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राजनीतिः उर्वरता खोती खेतों की मिट्टी

हमारे देश में होने वाली पारंपरिक खेती में मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने पर खास ध्यान दिया जाता रहा है। लेकिन बीते पचास सालों में जिस तरह हमने प्राकृतिक व्यवस्था को तहस-नहस कर उत्पाद आधारित खेती व्यवस्था को अपना लिया है, खेती में अधिक से अधिक पैदावार के लिए अब रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल शुरू कर दिया है, उससे मिट्टी की उर्वरता क्षीण हो गई है।

Author Updated: July 17, 2019 2:34 AM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Express Photo)

मनीष वैध

देश के कई इलाकों में खेतों की मिट्टी अपनी ताकत खोती जा रही है। यह पर्यावरण के साथ हमारी खेती और सेहत के लिए बड़े खतरे की घंटी है। इससे खेती का रकबा घट कर बंजर जमीन का इलाका बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। वहीं हमारी सेहत पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। इससे भी बड़ी चिंता यह है कि इस महत्त्वपूर्ण विषय पर कहीं कोई बात नहीं हो रही है। न तो सरकारें और न ही समाज इसे लेकर चिंतित नजर आ रहा है। दरअसल, खेतों की मिट्टी सैकड़ों सालों से अपनी उर्वरा शक्ति को बनाए हुए हमारे लिए अन्न और अन्य तरह के खाद्य पदार्थ उपजाती रही है। साल दर साल किसान अपने परंपरागत ज्ञान के आधार पर खेती की जमीन को पोषक तत्त्वों से युक्त बनाए रखते रहे हैं।

इसके लिए वे प्राकृतिक खाद, फसल चक्र आदि कई पारंपरिक और प्राकृतिक तौर-तरीकों से खेतों की मिट्टी को सहेजते थे। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मिट्टी में बारह तरह के पोषक तत्त्व होते हैं जो मिट्टी में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों में भी पहुंचते हैं और इनका उपयोग करने वाले व्यक्ति को सेहतमंद बनाए रखते हैं। हमारे देश में होने वाली पारंपरिक खेती में मिट्टी की ताकत बनाए रखने पर खास ध्यान दिया जाता रहा है। लेकिन बीते पचास सालों में जिस तरह हमने प्राकृतिक व्यवस्था को तहस-नहस कर उत्पाद आधारित खेती व्यवस्था को अपना लिया है, खेती में अधिक से अधिक पैदावार के लिए अब रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल शुरू कर दिया है, उससे खेतों की मिट्टी की ताकत क्षीण हो गई है।

भारत सरकार का कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय देशभर में मिट्टी की जांच कर किसानों को बता रहे हैं कि उनके खेतों की मिट्टी की सेहत कैसी है। मिट्टी की सेहत खराब होने से फसलें तो प्रभावित होती ही हैं, उनमें पर्याप्त पोषक तत्त्वों का संतुलन भी बिगड़ जाता है। इसके लिए खेतों की मिट्टी के नमूने की जांच कर संबंधित किसान को उसके खेत की जमीन की रिपोर्ट (मृदा स्वास्थ्य कार्ड) भी सौंपी जा रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मिट्टी की जांच में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इसमें हुए खुलासे से पता चला है कि खेतों की मिट्टी में मौजूद बारह तत्त्वों में से अधिकांश तत्त्व या तो बहुत कम हैं या फिर बहुत ज़्यादा हैं। यहां तक कि इनमें से छह तत्त्व पूरी तरह असंतुलित हैं। ऐसी मिट्टी में उपजे खाद्य पदार्थ खाने से लोगों में कुपोषण और कई तरह की बीमारियां घर कर रही हैं। मिट्टी के अंसतुलित पोषक तत्त्वों में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, सल्फर और जिंक शामिल हैं। जाहिर है, इन जरूरी पोषक तत्त्वों की कमी के कारण ही कुपोषण और खतरनाक बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं। शरीर को जिस तरह पोषक तत्त्वों की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह एक पौधे और फसल के लिए भी मिट्टी में तमाम तरह के तत्त्वों की जरूरत होती है। इन दिनों शरीर के लिए जरूरी अनाज, सब्जियों में पोषक तत्त्वों की कमी मिट्टी में आई पोषक तत्त्वों की कमी का नतीजा है।

मिट्टी में जिंक की कमी से अनाज में भी इसकी कमी पाई जाती है। शरीर में जिंक की कमी के कारण रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता घटती है। इससे निमोनिया, जुकाम, सांस संबंधी समस्याएं हो जाती हैं। सल्फर की कमी के कारण शरीर में नाखून और बालों की परेशानियां होने लगती है। आयरन की कमी से खून की कमी होती है। शरीर में बीस प्रतिशत आयरन की मात्रा जरूरी है। खून का प्रमुख घटक लाल रक्त कणिकाएं तैयार करने में आयरन की अहम भूमिका होती है। आयरन की कमी के चलते एनिमिया हो जाता है। गर्भवती महिलाओं में एनिमिया होने से कुपोषित बच्चे जन्म लेते हैं और जन्म के बाद भी उनके दूध में पर्याप्त पोषकता नहीं रहती है। नाइट्रोजन की कमी या अधिकता यानी प्रोटीन की कमी या अधिकता होती है। प्रोटीन से शरीर की कोशिकाएं तैयार होती है। प्रोटीन शुगर को नियंत्रित करने का भी काम करता है। अधिकांश खेतों में फास्फोरस की कमी पाई गई है। फास्फोरस की कमी के चलते हड्डियों की बीमारियां होने लगती है। इससे घुटने, कमर और हड्डियों से सबंधित बीमारियां होती हैं। कई जगह पोटेशियम की मात्रा में भी असंतुलन पाया गया। इसके असंतुलन से दिमागी रोग होते हैं।

मिट्टी में सभी जरूरी तत्त्वों का अपना-अपना काम होता है। बीजों के अंकुरण से लगा कर उनके विकास और खाद्यान्न का पोषक होना इन्हीं तत्त्वों पर निर्भर करता है। मिट्टी के पर्याप्त तत्त्वों वाले अनाज को खाने से ही हमारे शरीर में भी पोषण मिलता है। ज्यादातर बीमारियां इसीलिए हो रही हैं कि रासायनिक खाद, कीटनाशक और फसल चक्र बिगड़ने से जमीन की उर्वरता यानी मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्व खत्म हो रहे हैं। मध्यप्रदेश के डिंडौरी जैसे ठेठ आदिवासी और जंगल से सटे इलाके में भी मिट्टी में घटते पोषक तत्त्वों की वजह से इस इलाके में होने वाले अनाज और सब्जियों में भी पोषक तत्त्वों की भारी कमी हो रही है। हैरानी की बात यह है कि अरबों-खरबों रुपए लगा कर सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार करवा कर मिट्टी की सेहत की जांच तो करवा रही है, लेकिन जांच में मिट्टी के कमजोर मिलने पर संबंधित किसानों को मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए फिर से रासायनिक खाद डालने की सलाह दी जा रही है जो बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। डिडौंरी स्थित मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला में अब तक जिले के एक लाख तियालीस हजार खसरों (जमीन खाते) के अट्ठाईस हजार मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार किए जा चुके हैं। यहां के अधिकांश खेतों की मिट्टी में पोषक तत्त्वों का भारी असंतुलन देखने को मिला।

इस जिले में गौंड, सहरिया, बेगा और अगरिया सहित महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ जनजातियों के लोग बड़ी संख्या में रह रहे हैं। इन जनजातियों में कुपोषण तेजी से फैल रहा है। यहां के ठेठ आदिवासी इलाके में अगरिया जनजाति बहुल गांव बरगा कुरैली में लोगों के पास दो वक्त के खाने का बंदोबस्त तो है। स्कूल और आंगनबाड़ियों में सरकारी खाना भी मिल रहा है। कुछ लोग आज भी उनके खेतों का अनाज ही खा रहे हैं। यहां ज्यादातर अगरिया औरतों में एनिमिया यानी खून की कमी है। यहां के कुछ नौजवानों को मधुमेह और रक्तचाप जैसी बीमारियां हैं। डिंडौरी के खेतों की मिट्टी में जरूरी तत्त्वों का बेहद असंतुलन है। इन्हें संतुलित करने के लिए रासायनिक खाद डालने की सलाह दी जाती है। इसके साथ जैविक खाद को मिलाने की सलाह भी देते हैं। जो लोग पूरी तरह जैविक खाद के इच्छुक होते हैं उन्हें वैसी सलाह देते हैं लेकिन ऐसे लोग कम ही मिलते हैं। सभी प्रयोगशाला वाले रासायनिक खाद की सलाह ही देते हैं।
इस सबमें बुरी बात यह है कि हर किसान रासायनिक खाद के दुष्परिणामों को जानने-समझने के बाद भी इन उर्वरकों का लगातार उपयोग अपने खेतों में कर रहा है। इससे मिट्टी कमजोर से कमजोर होती जा रही है और उत्पादन भी कम होता जा रहा है। किसानों के पास उर्वरकों के विकल्प नहीं हैं। जैविक खाद और जैविक खेती के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों के बावजूद अब तक अधिकांश किसान अब भी इससे गुरेज करते नजर आते हैं। न तो किसानों को इस बारे में यथोचित जानकारी है और न ही अब तक सरकार ने भी इसके लिए कोई ठोस कदम उठाए हैं।

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