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राजनीतिः बिफरती नदियां और खतरे

बगैर सोचे-समझे नदी-नालों पर बांध बनाने के कुप्रभावों के कई उदाहरण पूरे देश में देखने को मिल रहे हैं। वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं जो बाढ़ की विभीषिका में उत्प्रेरक का काम कर रहे हैं। जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट का जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है। फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है।

मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों से पैदा हुई त्रासदी है।

देश में हर साल की तरह ही इस बार फिर आधे से ज्यादा हिस्से में बाढ़ आई हुई है। असम जैसे राज्य में बाढ़ से कई लोग मारे जा चुके हैं और पच्चीस जिले पूरी तरह जलमग्न हैं। असम, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश तो बारिश के मौसम में हर साल ही हलकान रहते हैं लेकिन इस बार तो जम्मू-कश्मीर, गुजरात का सौराष्ट्र और राजस्थान के शेखावटी इलाके में भी बाढ़ जैसे हालात देखने को मिल रहे हैं। भयंकर सूखे से हैरान मध्यप्रदेश के करीब बारह जिलों की छोटी नदियां आषाढ़ की पहली फुहारों में ही उफन गर्इं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशक पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफन रही हैं और मौसम बीतते ही उन इलाकों में फिर से जल संकट छा जाता है। गंभीरता से देखें तो यह छोटी नदियों के लुप्त होने, बड़ी नदियों पर बांध और मध्यम नदियों के उथले होने का दुष्परिणाम है। बाढ़ अकेले कुछ दिनों की तबाही ही नहीं लाती है बल्कि वह उस इलाके के विकास को भी सालों पीछे ले जाती है।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी। सन 1960 में यह बढ़ कर ढाई करोड़ हेक्टेयर हो गई। इसके बाद 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया। अभी यह तबाही कोई सात करोड़ हेक्टेयर होने की आशंका है। पिछले साल आई बाढ़ से साढ़े नौ सौ से अधिक लोगों के मरने, तीन लाख मकान ढहने और चार लाख हेक्टेयर में खड़ी फसल तबाह हो जाने की जानकारी सरकारी सूत्र देते हैं। यह जान कर आश्चर्य होगा कि सूखे की मार झेलने वाला मरु प्रदेश राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं रह पाता है।
देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है।

असम का जीवन कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विनाश फैलाने लगती हैं। हर साल लाखों बाढ़ पीड़ित इधर-उधर भागते हैं। बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर फिर से वहीं बसा दिया जाता है जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय ही होता है। यहां के पहाड़ों की बेतरतीब खुदाई कर हुआ अनियोजित शहरीकरण और सड़कों का निर्माण भी इस राज्य में बाढ़ से होने वाली तबाही के लिए काफी हद तक दोषी है। सनद रहे, वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है और भूमि पर मिट्टी की ऊपरी परत को गहराई तक छेद देता है। यह मिट्टी बह कर नदी-नालों को उथला बना देती है और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं। हाल ही में दिल्ली में एनजीटी ने मेट्रो कारपोरेशन को चेताया है कि वह यमुना के किनारे जमा किए गए हजारों ट्रक मलबे को हटवाए। यह पूरे देश में हो रहा है कि विकास कार्यों के दौरान निकली मिट्टी व मलबे को स्थानीय नदी-नालों में चुपके से डाल दिया जा रहा है और थोड़ी-सी बारिश में ही इन जल निधियों का प्रवाह कम हो जाता है व पानी बस्ती, खेत, जंगलों में घुसने लगता है।

देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का सोलह फीसद बिहार में है। यहां कोशी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं। इन नदियों पर तटबंध बनाने का काम केंद्र सरकार से पर्याप्त सहायता नहीं मिलने के कारण अधूरा पड़ा है। यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं। कोशी नदी के ऊपरी भाग पर कोई सत्तर किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है। लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाले करीब बीस करोड़ रुपए का बोझ बिहार सरकार को झेलना पड़ता है। हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल रहे नहीं हैं।
कोशी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे चार सौ गांव डूब में आ गए हैं। कोशी की सहयोगी कमला-बलान नदी के तटबंध का तल गाद के भराव से ऊंचा हो जाने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती है। फरक्का बांध की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मुंगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है। गौरतलब है, आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार ने बाढ़ नियंत्रण में बड़े बांध या तटबंधों को तकनीकी दृष्टि से उचित नहीं माना था। तत्कालीन गवर्नर हेल्ट की अध्यक्षता में पटना में हुए एक सम्मेलन में डॉ राजेंद्र प्रसाद सहित कई विद्वानों ने बाढ़ के विकल्प के रूप में तटबंधों की उपयोगिता को नकारा था। इसके बावजूद आजादी के बाद हर छोटी-बड़ी नदी को बांधने का काम अनवरत जारी है।

बगैर सोचे-समझे नदी-नालों पर बांध बनाने के कुप्रभावों के कई उदाहरण पूरे देश में देखने को मिल रहे हैं। वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का काम कर रहे हैं। जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट का जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, साथ ही सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है। फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है। यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है और बाढ़ आती है।

कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा अनियंत्रित शहरीकरण ही है। इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है। इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलबा नदी-नालों में अवरोध पैदा करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और गंभीर हो जाता है। हिमालय, पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है। इसकी विकास प्रक्रिया सतत जारी है, तभी इसे ‘जीवित पहाड़’ भी कहा जाता है। इसकी नवोदित हालत के कारण यहां का बड़ा भाग कठोर-चट्टानें न होकर मिट्टी है। बारिश या बर्फ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा कर लाता है। पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है। इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है। इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं। लेकिन अब इन नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है। इससे मिट्टी बांधों में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है।

मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों से पैदा हुई त्रासदी है। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जो बाढ़ जैसी विभीषिका से बचा सकते हैं।

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