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राजनीतिः बीमार स्वास्थ्य तंत्र का निदान

नई स्वास्थ्य नीति में उन सारीअच्छी बातों का जोर-शोर से उल्लेख है जो देश के निराशाजनक स्वास्थ्य परिदृश्य में बदलाव के लिए आवश्यक हैं, पर इन्हें हासिल करने के जो तरीके अपनाने की वकालत की गई है वे या तो अपर्याप्त और अव्यावहारिक हैं, या स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के नाम पर अंधाधुंध निजीकरण को प्रोत्साहित करने वाले हैं।
Author December 7, 2017 02:20 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

राजू पांडेय

विश्व स्वास्थ्य सूचकांक में भारत का स्थान 188 देशों में 143वां है। भारत स्वास्थ्य पर अपने जीडीपी का सिर्फ 1.4 प्रतिशत व्यय करता है। जबकि अमेरिका जीडीपी का 8.3 प्रतिशत, चीन 3.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका 4.2 प्रतिशत व्यय करता है। स्वास्थ्यमंत्री फरवरी 2015 में राज्यसभा में यह स्वीकारकर चुके हैं कि देश में चौबीस लाख नर्सों और चौदह लाख डॉक्टरों की कमी है। हम प्रतिवर्ष केवल साढ़े पांच हजार डॉक्टर तैयार कर पाते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता तो और भी कम है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के 2016 के आंकड़े बताते हैं कि शिशु रोग, स्त्री रोग और सर्जरी विशेषज्ञों की उपलब्धता, आवश्यकता की आधी है। गांवों में स्थिति और भी खराब है। देश की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से अधिक है, पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या केवल पचासी हजार। दिसंबर 2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इन आंकड़ों का उल्लेख करते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर स्थिति पर चिंता जाहिर की थी। तब से स्थिति बदतर ही हुई है।

सरकार द्वारा 15 मार्च 2017 को मंजूर की गई नई स्वास्थ्य नीति में उन सारी अच्छी बातों का जोर-शोर से उल्लेख है जो देश के निराशाजनक स्वास्थ्य परिदृश्य में बदलाव के लिए आवश्यक हैं, पर इन्हें हासिल करने के जो तरीके अपनाने की वकालत की गई है वे या तो अपर्याप्त और अव्यावहारिक हैं, या स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के नाम पर अंधाधुंध निजीकरण को प्रोत्साहित करने वाले हैं। नई स्वास्थ्य नीति स्वास्थ्य को अधिकार का दर्जा नहीं देती। राज्यों की आपत्ति को इसके लिए उत्तरदायी ठहराया गया है, जो यह मानते हैं कि ढांचागत सुविधाओं और संसाधनों के अभाव के कारण वे स्वास्थ्य सेवा को अधिकार के रूप में उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं।

नई स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञता वाले इलाज के लिए निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की वकालत करती है। लेकिन बिना सशक्त और सक्षम नियंत्रण के निजीकरण, भ्रष्टाचार और लूट को ही बढ़ावा देगा। हाल ही में हृदय रोग की चिकित्सा में प्रयुक्तहोने वाले स्टंट की कीमतों में कमी को लेकर बड़ी चर्चा हुई थी, पर इस कमी के बावजूद एंजियोप्लास्टी खास सस्ती नहीं हुई क्योंकि इसमें प्रयुक्तहोने वाले साजो-सामान, दवाओं, विशेषज्ञों और भर्ती-शुल्क आदि में असाधारण वृद्धि निजी अस्पतालों द्वारा कर दी गई। चाहे वह घुटने का प्रत्यारोपण हो या कूल्हे का, हर्निया का आॅपरेशन हो या मोतियाबिंद का, या फिर सिजेरियन डिलीवरी हो। कई बार ये निजी चिकित्सालय मरीजों से दस से बीस गुना शुल्क लेते हैं। यही स्थिति दवाओं और चिकित्सा में प्रयुक्तसामान (सिरिंज, वेन फ्लान, आइवी सेट, ग्लोव्स आदि) के संबंध में है। विभिन्न कंपनियों द्वारा निर्मित एक ही दवा की कीमत में तो चौंकाने वाला अंतर तो है ही, यदि उत्पादन लागत और विक्रय मूल्य की तुलना करें तो औसतन लागत का तीन से पांच गुना ग्राहक से वसूला जाता है। या, इससे भी ज्यादा।

गुणवत्ता का क्या हाल है? नवंबर 2016 में विभिन्न राज्यों के दवा नियंत्रण प्राधिकरण की जांच में देश की अठारह प्रमुख कंपनियों की सत्ताईस दवाओं को गुणवत्ता-विहीन पाया गया था। खुद स्वास्थ्य मंत्रालय का 2017 का एक सर्वे बताता है कि शासकीय चिकित्सालयों की दस प्रतिशत दवाएं गुणवत्ताविहीन होती हैं। यह मात्रा और अधिक होगी, क्योंकि गुमनाम निजी दवा उत्पादकों की घटिया दवाओं को मनमाने दामों पर खरीदना भ्रष्ट चिकित्सा प्रशासन की पुरानी आदत है।

स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी का वैश्विक औसत चालीस प्रतिशत है, जबकि भारत में निजी क्षेत्र की भागीदारी सत्तर प्रतिशत है। स्वास्थ्य सेवा भारत के विशालतम और सबसे तेजी से बढ़ने वाले सेक्टरों में एक है। इस क्षेत्र में कॉरपोरेट घरानों की भागीदारी बढ़ती जा रही है। आलीशान बहु-विशेषज्ञता वाले अस्पतालों की बाढ़-सी आ गई है। इनकी आक्रामक मार्केटिंग के कारण छोटे निजी अस्पतालों का अस्तित्व खतरे में है। कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा दिए जाने वाले प्रलोभन के कारण कई निजी और सरकारी चिकित्सक मरीजों को इन तक पहुंचाने वाले एजेंट की भूमिका में आ गए हैं।

इन कॉरपोरेट चिकित्सालयों को अनेक विशेषज्ञ, चिकित्सा के मॉल के रूप में व्याख्यायित करते हैं। सामान्य बीमारियों के लिए भी ढेरों प्रकार की महंगी, गैरजरूरी जांच और अनेक विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी-भरकम फीस के बाद दिया जाने वाला जबरन थोपा गया परामर्श तथा आकर्षक लगने वाली नकली छूट, इन चिकित्सालयों की विशेषताएं हैं। मरीजों को भयभीत कर उन्हें जबरन भर्ती करने या अनावश्यक आॅपरेशन के बहुत-से मामले मिल जाएंगे। फिर भी अपने प्रचार और चमक-धमक के बूते ये अस्पताल मरीजों के मन में यह आकांक्षा जगा देते हैं कि वे महंगे इलाज से ही स्वस्थ होंगे और जितना ज्यादा खर्च होगा उतनी ही जल्दी और बढ़िया स्वास्थ्य-लाभ मिलेगा।

निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों के लाखों कर्मचारी उनके प्रबंधन द्वारा किए गए समझौतों के कारण इन कॉरपोरेट चिकित्सालयों की सेवाएं लेने को बाध्य हैं। आयुर्वेद में कॉरपोरेट के प्रवेश के बाद भारत को स्वास्थ्य पर्यटन के लिए आदर्श माना जाने लगा है। इधर बदहाल सरकारी अस्पताल भौतिक और मानव संसाधन की कमी तथा कुप्रबंधन के शिकार हैं।

इन समस्याओं का समाधान नीति आयोग निजीकरण में देख रहा है और उसने जिला चिकित्सालयों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के जरिये निजी अस्पतालों से जोड़ने की वकालत की है। नीति आयोग का प्रस्ताव है कि जिला चिकित्सालयों के भवनों में निजी अस्पतालों को तीस वर्ष की लीज पर स्थान देकर अन्य संसाधन भी उपलब्ध कराए जाएं। आयोग का प्रस्ताव यह भी है कि निजी संस्थानों को अस्पताल परिसर साठ हजार वर्ग फुट जमीन उपलब्ध कराई जाए। पर ये सुझाव कॉरपोरेट चिकित्सालयों की मुनाफा संस्कृति और सरकारी अस्पतालों में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक जानलेवा कॉकटेल ही बना पाएंगे। पर जब सरकारें लोगों के स्वास्थ्य पर होने वाले व्यय को अपव्यय मान कर इस पर नियंत्रण करने की वकालत करने लगें तो ऐसे ही समाधान सामने आएंगे!

इलाज के खर्च का बोझ उठाने में मदद करने वाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों को तीस हजार रुपए का स्वास्थ्य बीमा प्रदान करती है। अपने नौ साल के इतिहास में कुल 22.4 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लाभार्थियों में से 15 करोड़ को जोड़ने वाली यह योजना कम लोगों तक ही पहुंच पाई है (5 करोड़ 90 लाख पात्र बीपीएल परिवारों में से 61 प्रतिशत का ही पंजीयन हो पाया है)। ओपीडी में इलाज के खर्चों का भुगतान न करने तथा अपर्याप्त कवर देने के कारण यह योजना अपने उद्देश्य की प्राप्ति में बहुत थोड़ी सफलता अर्जित कर सकी है।
उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड आदि अनेक प्रदेशों में अपात्रों को स्मार्ट कार्ड देने के मामले व्यापक तौर पर सामने आए। छत्तीसगढ़ में चालीस हजार फर्जी स्मार्ट कार्ड पकड़े गए।

छत्तीसगढ़ में ही डॉक्टरों, नर्सिंग होमों तथा बीमा कंपनियों की मिलीभगत से आरएसबीवाई की राशि की बंदरबांट करने के मकसद से हजारों महिलाओं के गर्भाशय अकारण निकाल लिए गए। जब हम यह जानते हैं राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं में अस्सी प्रतिशत दावों की राशि का भुगतान ऐसे ही निजी चिकित्सालयों को होता है जिनकी किसी न किसी तरह भ्रष्टाचार में भागीदारी रही है तो हमारी चिंता और बढ़ जाती है।
विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की सफलता का कारण भ्रष्टाचार का न होना या अत्यंत कम होना है। इन देशों में कम से कम पूंजीवादी व्यावसायिक नैतिकता का पालन तो किया जाता है और उपभोक्ता के अधिकारों की एक सीमा तक रक्षा की जाती है। हमारे देश में इस सब की कोई फिक्र नहीं की जाती।

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