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राजनीतिः कैसे लगे लगाम आतंकियों के पैसे पर

अफीम की खेती से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा तालिबान कमांडरों को जाता है। पिछले सत्रह सालों से नाटो सेना की मौजूदगी के बावजूद अफगानिस्तान में अफीम की खेती में बेहताशा बढ़ोतरी हुई है। तालिबान के ज्यादातर कमांडर पाकिस्तानी क्षेत्र से अफीम का कारोबार करते हैं। अफीम की खेती को लेकर नाटो सेना, अफगानिस्तानी हुक्मरान और तालिबान के बीच एक तरह से मौन सहमति है। अफीम कारोबार से होने वाली आमद का खासा हिस्सा अफगान सरकार के ताकतवर लोगों को जाता है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

तमाम प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों को कमजोर करने के मोर्चे पर भारत सहित पश्चिमी देशों को खास सफलता नहीं मिली है। भारत के लिए इससे ज्यादा निराशाजनक बात क्या हो सकती है कि इस्लामाबाद हाइकोर्ट ने आतंकी हाफिज सईद की पार्टी मिल्ली मुसलिम लीग के पंजीकरण का आदेश दिया है। इस आदेश के बाद हाफिज की पार्टी इस साल होने वाले नेशनल असेंबली के चुनाव लड़ सकेगी। इस्लामाबाद हाइकोर्ट ने पाकिस्तानी चुनाव आयोग के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें हाफिज की पार्टी का पंजीकरण संबंधी आवेदन रद्द कर दिया गया था। हाइकोर्ट ने चुनाव आयोग को हाफिज की पार्टी के पंजीकरण का आदेश दिया है। यही नहीं, हाफिज सईद ने पाकिस्तान सरकार के आतंकवाद निरोधी अध्यादेश-2018 को भी इस्लामाबाद हाइकोर्ट में चुनौती दी है। पाकिस्तान के अंदर तमाम आतंकी संगठनों की गतिविधियां पहले की तरह तेज हैं। मतलब साफ है। अमेरिका और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के दबाव के बावजूद पाकिस्तान सरकार और सेना आतंकवाद विरोधी मोर्चे पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही हैं। भारत की चिंता यही है। हाफिज सईद की खुली गतिविधियों पर भारत ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। हालांकि इसका शायद ही कोई असर पाकिस्तान पर दिख रहा है।

कुछ समय पहले ही अंतरराष्ट्रीय संस्था- वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) ने पाकिस्तान को आतंकी पूंजी निगरानी सूची में डालने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद उम्मीद है कि पाकिस्तान सरकार अपने यहां सक्रिय आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। कार्रवाई नहीं करने की स्थिति में पाकिस्तान को जून में निगरानी सूची में डाल दिया जाएगा। कार्य बल के इस फैसले के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर खासा प्रभाव पड़ेगा। इस मजबूरी में पाकिस्तान आतंकी संगठनों पर कार्रवाई करेगा। तर्क दिया जा रहा है कि निगरानी सूची में आने के बाद पाकिस्तान का अंतराष्ट्रीय व्यापार घटेगा और विदेशी निवेश पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। लेकिन फिलहाल पाकिस्तान पर कोई असर पड़ता नहीं दिखाई दे रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने साफ कर दिया है कि निगरानी सूची में आने के बाद भी उसकी अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जब 2012 से 2015 तक पाकिस्तान को इस सूची में डाला गया था, उस दौरान भी उसने अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ कई समझौते किए थे। इस समय पाकिस्तान में सबसे बड़ा निवेश चीन का है। पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाले जाने की सूरत में चीन उसके प्रति कितना सख्त होगा, यह समय बताएगा।

पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों के पास पूंजी जुटाने के कई स्रोत हैं। अफगानिस्तान में सक्रिय अफगान-तालिबान, भारत विरोधी लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और पाकिस्तान विरोधी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान कई तरीकों से धन इकट्ठा करते हैं। पैसा जुटाने के लिए आतंकी संगठनों का सबसे बड़ा जरिया अपहरण और वसूली है। इसके अलावा आतंकी संगठनों ने आधुनिक व्यवसायों में भी निवेश कर रखा है। कई कंपनियां बना कर आतंकी संगठनों ने परिवहन, अचल संपत्ति और निर्माण के कारोबार में निवेश कर रखा है। पाकिस्तानी सुरक्षा एजंसियां और सरकार इसे रोक पाने में नाकाम रही हैं। इतना ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय एजंसियां भी आतंकी संगठनों के कारोबार की तरफ से आंखें मूंदे हुए हैं। यूनाइटेड स्टेट मिलिट्री एकेडमी के कॉम्बेटिंग टेरेरिज्म सेंटर ने हक्कानी नेटवर्क के वित्तीय कारोबार पर विस्तृत अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में हक्कानी नेटवर्क के तमाम कारोबार और पूंजी संग्रह के तरीकों की जानकारी दी गई है।

हक्कानी नेटवर्क ने पाकिस्तान और उसके बाहर अचल संपति और निर्माण क्षेत्र में खासा निवेश किया हुआ है। अफगान तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान के पाकिस्तान के सिंध और खैबर पख्तूनवा में परिवहन क्षेत्र में कारोबार है। ट्रांसपोर्ट यूनियनों पर तालिबान समर्थित गुटों का कब्जा है। कराची, लाहौर सहित कुछ बड़े शहरों के अचल संपति कारोबार में तालिबान का पैसा लगा है। पाकिस्तान से बाहर दुबई, अबूधाबी, दोहा जैसे अरब शहरों में हक्कानी नेटवर्क ने अचल संपति कारोबार में खासा पैसा लगा रखा है। इसकी विस्तृत जानकारी अमेरिकी, जर्मन, ब्रिटिश खुफिया एजंसियों को है। यही नहीं, नाटो सप्लाई लाइन को सुचारु रूप से चलने देने के लिए भी अमेरिका से तालिबान वसूली करता है।
आतंकी संगठनों की इस तरह से धन उगाही के लिए अकेले पाकिस्तान जिम्मेवार नहीं है। वैसे भी पाकिस्तानी सुरक्षा एजंसियों से आतंकियों पर कार्रवाई की उम्मीद करना फिजूल है। पर पश्चिमी मुल्कों की एजंसियां भी इस मामले में कार्रवाई करने में विफल रही हैं। आतंकियों को मिलते रहने वाले धन को लेकर कई पश्चिमी देशों और आतंकी संगठनों के बीच लुकाछिपी का खेल चलता है। वर्ष 2008 से 2014 के बीच फ्रांस, इटली और जर्मनी जैसे कई यूरोपीए देशों और आतंकी संगठनों के बीच पैसे के लेन-देन की कलई खुल चुकी है।
आतंकी संगठनों की एक और मुख्य पूंजी अफीम की खेती है। पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी पूंजी का एक बड़ा स्रोत अफगानिस्तान में अफीम की खेती है। लेकिन नाटो सेना ने अफीम की खेती को खत्म करने के प्रयास नहीं किए। अफीम की खेती से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा तालिबान कमांडरों को जाता है। पिछले सत्रह सालों से नाटो सेना की मौजूदगी के बावजूद अफगानिस्तान में अफीम की खेती में बेहताशा बढ़ोतरी हुई है। तालिबान के ज्यादातर कमांडर पाकिस्तानी क्षेत्र से अफीम का कारोबार करते हैं। अफीम की खेती को लेकर नाटो सेना, अफगानिस्तानी हुक्मरान और तालिबान के बीच एक तरह से मौन सहमति है। अफीम कारोबार से होने वाली आमद का खासा हिस्सा अफगान सरकार के ताकतवर लोगों को जाता है।

दरअसल, आतंकियों को होने वाली फंडिंग को खत्म करने के नाम पर ढोंग रचा गया है। इसलिए आतंकी पूंजी को रोकने के लिए जरूरी है कि दुनिया के कई मुल्कों में फैले आतंकी संगठनों के कारोबार को ध्वस्त किया जाए। साथ ही, अफगानिस्तान में अफीम की खेती को पूरी तरह नष्ट करना होगा। लेकिन हालात इसके उलट हैं। अफगानिस्तान में अफीम की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 1994 में अफगानिस्तान में मात्र तीस हजार हेक्टेयर में अफीम की खेती होती थी। लेकिन दो दशक के भीतर ही इसमें भारी इजाफा होता चला गया। वर्ष 2016 में अफीम की खेती का रकबा बढ़ कर दो लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया। और 2017 में यानी एक साल में ही तीन लाख तीस हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया। पिछले साल नब्बे लाख किलो अफीम की खेती हुई। इस समय दुनिया के कुल अफीम उत्पादन का सत्तर फीसद हिस्सा अफगानिस्तान में हो रहा है। अफीम संग्रहण के लिए तालिबान ने अफगानिस्तान में लगभग ढाई हजार गोदाम बना रखे हैं।

इन परिस्थितियों में पाकिस्तान को सिर्फ निगरानी सूची में डाले जाने से कोई हल नहीं निकलेगा। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को कई मोर्चों पर एक साथ कदम उठाने होंगे। अफगानिस्तान में अफीम की खेती को खत्म करने के लिए अफगान किसानों को गेहूं और अन्य फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करना होगा। इसके लिए किसानों को उनकी फसल का अच्छा मूल्य देना होगा। लेकिन इस दिशा में अफगान सरकार की ओर से कोई कोशिश नहीं हुई। किसानों का आरोप है कि गेहूं समेत अन्य फसलों की कीमत उन्हें बाजार में मिलती ही नहीं। जबकि तालिबान कमांडर उन्हें अफीम की खेती के लिए अग्रिम राशि देते हैं। एक किलो अफीम के एवज में जहां किसानों को दो सौ से तीन सौ डॉलर मिल रहे हैं, वहीं उन्हें दस किलो गेहूं के एवज में एक डॉलर भी नहीं मिलता। ऐसे में कैसे तो रुकेगी अफीम की खेती और कैसे आतंकियों को पैसा पहुंचना बंद होगा?

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