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राजनीतिः नेपाली लोकतंत्र का प्रभात

चीन से किए गए नेपाल के किसी नए करार पर भारत को किसी प्रकार की असुरक्षा प्रदर्शित न करते हुए सावधानी से प्रतिक्रिया देनी चाहिए। नेपाल में नई सरकार से दूरगामी संबंधों की नींव सातत्य और पारस्परिकता के आलोक में ही बनेगी और तभी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंध और भी प्रगाढ़ होंगे। अपने पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंध ठिठके हुए हैं।

Author December 12, 2017 2:27 AM
राजनीतिक रूप से इस समय नेपाल में दो वैचारिक धाराएं है- दक्षिणपंथी और वामपंथी। आंतरिक राजनीति में तीन समांतर अस्मिताएं हिमाल, पहाड़ और तराई अपने अपने सम्यक प्रतिनिधित्व और नए नेपाल के आशावान भविष्य में अपनी-अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को आतुर हैं। हाल के वर्षों में वामपंथ के उभार के साथ ही नेपाल में चीन की प्रभावी उपस्थिति महसूस की जा रही है।

श्रीश पाठक 

नेपाल के सांस्कृतिक-भौगोलिक वैविध्य में पलने वाले उसके निवासियों को तीन मुख्य हिस्सों में समझा जाता है: हिमाल, पहाड़ और तराई। तिब्बत से सटे ऊंचाई पर बसे इलाके हिमाल कहलाते हैं, पहाड़ के लोग मध्य नेपाल के निवासी हैं और भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार से जुड़े सीमाई लोग मधेशी अस्मिता वाले तराई के कहलाते हैं। यह विभाजन इतना सरल नहीं है, पर नेपाली राजनीति में इनकी जटिलताएं महत्त्वपूर्ण हैं और इसीलिए नेपाल की संविधान निर्माण की यात्रा इतनी दुरूह रही है। यह समय, नेपाल के लिए लोकतांत्रिक सूर्योदय का है। एक साथ नई सरकार केंद्र में भी आएगी और राज्यों में भी। दो शक्तिशाली पड़ोसी देश भारत और चीन बड़े गौर सेनेपाल की राजनीतिक प्रगति पर नजर रखे हुए हैं, क्योंकि सितंबर 2015 में स्वीकार किए गए नए संविधान के मुताबिक वह सरकार लोकतांत्रिक सरकार होगी, जो एक स्वतंत्र गणराज्य का नेतृत्व करेगी, और संभावना यही है कि आगामी सरकार वामपंथी गठबंधन की होगी। आश्चर्यजनक रूप से इतनी मतभिन्नता तथा संघर्षों के इतिहास के बावजूद छोटे-बड़े कई दलों के देश नेपाल में दो बड़े गठबंधन उभरे। वामपंथी और दक्षिणपंथी गठबंधनों ने यह चुनाव कमोबेश सुप्रतिनिधित्व व विकास के मुद््दे पर लड़ा है। एक स्थायी, मजबूत, लोकतांत्रिक सरकार किसी भी प्रकार के द्विपक्षीय समझौतों व संबंधों के लिए माकूल मानी जाती है, नए नेपाल के लिए यह शुभ है।

राजनीतिक मूल्य परिवर्तित होते रहते हैं, पर भौगोलिक और सांस्कृतिक मूल्य अपनी निरंतरता बनाए रखते हैं। भौगोलिक दृष्टि से नेपाल एक स्थलबद्ध देश है, जो तीन तरफ से भारत के राज्यों से घिरा हुआ है और एक तरफ से चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से। भूटान और बांग्लादेश इसकी सीमा में क्रमश: पूर्व और दक्षिण में जुड़ते हैं। हिमालय क्षेत्र में बसे नेपाल में विश्व की सर्वाधिक दस ऊंची पर्वत-चोटियों में से एवरेस्ट सहित आठ चोटियां स्थित हैं और तीन बड़ी नदियां कोसी, गण्डकी और करनाली भी प्रवाहित होती हैं जिनसे महान गंगा नदी प्रणाली निर्मित होती है। नेपाल का सांस्कृतिक स्वरूप मुख्यत: देश की हिंदू और बौद्ध धार्मिक परंपराओं से निर्मित होता है, जिनमें इंडो-आर्यन व तिब्बती-मंगोलियन धारा का समावेशन प्रमुखता से है।

राजनीतिक रूप से इस समय नेपाल में दो वैचारिक धाराएं है- दक्षिणपंथी और वामपंथी। आंतरिक राजनीति में तीन समांतर अस्मिताएं हिमाल, पहाड़ और तराई अपने अपने सम्यक प्रतिनिधित्व और नए नेपाल के आशावान भविष्य में अपनी-अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को आतुर हैं। हाल के वर्षों में वामपंथ के उभार के साथ ही नेपाल में चीन की प्रभावी उपस्थिति महसूस की जा रही है। चीन ने ओबोर (वन बेल्ट वन रोड) योजना के तहत अपने पड़ोसी देशों से भौतिक-आर्थिक संबद्धता पर बेहद महत्त्वाकांक्षी ढंग से कार्य किया है। वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों के बीच ‘रेलवे कूटनीति’ के नाम से मशहूर चीन की इस नीति को नेपाल के संदर्भ में भी परखा जा सकता है।

हाल ही में चीन ने नेपाली मुख्यभूमि को तिब्बत से जोड़ दिया है। चीन ने नेपाल में भारी निवेश किया है, जिसका अधिकांश नेपाल के ढांचागत विकास के लिए इस्तेमाल हो रहा है। भूकम्प के बाद का नेपाल यों भी विकास की चाह शिद््दत से लिये है और चीन 1968 से अस्तित्व में आए नेपाल-चीन मित्रता राजमार्ग (फ्रेंडशिप हाइवे) को और भी सुरक्षित तथा इसे व्यापार व सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए उपयुक्त बनाने में लगा हुआ है। चीन के संबंध नेपाल से पारंपरिक रूप से कोई प्रगाढ़ नहीं रहे हैं, क्योंकि सीमावर्ती तिब्बती संस्कृति से उनका जुड़ाव भी चीनी संस्कृति से स्पष्टतया नहीं जोड़ता, पर अब जबकि तिब्बत एक स्वायत्त क्षेत्र के रूप में चीन का भाग है, चीन के पारंपरिक संबंध नेपाल से प्रमुखता से रेखांकित किए जा रहे हैं।

नेपाल से भारत के अनन्य रिश्ते की मिसाल इतिहास के हर दौर में देखी जा सकती है। भारत-नेपाल मुक्त सीमा प्रणाली से इन संबंधों को दैनंदिन संपर्क के रूप में स्थापित किया गया। चूंकि नेपाल की पहुंच किसी समुद्र तक नहीं है, इसलिए नेपाल अपने द्विपक्षीय और वैश्विक व्यापार के लिए भारत पर निर्भर रहा है। सांस्कृतिक-भौगोलिक संबंधों की परंपरा से राजनैतिक संबंध भी संचालित होते रहे और दुनिया तेजी से बदलती रही। भारत ने नेपाल की बदलती राजनीतिक जमीन को यथासंभव सहारा भी दिया और उनके लोकतांत्रिक अनुभव की यात्रा में साथ भी दिया। भूकम्प से हुई तबाही के मद््देनजर भारत ने यथासंभव मदद तो की, पर इससे संबंधों में कोई नई ऊष्मा नहीं आ सकी। रक्सौल-बीरगंज पॉइंट पर स्थानीय मधेशियों द्वारा की गई पांच महीने की नाकाबंदी- जिससे कि दैनंदिन आवश्यक चीजों की आपूर्ति भी बाधित हुई- की बाबत नेपाल का आम जनमानस यह मान कर चल रहा है कि यह भारत की ओर से अघोषित नाकाबंदी थी और भारत ने इसकी समाप्ति के लिए कोई ठोस कदम भी नहीं उठाया। भारत ने बार-बार दुहराया था कि यह नाकाबंदी नेपाल के आंतरिक तनावों की देन है, पर हालिया चुनावों में इस प्रकरण का वामपंथी दलों ने भरपूर लाभ उठाया।

दरअसल, वामपंथ के मुख्यधारा में आने के कारण नेपाल में आम विमर्शों की तर्क आयोजना ही बदल गई है, पर भारत का कूटनीतिक कुटुंब अब भी नेपाल को उसी पारंपरिक दृष्टि से देखे जा रहा है, जहां नेपाल अपनी सुरक्षा और आर्थिक जीवन के लिए अधिकांशतया भारत पर निर्भर रहता था। आज का नेपाल अपनी भू-राजनीतिक स्थिति की सीमाएं और महत्ता समझता है। नया नेपाल जो कि अब स्वतंत्र संप्रभु लोकतंत्रिक गणराज्य है, वह संबंधों की वही परिभाषा स्वीकार करेगा जो उसकी राष्ट्रहित की अधिकतम व्याख्या से मेल खाएगी। अब जबकि नेपाल अपने राजनीतिक जीवन के नए मुहाने पर खड़ा है, भारत को नेपाल की बाबत अपनी विदेश नीति चीन को ध्यान में रखते हुए ही गढ़नी चाहिए। भारत को भी समझना होगा कि नेपाल अपने राष्ट्रहित के अनुरूप सौदेबाजी (बार्गेनिंग) के लिए स्वतंत्र है और हमारे प्रयास व व्यवहार ऐसे विन्यास को गढ़ने की दिशा में होने चाहिए जिसमें नेपाल को अपना सर्वाधिक हित सधता प्रतीत हो और वह सहजता में इसका निर्वाह कर सके। नेपाल के पास एक सशक्त विकल्प के तौर पर महत्त्वाकांक्षी चीन का विकल्प उपलब्ध है, इसका ध्यान रखना होगा।

चीन से किए गए नेपाल के किसी नए करार अथवा सहमति पर भारत को किसी प्रकार की असुरक्षा प्रदर्शित न करते हुए सावधानी से प्रतिक्रिया देनी चाहिए। भारत को आपसी सहयोग की संभावना खंगालनी होगी और परस्पर विश्वास व सम्मान को बढ़ाना होगा। नेपाल में नई सरकार से दूरगामी संबंधों की नींव सातत्य और पारस्परिकता के आलोक में ही बनेगी और तभी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंध और भी प्रगाढ़ बनेंगे। मौजूद भारत सरकार ने भारतीय हितों को वैश्विक पटल पर बेहतरीन ढंग से तराशा है। पर अपने पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंध ठिठके हुए हैं।
यों तो विश्व-राजनीति में दूसरों से संबंधों की आवश्यकता हरेक राष्ट्र को है, पर चीन की भारत को घेरने की रणनीति के आलोक में हमें अपने पड़ोसियों के साथ संबंध बढ़ाने के एकतरफा प्रयास भी करते रहने होंगे, और इनमें नेपाल के साथ संबंध बढ़ाना अहम ही नहीं, अनिवार्य भी है। नेपाल को भी मालूम है कि एक भरोसेमंद साथी के तौर पर भारत का रिकॉर्ड चीन के मुकाबले कहीं बेहतर है। पर भारत भी सौदेबाजी के उसके संप्रभु अधिकारों की अवहेलना नहीं कर सकता, क्योंकि विश्व-राजनीति में किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रहित ही स्थायी होते हैं।

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