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राजनीतिः डरे हुए समाज में खुशी की खोज

तेज आर्थिक तरक्की और एक छोटे-से तबके की खुशहाली ने ज्यादातर लोगों में अच्छी जिंदगी की महत्त्वाकांक्षा तो जगा दी है, लेकिन उसे हासिल करने के साधन उनके पास नहीं हैं। ऐसे में ज्यादातर लोग दुखी महसूस करते हैं। समाजशास्त्रियों का मत है कि भारतीयों में अब असंतोष काफी ज्यादा है, इस कारण प्रसन्नता के पैमाने पर भारत का स्थान लगातार नीचे आ रहा है।

Author February 19, 2018 2:59 AM
(File PIC)

दिल्ली सरकार ने घोषणा की है कि वह अपने स्कूलों में अगले वर्ष से नर्सरी से आठवीं कक्षा के छात्रों को हैप्पीनेस यानी खुशी का पाठ पढ़ाएगी। इसके लिए एक पीरियड तय होगा। इसी तरह की एक पहल अमेरिका में हुई है जहां येल विश्वविद्यालय में खुशी के पाठ्यक्रम के लिए रेकॉर्ड संख्या में छात्रों ने पंजीकरण कराया है। भारत और अमेरिका, दोनों जगहों पर हालांकि पढ़ाई के जरिये प्रसन्नता की खोज के स्तर बिलकुल अलग हैं। दिल्ली के स्कूलों में शिक्षा विभाग यह मानते हुए नर्सरी से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को इसकी शिक्षा देने की तैयारी कर रहा है कि आज के नकारात्मक माहौल में बच्चों का तनावों से बचते हुए खुश रहना जरूरी है, चाहे परीक्षा में नंबर कुछ कम क्यों न रह जाएं।

यह पाठ्यक्रम किसी परीक्षा का मोहताज नहीं होगा, बल्कि स्कूली गतिविधियों के आधार पर समय-समय इसमें बच्चों की खुशी का स्तर मापा जाएगा। येल विश्वविद्यालय का मामला भी कुछ ऐसा ही है, पर इसके मुकाबले थोड़ा गंभीर है। इस विश्वविद्यालय में इसी साल शुरू किए जा रहे पाठ्यक्रम ‘मनोविज्ञान और अच्छा जीवन’ (साइकोलॉजी एंड द गुड लाइफ) का उद््देश्य इस पाठ्यक्रम को चलाने वाली प्रोफेसर डॉ. लाउरी सैंटोस के मुताबिक युवाओं को आज जिस तरह कैरियर और काम के दबावों से गुजरना पड़ रहा है, उसमें उनकी व्यक्तिगत खुशियों के मौके खत्म हो गए हैं, इसलिए उन्हें यह बताना और समझाना जरूरी है कि कैसे वे अपने जीवन में खुशियों को तलाश करें, उन्हें सहेजें और प्रसन्नता भरा जीवन व्यतीत करें।

आज से पचास-साठ साल पहले की दुनिया से आज के विश्व की तुलना करें, तो चिकित्सा विज्ञान से लेकर हर तरह की तरक्की को देख कर लगता है कि इंसान अब ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा आनंदित है। उसे खुशी देने वाली हर चीज दुनिया में मौजूद है और उसकी संपन्नता का स्तर भी ऐसा है कि सभी नहीं तो अच्छा जीवन बिताने लायक खुशियां वह अपने लिए जुटा सकता है। हालांकि गरीबी, भुखमरी और कुपोषण जैसी समस्याओं का निराकरण अभी पूरी तरह नहीं हुआ है, लेकिन विकसित और विकासशील देशों में जिंदगी पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई है। टीवी, सिनेमा, इंटरनेट से लेकर मनोरंजन के नए-नए साधन भी आज लोगों के पास हैं जिनसे वे अपना जी बहला सकते हैं। तो सवाल है कि आखिर इसकी जरूरत क्यों पैदा हो रही है कि बच्चों और युवाओं को खुशी की तलाश करना जरूरी हो गया है। आश्चर्य यही है कि यह तलाश करने वाली पीढ़ी इक्कीसवीं सदी में पैदा हुई एकदम युवा है।

अमेरिका हो या भारत, कॉलेज में दाखिले, पढ़ाई और सोशल मीडिया के दबावों के बीच इस नई पीढ़ी को अपनी नींद से लेकर सामाजिक जीवन और कई बार जिंदगी तक से समझौते करने पड़ रहे हैं, जिसमें इस पीढ़ी को अपनी जिंदगी निरर्थक लगने लगती है। यह पीढ़ी कंप्यूटर-मोबाइल की स्क्रीन और वास्तविक जिंदगी की चुनौतियों के बीच फंस गई है और अजीब-सी बेचैनी और छटपटाहट का अनुभव कर रही है। पढ़ाई और कैरियर का इतना ज्यादा दबाव इसके ऊपर है कि कई बार नौबत आत्महत्या तक पहुंच जाती है। कोटा में कोचिंग करने वाले युवाओं ने पिछले कुछ वर्षों में जैसे-जैसे आत्मघाती कदम उठाए हैं, उनसे साबित हो रहा है कि यह नई पीढ़ी भी खुद को हताश और लाचार महसूस कर रही है। उसके सामने शानदार वेतन वाली नौकरी, बड़ी कार, सज्जित घर जैसे बड़े-बड़े सपनों की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, जिन्हें पार करना तो दूर, छूना भी मुश्किल लग रहा है। ऐसे में खुद को लज्जित महसूस करने वाले युवाओं के सामने आज यही सवाल सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है कि आखिर जिंदगी में खुशी का असली मतलब क्या है और यह कैसे हासिल की जा सकती है।
असल में, खुशी को लेकर जो स्थितियां अमेरिका जैसे विकसित देशों में हैं, लगभग वैसे ही हालात अब भारत जैसे विकासशील देशों में भी बन गए हैं। स्थिति इतनी विकट और विस्फोटक हो गई है कि अब भारत के नागरिक प्रसन्नता के किसी भी सूचकांक पर अपने पड़ोसी देशों चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे नजर आते हैं।

यहां तक कि सोमालिया, ईरान और लगातार युद्ध से आक्रांत फिलस्तीन भी भारत से ऊपर हैं। इसकी एक पुष्टि संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था ‘सस्टेनेबल डिवेलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क’ (एसडीएसएन) द्वारा हर साल जारी किए जाने वाले ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स’ (विश्व प्रसन्नता सूचकांक) से होती है। जब से (वर्ष 2012 से) इस संस्था ने यह रिपोर्ट जारी करना शुरू किया है, भारत का स्थान 157 देशों की सूची में काफी पीछे 100 के पार ही रहता आया है। वर्ष 2016 में भारत 157वें नंबर पर था, जबकि हमसे ऊपर बांग्लादेश (110), पाकिस्तान (92) और सोमालिया (76) जैसे देश थे, जिन्हें हम सुशासन वाले देश नहीं मानते। उल्लेखनीय यह है कि इस सूची में पांच साल साल पहले, यानी 2013 में भारत 111वें नंबर पर था। जबकि इस बीच भारत में काफी ज्यादा आर्थिक तरक्की की बातें हुई हैं, अर्थव्यवस्था ऊपर उठी है और जीवन-स्तर में सुधार के दावे किए जा रहे हैं।

यों संयुक्त राष्ट्र की इस कोशिश के पीछे तर्क यह है कि दुनिया के तमाम देशों में तरक्की को नापने के कई पैमाने हैं, लेकिन सारी तरक्की का उद््देश्य यही है कि नागरिक खुश रहें। यह खुशी कई सामाजिक-आर्थिक कारणों पर निर्भर होती है, जैसे शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक स्थिति वगैरह, और संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की राय है कि इन सब कारणों की अलग-अलग पड़ताल करना तो ठीक है, लेकिन इनका एक समन्वित जायजा लेना भी जरूरी है। उनका कहना है कि खुशी के मामले में गैर-बराबरी किसी भी समाज में या विभिन्न समाजों के बीच विषमता को नापने का बेहतर तरीका है। अगर स्विट्जरलैंड और डेनमार्क इस पैमाने पर सबसे ऊपर हैं और सीरिया या बुरुंडी के नागरिकों में प्रसन्नता का अनुपात सबसे कम पाया गया है, तो इन देशों के बीच के फर्क को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।

देशों में खुशी का स्तर नापने के लिए जो मानक इस्तेमाल किए जाते हैं, उनमें जिनमें प्रतिव्यक्ति आय, दीर्घ जीवन की संभावना, सामाजिक सुरक्षा और अपने फैसले खुद करने की आजादी मुख्य हैं। हमारे लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर आर्थिक तरक्की के दावों के बाद भी भारत इस सूची में पीछे क्यों रहता है। क्यों हमारे देश में अब युवा-किशोर हताशा-निराशा महसूस कर रहे हैं और आत्महत्या जैसी नकारात्मक चीजों की तरफ बढ़ रहे हैं। अर्थशास्त्री कहते हैं कि दुनिया में सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में बेहद गरीबी में जीने वालों की तादाद काफी बड़ी है। इसके अलावा कुपोषण, स्वास्थ्य की समस्याएं हैं, शिक्षा की सुविधाओं में कमी है और सामाजिक विषमता और रहन-सहन में गैरबराबरी बहुत ज्यादा है जो लोगों को खुश नहीं रहने देती है।

इस बीच तेज आर्थिक तरक्की और एक छोटे-से तबके की खुशहाली ने ज्यादातर लोगों में अच्छी जिंदगी की महत्त्वाकांक्षा तो जगा दी है, लेकिन उसे हासिल करने के साधन उनके पास नहीं हैं। ऐसे में हताश होकर ज्यादातर लोग दुखी महसूस करते हैं। समाजशास्त्रियों का मत है कि भारतीयों में अब असंतोष काफी ज्यादा है, इस कारण प्रसन्नता के पैमाने पर भारत का स्थान लगातार नीचे आ रहा है।

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