ताज़ा खबर
 

राजनीतिः अजन्मी बेटियों के बगैर

विषम लिंगानुपात का समाधान सिर्फ कानून के जरिए नहीं किया जा सकता। केंद्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि वे जागरूकता कार्यक्रम चलाएं, जिनके जरिए लोगों को यह समझाया जाए कि दुनिया में आने से पहले एक जान को नष्ट करके वे न सिर्फ अपराध कर रहे हैं, बल्कि एक बड़े सामाजिक असंतुलन को न्योता देकर देश के भविष्य को भी संकट में डाल रहे हैं।

Author Published on: February 23, 2018 3:49 AM
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

देश में विषम लिंगानुपात की समस्या और इस पर चर्चा, दोनों ही पुरानी हैं, मगर वर्तमान समय में जब शिक्षित हो रहे भारतीय समाज में लड़का-लड़की के बीच भेदभाव नहीं करने को लेकर सरकार से समाज तक की तरफ से प्रयास हो रहे हैं और माना जा रहा था कि स्थिति सुधर रही है, ऐसे समय में लिंगानुपात से संबंधित नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट हमें पुन: सोचने पर विवश करती है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों के द्वारा बेटियों को एक गरिमामय जीवन देने की कोशिशों में जुटी केंद्र सरकार के लिए भी नीति आयोग की रिपोर्ट आईने की तरह है। ‘हेल्दी स्टेटस ऐंड प्रोग्रेसिव इंडिया’ नामक अपनी इस रिपोर्ट में नीति आयोग ने देश के इक्कीस राज्यों की लिंगानुपात संबंधी स्थिति स्पष्ट की है। इक्कीस बड़े राज्यों में से सत्रह राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गई है। गुजरात इसमें शीर्ष पर है, जहां जन्म के समय लिंगानुपात में 53 अंकों की भारी गिरावट सामने आई है। इसके बाद क्रमश: हरियाणा में 35, राजस्थान में 32, उत्तराखंड में 27, महाराष्ट्र में 18, हिमाचल में 14, छत्तीसगढ़ में 12 और कर्नाटक में 11 अंकों की गिरावट का आंकड़ा नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में प्रस्तुत किया है। संतोषजनक बात यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में लिंगानुपात की स्थिति में सुधार आया है। लेकिन शेष राज्यों में विषम लिंगानुपात की स्थिति आधुनिकता और प्रगतिशीलता का दम भरने वाले भारतीय समाज के समक्ष यह गंभीर प्रश्न खड़ा करती है कि क्या आधुनिक होने का समस्त प्रदर्शन सिर्फ भौतिक धरातल पर ही है?

क्या लोग मानसिक तौर पर अब भी लड़का-लड़की में भेदभाव की मध्यकालीन सोच से ही ग्रसित हैं? नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में केवल समस्या पर बात नहीं की है, समाधान बताने का भी प्रयास किया है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भ्रूण के लिंग परीक्षण और चयन संबंधी कानून को सख्ती से लागू किए जाने की बात कही है। समझ सकते हैं कि नीति आयोग ने कानून को सख्ती से लागू करने की बात कह कर समाधान बताने की सिर्फ औपचारिकता पूरी की है क्योंकि चाहे जितनी सख्ती बरती जाए, यह समस्या केवल कानून से समाप्त नहीं हो सकती। दरअसल, प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण लोगों के जीवन से जुड़ी ऐसी स्थिति है कि उस तक कानून की पहुंच और कानून के दखल को व्यावहारिक बना पाना बहुत सारे मामलों में बहुत मुश्किल होता है। भ्रूण के लिंग परीक्षण के बहुत ही कम मामले संज्ञान में आ पाते हैं। प्राय: पति-पत्नी की परस्पर सहमति से ये परीक्षण इतने गुपचुप ढंग से करवाए जाते हैं कि पड़ोसियों तक को भनक नहीं लग पाती है, कई बार परिवार के अन्य सदस्य भी नहीं जान पाते हैं। ऐसा करने वाले डॉक्टरों का भी अभाव नहीं है। गली-गली में क्लीनिक खोल कर बैठे ऐसे बहुत-से डॉक्टर मिल जाएंगे, जिन्हें ये परीक्षण करने में कोई हिचक नहीं होती। ऐसी स्थिति में कानून के लिए इस समस्या पर काबू पर पाना कितना कठिन है, यह आसानी से समझ सकते हैं।

इस संदर्भ में अगर संबंधित कानून पर भी एक दृष्टि डाल लें तो भ्रूण के लिंग की जांच और कन्याभ्रूण हत्या पर अंकुश लगाने के लिए 1994 में ‘गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम’ नामक कानून बनाया गया, जिसके तहत प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण को अपराध की श्रेणी में रखते हुए सजा का प्रावधान भी किया गया। इस कानून के तहत लिंग परीक्षण व गर्भपात आदि में सहयोग करने को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है तथा ऐसा करने पर तीन से पांच साल तक कारावास व अधिकतम एक लाख रुपए जुर्माने की सजा का भी प्रावधान किया गया है। लेकिन यह कानून लागू होने के तकरीबन बीस वर्ष बाद भी, भ्रूण परीक्षण व कन्याभ्रूण हत्या पर कोई विशेष अंकुश लग पाया हो, ऐसा नहीं कह सकते। आंकड़ों पर गौर करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में छह साल तक की आबादी में प्रति 1000 बच्चों पर महज 914 बच्चियां पाई गर्इं। छह साल तक के बच्चों में यह लैंगिक असमानता कहीं न कहीं दिखाती है कि देश में कन्याभ्रूण हत्या का सिलसिला जारी है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े भी इसी की पुष्टि करते हैं। अब यह जाहिर हो चुका है कि केवल कानून के बल पर इस समस्या से कारगर ढंग से नहीं निपटा जा सकता। ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस समस्या का और क्या समाधान हो सकता है?

अगर विचार करें तो भ्रूण परीक्षण और कन्याभ्रूण हत्या के इस सिलसिले के मूल में हमारी तमाम सामाजिक रूढ़ियां मौजूद हैं। आज के इस आधुनिक व प्रगतिशील दौर में लड़कियां न केवल लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं, बल्कि कई मायनों में लड़कों से आगे भी हैं। इसमें संदेह नहीं कि लड़कियों के इस उत्थान से समाज में उनके प्रति व्याप्त सोच में काफी बदलाव भी आया है। लेकिन बावजूद इस सब के, आज भी हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा उनके प्रति अपनी सोच को पूरी तरह से बदल नहीं पाया है। यह सही है कि इसमें अधिकांश ग्रामीण व अशिक्षित लोग ही हैं, लेकिन शहरी व शिक्षित लोग भी इससे एकदम अछूते नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो कम से कम दहेज जैसी प्रथा की चपेट में तो भारतीय समाज के शिक्षित-अशिक्षित, सब बराबर हैं। भ्रूण परीक्षण व कन्याभ्रूण हत्या के पीछे यह रूढ़िवादी प्रथा एक बहुत बड़ी वजह है।

इसी प्रकार और भी तमाम ऐसी सामाजिक प्रथाएं, कायदे और बंदिशे हैं जो कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराई को उपजाने और उसे बनाए रखने में खाद-पानी का काम कर रही हैं। इन बातों को देखते हुए कह सकते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या आपराधिक प्रवृत्ति से अधिक कुछ सामाजिक कुप्रथाओं की निरंतरता और उनके प्रश्रय से उत्पन्न हुई बुराई है। अत: यह स्पष्ट है कि इसका समाधान भी सिर्फ कानून के जरिए नहीं किया जा सकता। इस बुराई के समूल खात्मे के लिए आवश्यक है कि इसको लेकर सामाजिक स्तर पर जागरूकता लाने का प्रयास किया जाए। केंद्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इस संबंध में शहर से गांव तक, सब जगह जागरूकता कार्यक्रम चलाएं जिनके जरिए लोगों को यह समझाने का प्रयास किया जाए कि दुनिया में आने से पहले ही एक जान को नष्ट करके वे न सिर्फ अपराध कर रहे हैं, बल्कि एक बड़े सामाजिक असंतुलन को न्योता देकर देश के भविष्य को भी संकट में डाल रहे हैं। उन्हें लड़का-लड़की में कोई अंतर नहीं जैसी बातों से भी अवगत कराना चाहिए।

इन सबके अलावा दहेज आदि सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने की दिशा में भी कानूनी स्तर से लेकर जागरूकता लाने के स्तर तक ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है। सरकार की तरफ से कुछ प्रयास हो भी रहे हैं, मगर उन्हें और गति देने की आवश्यकता है ताकि उनका कुछ असर भी दिखाई दे, क्योंकि नीति आयोग की उपर्युक्तरिपोर्ट उन प्रयासों का नाकाफी होना जाहिर कर चुकी है। अगर सरकार और समाज, दोनों अपने दायित्वों को समझ लें तो निश्चित ही देश की बेटियों को न सिर्फ बचाया जा सकता है, बल्कि उन्हें गरिमापूर्ण व स्वतंत्र जीवन भी दिया जा सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 राजनीतिः टीबी से निजात पाने की चुनौती
2 राजनीतिः सतत विकास की ऊर्जा
3 राजनीतिः जीवन सूखते स्रोत
ये पढ़ा क्‍या!
X