ताज़ा खबर
 

राजनीतिः चकाचौंध से उमजी समस्याएं

प्रकाश प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरनाक असर डाल रहा है। इससे इंसानों और जानवरों की नींद लेने की प्राकृतिक प्रक्रिया पर बुरा असर पड़ रहा है। मनुष्येतर प्राणियों मसलन कीटों, मछलियों, चमगादड़ों, चिड़ियों व जानवरों की प्रवासन प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है। यही नहीं, प्रकाश प्रदूषण का नकारात्मक असर पेड़-पौधों पर भी पड़ रहा है।

Author December 21, 2017 2:17 AM
(fILE pic)

अभिनीत मोहन

पिछले दिनों ‘जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियासाइंसेज’ के शोधकर्ताओं ने चेताया कि दुनिया में प्रकाश प्रदूषण (लाइट पॉल्यूशन) तेजी से बढ़ रहा है और अगर इस पर नियंत्रण नहीं लगा तो आने वाले वर्षों में इंसानों, जानवरों और पेड़-पौधों का जीवन चक्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। शोधकर्ताओं ने ‘साइंड एडवांसेज जर्नल’ में प्रकाशित अपने शोध में बताया है कि अगर रातों को रोशन करने वाली स्ट्रीट लाइट और अन्य साज-सज्जा में इस्तेमाल हो रही कृत्रिम रोशनी को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसके परिणाम भयावह होंगे। शोधकर्ताओं के मुताबिक रात में कृत्रिम प्रकाश की बढ़ती मात्रा पर्यावरण, हमारी सुरक्षा, ऊर्जा खपत और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।

आज विश्व की अधिकांश जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकाश प्रदूषण की चपेट में है। खुले आकाश के नीचे रहने के बावजूद कृत्रिम प्रकाश की अतिशयता के कारण रात में आकाश को निहारना मुश्किल हो गया है। बढ़ते प्रकाश प्रदूषण के कारण कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। शोधकर्ताओं की मानें तो प्रकाश प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरनाक असर डाल रहा है जिससे इंसानों और जानवरों की नींद लेने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। अन्य जीव मसलन कीटों, मछलियों, चमगादड़ों, चिड़ियों व जानवरों की प्रवासन प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है। प्रकाश प्रदूषण का नकारात्मक असर पेड़-पौधों पर भी पड़ रहा है।

HOT DEALS
  • Lenovo K8 Note Venom Black 4GB
    ₹ 11250 MRP ₹ 14999 -25%
    ₹1688 Cashback
  • Apple iPhone SE 32 GB Gold
    ₹ 25000 MRP ₹ 26000 -4%
    ₹0 Cashback

अंधकार से इंसान की बढ़ती दूरी ने कई तरह की बीमारियों को जन्म दिया है। गौर करें तो यह बात पर्याप्त नींद लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि रात्रि में भी प्रकाश के समक्ष होने से भी है जो अप्राकृतिक है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इंसानी शरीर में ‘मेलाटोनिन’ नामक एक हार्मोन का निर्माण तभी संभव होता है जब नेत्रों को अंधकार का संकेत मिलता है। इसका काम शरीर की प्रतिरोधक क्षमता से लेकर कोलेस्ट्राल में कमी अथवा अन्य अति आवश्यक कार्यों का निष्पादन है जो एक स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है। पक्षियों तथा पशुओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की बात करें तो रात्रि में प्रकाश के कारण पक्षी समझ ही नहीं पाते हैं कि सुबह है या रात। कृत्रिम प्रकाश उन प्रवासी पक्षियों को भ्रमित करता है जो वर्ष में मौसम के अनुसार अपना स्थान परिवर्तित करते हैं। यह तथ्य है कि पक्षी चांद और तारों को देख कर ही दिशा का अनुमान लगाते हैं। लेकिन प्रकाशीय क्षेत्र से गुजरते वक्त उनके लिए दिशा का अनुमान असंभव हो जाता है। उसका नतीजा यह होता है कि वे गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच पाते और कई बार तो रास्ता भटकने से प्रतिकूल मौसम की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठते हैं।

पशुओं की बात करें तो वे धूप में अपनी छाया देख स्थान का पता लगाते हैं, वहीं रात्रि का अनावश्यक प्रकाश उनके इस प्राकृतिक गुण को क्षीण कर देता है। पेड़-पौधे दिन में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं वहीं रात का अंधेरा उन्हें एक महत्त्वपूर्ण यौगिक तैयार करने में मदद करता है जिसे फाइटोक्रोम के नाम से जाना जाता है। लेकिन हर वक्त मिल रही रोशनी से उनके गुण और प्रक्रिया बुरी तरह बाधित हो रही है। ऋतु में आए बदलाव को पौधे दिन और रात्रि की अवधि से जानते हैं। पर उन्हें प्रकाश अनियमित ढंग से मिले तो उनके लिए यह फर्क करना कठिन हो जाता है। यह स्थिति उन वनचरों पर भी प्रतिकूल असर डालती है जो पेड़-पौधों पर आश्रित हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि प्रकाश प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं लगने से इसमें तेजी से वृद्धि हो रही है। एक आंकड़े के मुताबिक 2012 से 2016 के बीच दुनिया में रात में कृत्रिम रोशनी वाले क्षेत्र में 2.2 प्रतिशत की सालाना दर से वृद्धि हुई। एक अन्य शोध में 1992 से 2013 के बीच इसमें सालाना दो प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। उम्मीद थी कि सोडियम लाइटों की अपेक्षा एलइडी बल्बों के बढ़े इस्तेमाल से अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे संपन्न देशों में कृत्रिम प्रकाश की चमक में कमी आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जहां अमेरिका पहले जैसा ही रहा वहीं ब्रिटेन व जर्मनी में प्रकाश प्रदूषण पहले से अधिक गहराया है। ऐसा तब हुआ है जब शोध में इस्तेमाल उपग्रह का सेंसर एलइडी लाइट के नीले प्रकाश को मापने में असफल रहा। अगर यह सफल रहता तो समझा जा सकता है कि नतीजे कितने गंभीर दिखते। एक आंकड़े के मुताबिक अमेरिका में अति जगमगाहट व ऊर्जा बर्बादी में प्रतिदिन लगभग बीस लाख बैरल तेल की खपत होती है। अ

मेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक सभी ऊर्जा के तीस प्रतिशत से अधिक की खपत वाणिज्यिक, औद्योगिक और आवासीय क्षेत्रों द्वारा होती है।
अन्य प्रदूषणों की तरह प्रकाश प्रदूषण भी औद्योगिक विकास की ही देन है। इसके स्रोतों में शामिल हैं बाहरी निर्माण और आंतरिक प्रकाश, विज्ञापन, वाणिज्यिक संपत्तियां, कार्यालय, कारखाने, पथ प्रकाश और देदीप्यमान खेल मैदान। प्रकाश प्रदूषण की सर्वाधिक समस्या उत्तरी अमेरिका, यूरोप और जापान के औद्योगिक, घनी आबादी वाले क्षेत्रों में है। यही स्थिति मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के प्रमुख शहरों में भी है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जब प्रकाश के विभिन्न स्रोतों को गलत तरीके से लगाया जाता है तो यह वायुमंडल में विद्यमान कणों को विसर्जित व बिखेर कर संपूर्ण वातावरण में फैल जाता है। जहां जगमगाहट अधिक होती है वहां प्रकाश प्रदूषण भी ज्यादा होता है। थोड़ा अतीत में जाएं तो दुनिया के सामने प्रकाश प्रदूषण का पहला कुप्रभाव तब सामने आया जब 1964 में एक खगोलीय प्रयोगशाला शहर से सुदूर क्षेत्र में बनाई गई।

प्रकाश प्रदूषण का एक अन्य प्रकार होता है जिसे स्काई ग्लो यानी आकाश प्रदीप्ति कहा जाता है। यह अत्यधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में ज्यादा प्रभावी होता है। ऐसा माना जाता है कि जब घरों, सड़कों, बड़े आवासों आदि की प्रकाश किरणें समूहबद्ध होकर ऊपर आसमान की ओर फैलती हैं तो इससे स्काई ग्लो की स्थिति बनती है। यह प्रभाव रात को उजाले में परिवर्तित कर देता है जिससे खगोलशास्त्रियों को अध्ययन में कठिनाई होती है। दरअसल खगोलशास्त्रियों को तारों तथा दूसरे ग्रहों के अध्ययन के लिए घने अंधेरे वाले आकाश की जरूरत होती है। लेकिन कृत्रिम प्रकाश की वजह से रात का अंधेरा कम हुआ है। दैनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रख कर प्रकाश प्रदूषण के गहराते संकट से बचा जा सकता है। अगर गैरजरूरी बत्तियों को बुझाया जाय या बत्तियों को ढंक कर रखा जाए तो ऊपर उठने वाली रोशनी को रोका जा सकता है। इसके अलावा बड़ी-बड़ी इमारतों को नीचे से ऊपर के बजाय ऊपर से नीचे रोशन किया जाए। समाज को रोशनी का इस्तेमाल कुशलता से करना होगा।

वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण आदि को लेकर स्वाभाविक ही हम काफी चिंतित हैं। पर हमें प्रकाश प्रदूषण पर भी सोचना होगा। यह अच्छी बात है कि कई उद्योग-समूह इस समस्या को लेकर संजीदा हैं और जागरूकता को बढ़ावा दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में ‘इंस्टीट्यूशन आॅफ लाइटिंग इंजीनियर्स’ अपने सदस्यों को प्रकाश प्रदूषण और इससे उत्पन समस्याओं के बारे में जानकारी देता है, साथ ही यह भी बताता है कि इसे कैसे कम किया जाय। इमारतों की अनुचित डिजायन भी प्रकाश प्रदूषण का एक अहम कारक है। फिर, प्रकाश प्रणालियों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने के लिए इमारत प्रबंधकों को किसी किस्म का प्रशिक्षण हासिल नहीं है। अगर ऊर्जा संरक्षण का इन्हें प्रशिक्षण दिया जाए तो प्रकाश प्रदूषण पर अंकुश लग सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App