधान करना पड़ सकता है। दिवालिया कानून के तहत एनपीए की पहली सूची में शामिल बारह कंपनियों में से नौ के निपटान में बैंकों को अपने कुल बकाया कर्ज में करीब पचास से अस्सी प्रतिशत तक प्रावधान करना पड़ सकता है। यह आकलन संबंधित कंपनियों की बोली प्रक्रिया के आधार पर किया गया है।

भले ही एनपीए का मर्ज बढ़ रहा है, लेकिन सरकार इसके समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार ने फंसे कर्ज के बोझ तले दबे सार्वजिनक क्षेत्र के बैंकों के लिए जीडीपी की 1.2 प्रतिशत राशि का पुनर्पूंजीकरण पैकेज घोषित किया है। सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र के लिए कई सुधारों की भी घोषणा की है। माना जा रहा है कि पुनर्पूंजीकरण पैकेज से कमजोर बैंकों को वैश्विक पूंजी पर्याप्तता की जरूरत सुनिश्चित करने के लिए धन मिलेगा। बैंकों में पूंजी निवेश से उन्हें नियामकीय जरूरतें पूरी करने में मदद मिलेगी, जिससे बैंक ज्यादा कर्ज देने में भी सक्षम होंगे। इसके बरक्स सरकार को रिजर्व बैंक द्वारा एनपीए के नियमों में किए गए संशोधन पर पुनर्विचार करने की जरूरत है, क्योंकि पुनर्पूंजीकरण की राशि के प्रावधान के साथ समायोजित होने की आशंका है।

आईडीबीआई बैंक के फंसे कर्ज सभी बैंकों में सर्वाधिक करीब पच्चीस प्रतिशत है। इसलिए, पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के माध्यम से इसे सबसे अधिक 10,600 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। उसके बाद बैंक आॅफ इंडिया को 9,200 करोड़ रुपए दिए जाएंगे, क्योंकि बैंक आॅफ इंडिया का एनपीए दो साल में दोगुने से ज्यादा हो गया है। मजबूत बैंकों जैसे, भारतीय स्टेट बैंक को 8,800 करोड़ रुपए, पंजाब नेशनल बैंक को 5,470 करोड़ रुपए और बैंक आॅफ बड़ौदा को 5,370 करोड़ रुपए दिए जाएंगे।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुधार के क्रम में ऋणदाताओं के समूह के आकार को भी छोटा किया जाएगा, जिसके तहत प्रत्येक भागीदार बैंक को न्यूनतम 10 प्रतिशत अंशदान करना होगा। वित्तीय सेवाएं विभाग के सचिव राजीव कुमार के मुताबिक पहले ऋणदाताओं के समूह में 20 से 22 वित्तीय संस्थान शामिल होते थे, लेकिन नए प्रावधान से कंसोर्टियम का आकार छोटा हो जाएगा और बड़ी कंपनियों को कर्ज देने वाले समूह में सात-आठ बैंक ही शामिल हो सकेंगे, ताकि ऋणी के खातों पर बारीकी से निगरानी रखी जा सके।
फंसे कर्ज को लेकर बैंकिंग क्षेत्र में समग्र जोखिम कम होने का नाम नहीं ले रहा है। मार्च और सितंबर 2017 के बीच बैंकों का सकल एनपीए उधारी अनुपात 9.6 प्रतिशत से बढ़ कर 10.2 प्रतिशत हो गया है। इधर 9,339 जानबूझ कर कर्ज नहीं चुकाने वाले लोगों ने 1,11,738 करोड़ रुपए बैंकों के पचा रखे हैं, जिसमें 93,357 करोड़ रुपए सरकारी बैंकों के हैं और इसे 7,564 कर्जदारों ने पचा रखा है। स्थिति की गंभीरता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वर्ष 2013 में यह आंकड़ा 25,410 करोड़ रुपए था, जो पांच साल में 340 प्रतिशत बढ़ गया है।

इस सबके बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि एनपीए एक लाइलाज बीमारी है। बैंकिंग कारोबार में जोखिम तो रहते ही हैं, लेकिन एनपीए प्रबंधन, बैंककर्मियों में जागरूकता बढ़ाने, प्रशिक्षण की व्यवस्था, कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने, परिपत्रों के निर्देशों का अनुपालन, धोखाधड़ी पर लगाम लगाने, एनपीए व धोखाधड़ी के डेटाबेस को मजबूत करने, बैंकों द्वारा एनपीए से संबंधित सूचनाओं को आपस में साझा करने, राजनीतिक हस्तक्षेप से परहेज करने, चूककर्ता बड़े कारोबारियों पर सरकार द्वारा शिकंजा कसने आदि उपायों से निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं।

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