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राजनीतिः आभासी दुनिया में छीजता बचपन

सच्चाई यह है कि सोशल मीडिया साइटों का प्रयोग करने के मामले में भारत आज एशिया में तीसरा तथा विश्व में चौथा देश है। साथ ही, भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों में से पचासी फीसद लोग आठ से चालीस वर्ष के बीच के हैं। निश्चित ही यह वह वर्ग है जो नेट सर्च, ई-मेल, फेसबुक, ट्विटर व लिंक्डइन आदि के जरिए समाज के वास्तविक संबंधों से धीरे-धीरे कटता जा रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

सोशल मीडिया और उससे जुड़े गैजेट्स ने अब औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ अनौपचारिक शिक्षा के ढांचे में भी बेजा दखल देना शुरू कर दिया है। यह बात हाल ही के दो सर्वे से सामने आई है। पहला सर्वे ब्रिटेन के हार्ट आॅफ इग्ंलैंड फाउंडेशन का है। इस सर्वे में कहा गया है कि टचस्क्रीन फोन और टेबलेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों की अंगुलियों की मांसपेशियों का ठीक से विकास नहीं हो पा रहा है। ऐसे बच्चों को अब पेन व पेंसिल पकड़ने में भी समस्या आने लगी है। साथ ही, इससे बच्चे देरी से लिखना सीख रहे हैं। दूसरा सर्वे भारत की ही एक निजी मोबाइल कंपनी ने कराया है। इस सर्वे से खुलासा हुआ है कि भारत में तीस फीसद से अधिक बच्चे रोजाना छह घंटे से भी अधिक समय मोबाइल स्क्रीन पर बिताते हैं। एम्स के मनोवैज्ञानिक चिकित्सकों की राय है कि बच्चों के अधिक समय गैजेट्स के साथ बिताने का नुकसान यह है कि उनमें चिड़चिड़ापन व भूख और नींद की कमी लगातार देखने को मिल रही है।

इसी तरह का एक और सर्वे ऐसोचैम का है। इसका निचोड़ यह है कि आज भारत में आठ से तेरह वर्ष के आयुवर्ग के तिहत्तर फीसद बच्चे फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं। हैरत की बात यह है कि इस आयुवर्ग के पचहत्तर फीसद बच्चों के मां-बाप ने खुद ही उन्हें इसकी पूरी जानकारी दी है। इससे भी अधिक ताज्जुब की बात तो यह है कि बयासी फीसद मां-बाप ने अपने बच्चों को खुद अकाउंट बनाने में खासी मदद की है। इस सर्वे के निष्कर्ष से यह बात भी सामने आई है कि तेरह साल के पच्चीस फीसद, ग्यारह साल के बाईस फीसद, दस साल के दस फीसद तथा आठ-नौ साल के तकरीबन पांच से दस फीसद बच्चे फेसबुक के अलावा सोशल मीडिया की अलग-अलग साइट्स पर सक्रिय हैं।

पिछले दिनों ब्रिटेन में भी किए गए एक सर्वेक्षण से यह बात निकल कर सामने आई थी कि उनका बच्चों से संवाद अब अधिकतर सोशल मीडिया के जरिये ही होता है। इसलिए चाहे मां-बाप हों याबच्चे, उनकी सामाजिक दुनिया अब सोशल साइटों तक सिमट कर रह गई है। कड़वा सच यह है कि अब भारत में भी सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने सामाजिक संबंधों को प्रभावित करना शुरूकर दिया है। मुंबई में तो ऐसे कई सोशल मीडिया एडिक्टेड क्लिीनिकों की शुरुआत भी हो गई है जहां दर्जनों मां-बाप अपने सोशल मीडिया के व्यसनी नाबालिग बच्चों को लेकर लगातार पहुंच रहे हैं।

सच्चाई यह है कि सोशल मीडिया साइटों का प्रयोग करने के मामले में भारत आज एशिया में तीसरा तथा विश्व में चौथा देश है। साथ ही, भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों में से पचासी फीसद लोग आठ से चालीस वर्ष के बीच के हैं। निश्चित ही यह वह वर्ग है जो नेट सर्च, ई-मेल, फेसबुक, ट्विटर व लिंक्डइन आदि के जरिए समाज के वास्तविक संबंधों से धीरे-धीरे कटता जा रहा है। इस संदर्भ में तथ्य बताते हैं कि आज कंप्यूटर व इंटरनेट की आभासी दुनिया बच्चों के शुरुआती जीवन के लिए अपरिहार्य परिवार, स्कूल व क्रीड़ा-समूह जैसी प्राथमिक संस्थाओं की उपादेयता पर सवालिया निशान लगा रही है।

सूचनाओं के तेजी से उभरते इस समाज में आज यह प्रश्न तेजी से उठ रहा है कि इस आभासी दुनिया में हमारे प्रत्यक्ष संवाद बनाने वाले ‘रोल मॉडल’ तेजी से दम क्यों तोड़ रहे हैं? साथ ही फेसबुक, वाट्सऐप व ट्विटर जैसी साइटों के सामने हमारे मस्तिष्क को तरोताजा रखने वाला हमारा स्वस्थ प्रत्यक्ष सामाजिक संवाद भी अब जीवन से नदारद हो रहा है। यहां तक कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन व शिक्षक की तुलना में सोशल साइटों से तीखा संवाद ज्यादा प्रभावी हो रहा है।  कहना न होगा कि दादा-दादी, नाना-नानी की बांहों से लिपट कर कहानियां सुनने वाला बचपन अब डिजिटल दुनिया के आभासी समाज के गैजेट्स के साथ विकसित हो रहा है। आज आर्थिक दबावों के समक्ष मां-बाप को फुरसत ही नहीं है। बस उन्होंने बच्चों को ब्लॉक बनाने, खिलौने और रस्साकशी करने के साथ में मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाले खेल-खिलौने की जगह उनके हाथों में आईपैड और बड़े-बड़े मोबाइल पकड़ा दिए हैं। इससे बच्चों का दोहरा नुकसान हआ है।

एक तो उन बच्चों के हाथों की मांसपेशियां सिकुड़ने लगीं, और दूसरे, उनका सारा का सारा सामाजिक संसार आईपैड और मोबाइल तक सिमट कर रह गया है। खराबी यह भी हुई कि संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों की सीख देने वाले परिवार और स्कूल तक बच्चों के बचपन से दूर होते चले गए। यही वजह है कि बच्चे भी भौतिक देह की दुनिया से अलग होकर सामाजिक सीख की जगह आभासी सुख की अनुभूति करने में अधिक लिप्त हो रहे हैं। समाजशास्त्र बताता है कि पीढ़ियों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप में बच्चों में जितना अधिक सामाजिक-सांस्कृतिक निवेश किया जाएगा, बच्चों का जीवन उतना ही सुरक्षित, सफल व समृद्ध बनेगा। वर्तमान का सच यह है कि समाजीकरण के अभाव और सोशल मीडिया, कंप्यूटर व इंटरनेट के यांत्रिक संवादों की प्रचुरता ने बच्चों के बचपन को द्वंदात्मक बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।

इस सोशल मीडिया की कड़वी सच्चाई यह है कि ये बच्चे धीरे-धीरे आपसी प्रेम, बंधुत्व, सहानुभूति व संवेदनशीलता जैसे मूल्यों से विलग होते साफ दिखाई दे रहे हैं। इस आभासी संसार के विस्तार से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला बच्चों का बचपन ही है। बच्चों के लगातार आभासी दुनिया से जुड़ने का दूसरा बड़ा नुकसान यह है कि लाइक्स करते-करते उनमें जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने की तीव्र इच्छा तो बढ़ी है, पर जीवन में असफल होने का धैर्य व संयम की मात्रा शून्य हो जाने से उनमें निराशा के भाव तेजी से घर कर रहे हैं। सही बात यह है कि सोशल मीडिया के संसार से जुड़े गैजेट्स ने उनके ज्ञानात्मक विवेक को भी हर लिया है। लिहाजा, तनाव या उदासी दूर करने लिए अब उन्हें बार-बार उत्तेजना का सहारा लेना पड़ रहा है। बच्चों के जीवन का यह नूतन आयाम गंभीर चिंता का विषय है।

नित बढ़ते बाजार और डिजिटल संसार से आने वाली धाराओं से आज बचाव तो मुश्किल है।, फिर भी इस समय मां-बाप की बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वे बच्चों के बचपन और अपने वात्सल्य को सुरक्षित करने के लिए मोबाइल तथा आइपैड की जगह पहले उन्हें आपसी संवाद की ओर उन्मुख करें और विलुप्त होती अपने सामाजिक संबंधों की विरासत को साझा करें। आज हम इस सच से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि संयुक्तपरिवारों में मां-बाप के मुकाबले बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी के प्यार व स्नेह की छांव अधिक मिलती थी। आज बड़े पैमाने पर संयुक्त परिवार टूट चुके हैं, नतीजतन एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ा है। ऐसे में आज बच्चों के प्रति माता-पिता की जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ गई है। आभासी दुनिया तो बच्चों की काल्पनिक दुनिया है जो उनकी वास्तविक दुनिया की स्थानापन्न बन रही है। हम जानते हैं आज के नेटीजन समाज में इन गैजेट्स के प्रयोग को रोकना कठिन है। इसलिए यहां पूरी जिम्मेदारी के साथ कहा जा सकता है कि आज मां-बाप पहले बच्चों के साथ आपसी बातचीत के मौके बढ़ाएं। इसके बाद यदि बच्चों का आभासी दुनिया के गैजेट्स से परिचय होगा तो शायद उसकी नैतिक प्रौढ़ता ज्यादा मजबूत होगी।

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