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राजनीतिः अंतरिक्ष में नई संभावनाएं

अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत ने जैसी उपलब्धियां हासिल की हैं वैसी विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में क्यों नहीं हासिल कर पा रहा है? क्यों इसरो एक टापू की तरह नजर आता है? क्या कारण है कि हमारे शोध संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में दोयम दर्जे का अनुसंधान होता है? क्यों हमारे देश में विज्ञान की पढ़ाई-लिखाई का स्तर संतोषजनक नहीं है?

अंतरिक्ष अनुसंधान में इसरो की शानदार उपलब्धियों के कारण हर कोई हमें सलाम कर रहा है।

अंतरिक्ष की दुनिया में भारत ने नया इतिहास रच दिया है। इसरो ने बीते सप्ताह पीएसएलवी-40 सी के जरिए पृथ्वी अवलोकन उपग्रह कार्टोसैट-2 सहित इकतीस उपग्रहों का एक साथ सफल प्रक्षेपण करके एक बार फिर से दुनिया से अपना लोहा मनवाया है। पिछले हफ्ते छोड़े गए उपग्रहों में अमेरिका समेत छह देशों के अट्ठाईस उपग्रह शामिल हैं। यह दूसरा मौका है जब इसरो ने एक साथ इतने उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे। पिछले साल फरवरी में 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेज कर इसरो ने विश्व कीर्तिमान बनाया था। इनमें ज्यादातर विदेशी उपग्रह थे।
कार्टोसैट-2 निश्चित रूप से भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि पिछले साल अगस्त में पीएसएलवी-सी 39 का मिशन फेल हो गया था। इसके बाद प्रक्षेपण यान पीएसएलवी को फिर से यानी पीएसएलवी-40 तैयार किया गया। यह भारत का सौवां अंतरिक्ष मिशन है। स्पष्ट है, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अंतरिक्ष के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे दुनिया के ताकतवर देश भी इसरो का लोहा मानते हैं। लेकिन भारत की इस कामयाबी से पाकिस्तान डरा हुआ है। पाकिस्तान का डर स्वाभाविक है क्योंकि अब आसमान से उसकी एक-एक हरकत पर भारत की नजर रहेगी। आतंकवादी और भारत के खिलाफ अभियान चलाने वाले लोग इस उपग्रह की नजर से बच नहीं पाएंगे। चीन भी चिंतित है। कार्टोसैट-2 के सफल प्रक्षेपण के बाद पाकिस्तान और चीन की प्रतिक्रिया से साफ जाहिर है कि वे अंतरिक्ष में भारत की इस कामयाबी को पचा नहीं पा रहे हैं। इससे यह भी जाहिर है कि कार्टोसैट-2 सुरक्षा के लिहाज से भी काफी अहम है।

एक समय दुनिया भारत को सांप-सपेरों का देश कहती थी, लेकिन आज अंतरिक्ष अनुसंधान में इसरो की शानदार उपलब्धियों के कारण हर कोई हमें सलाम कर रहा है। इसरो ने सफलता के नए-नए अध्याय जोड़े हैं और आज उसकी गिनती दुनिया की सबसे पारंगत अंतरिक्ष एजेंसियों में होती है। यही नहीं, इसरो ने प्रक्षेपण की अपेक्षया सस्ती तकनीक विकसित कर अपने प्रति दुनिया भर में व्यावसायिक आकर्षण भी पैदा किया है। कई देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां और कई निजी व सरकारी एजेंसियां इसरो के साथ करार कर चुकी हैं। यानी देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को कामयाबी से चलाने के साथ-साथ इसरो देश के लिए पैसा कमाने में भी जुटा है। आज विकसित देश भी इसरो की सेवाएं लेने लगे हैं। बहरहाल, काटोर्सेट-2 सैटलाइट भारत के लिए बहु-उपयोगी और निगरानी उपग्रह है जिसकी मदद से रक्षा और कृषि क्षेत्र की तत्काल जानकारी मिलेगी। इतना ही नहीं, कार्टोसैट-2 के जरिए तटीय क्षेत्रों और शहरों पर नजर रखी जा सकेगी। या यों कहें यह उपग्रह अंतरिक्ष में भारत की ‘आंख’ बनेगा और इसके जरिए आसमान से धरती पर नजर रखी जा सकेगी और उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें भेजी जा सकेंगी।

बता दें कि कार्टोसैट-2 एक रिमोट सेंसिंग उपग्रह है। इस उपग्रह को ‘आइ इन द स्काइ’ के नाम से भी जाना जाता है। यह भी कह सकते हैं कि भारत के पास एक ऐसा जासूस है जो धरती पर होने वाली गतिविधियों की नजदीक से निगरानी कर सकता है। कार्टोसैट-2 सी शृंखला के उपग्रह का पहली बार मुख्य प्रयोग 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक के वक्त हुआ था। सेना को नियंत्रण रेखा पर आतंकियों के लान्च पैड तबाह करने में इस शृंखला के उपग्रहसे काफी मदद मिली थी। यानी कार्टोसेट-2 सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।
यों तो भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम आजादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गया था। लेकिन इसे गति मिली 1969 में इंडियन स्पेस रिसर्च आॅर्गनाइजशन (इसरो) यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना के साथ। इसके बाद इसरो ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उसने अंतरिक्ष में छलांग लगाना शुरू किया और साल-दर-साल अनेक देशी और विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचा कर नई ऊंचाइयां छूता गया। बीच-बीच में इसरो को असफलताएं भी मिलीं, लेकिन ऐसे अनुभव विकसित देशों को भी हुए हैं। दरअसल, उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में इस तरह की नाकामी आम बात मानी जाती है। इसरो की नाकामी की दर काफी कम और सफलता की दर बहुत ऊंची रही है।

दरअसल, इसरो के वैज्ञानिकों ने अपनी भूलों से तो सीखा ही, दूसरों की नाकामियों से भी सीखा और आगे बढ़ते गए। उसी का नतीजा है कि आज भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी ताकत बन गया है। इस क्षेत्र में वह अमेरिका, रूस और चीन को टक्कर दे रहा है। साफ है, हर एक सफलता हमें पहले से बड़े लक्ष्य हासिल करने की महत्त्वाकांक्षा भी देती है। इसरो के साथ भी यही हुआ है। इस संगठन की परियोजनाएं भी बीते कुछ दशक में लगातार बड़ी तथा और भी महत्त्वाकांक्षी होती गर्इं। जाहिर है, इसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं रही हैं। उदाहरण के लिए, मंगलयान मिशन। इसरो ने इस मिशन की घोषणा की थी तो किसी को इसकी सफलता पर पक्का यकीन नहीं था। तब तक एशिया में ही तकनीकी रूप से भारत से कहीं ज्यादा उन्नत माने जाने वाले चीन और जापान जैसे देश कोशिश करने के बावजूद मंगल अभियान में सफलता नहीं पा सके थे। चीन का पहला मंगल मिशन यंगहाऊ-1, वर्ष 2011 में असफल हो गया था। इसी तरह 1998 में जापान का मंगल अभियान र्इंधन खत्म होने के कारण नाकाम चुका था। मंगल तक पहुंचने की अमेरिका की भी पहली छह कोशिशें नाकाम रही थीं।

बहरहाल, आज तमाम विकसित देश अपने उपग्रहों को इसरो से प्रक्षेपित करवाना फायदेमंद और सुरक्षित मानते हैं। लिहाजा, आने वाले दिनों में इसरो को कई बड़े प्रक्षेपण करने हैं। वर्ष 2018 में इसरो को औसतन हर महीने एक उपग्रह का प्रक्षेपण करना है। इनमें जीएसएलवी मार्क-3 भी शामिल है। जीएसएलवी से अंतरिक्ष संबंधी कारोबार में भारत की भूमिका और मजबूत होगी। उसके दो साल बाद एसएसएलवी शृंखला की शुरुआत हो सकती है। चंद्रमा और मंगल ग्रह के लिए भारत के नए अभियान भी इस दौर में शुरू होंगे। इस तरह, इसरो अंतरिक्ष बाजार में बहुत बड़ा खिलाड़ी बनने जा रहा है। इसरो की दो विशेषताएं उसे दुनिया में सबसे अलग अंतरिक्ष एजेंसी बनाती हैं। एक तो उसने बहुत ही कम लागत में अभियान पूरा करने में महारत हासिल कर ली है। उसने चंद्रयान को केवल 386 करोड़ और फिर मंगलयान को केवल 450 करोड़ रुपए में अंतरिक्ष में भेज कर किफायती प्रक्षेपण का उदाहरण पेश किया है।

दूसरी बात यह है कि इसरो की असफलता की दर दूसरी सभी अंतरिक्ष एजेंसियों से काफी कम है। उपग्रह प्रक्षेपण की कम लागत तथा उच्च सफलता दर के कारण सारी दुनिया इसरो की तरफ आकर्षित हो रही है। इसरो के वैज्ञानिकों की प्रतिभा, लगन, उद्यमशीलता और परिश्रम की जितनी तारीफ की जाए, कम होगी। पर अहम सवाल यह है कि अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत ने जैसी उपलब्धियां हासिल की हैं वैसी विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में क्यों नहीं हासिल कर पा रहा है? इसरो क्यों एक टापू की तरह नजर आता है? क्या कारण है कि हमारे शोध संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में दोयम दर्जे का अनुसंधान होता है? क्यों देश में विज्ञान की पढ़ाई-लिखाई का स्तर संतोषजनक नहीं है? क्यों भारत की झोली में विज्ञान क्षेत्र के नोबेल पुरस्कार नहीं आ रहे हैं? इन सवालों के जवाब तलाशना इसलिए अति आवश्यक है, क्योंकि कोई भी देश विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी में पिछड़ कर आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना पूरा नहीं कर सकता।

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