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बेबाक बोलः जुबानी जंग- 56 इंच का सीना

बिहार चुनावों के संभावित नतीजों को देखते हुए अमित शाह ने तुरुप का पत्ता खेल दिया था। ‘बिहार में अगर भाजपा हारी तो पटाखे पाकिस्तान में फूटेंगे’।
सीमा पर जवानों के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

‘दूध मांगा तो खीर देंगे, कश्मीर मांगा तो सीना चीर देंगे’ तीन दशक पहले दीवारों पर लिखी इन इबारतों को देखकर हर हिंदुस्तानी के खून खौलने (नहीं तो वो पानी है) से आपकी राजनीति शुरू होती है। आज आपकी राजनीति सफल है और आप देश के घोषित पहरेदार हैं तो सीमा पर सैनिकों के सिर काटे जा रहे हैं। लक्षित सैन्य हमले को उत्तर प्रदेश के चुनावों में मुद्दा बनाकर वोट मांगने वालों से तो सवाल पूछा ही जाएगा कि क्या हुआ तेरा वादा? आपका खेमा अपना सीना 56 इंच का बताकर सरहद पर मिली हार का पलटवार किसी खान पर करने लग जाता था। अब जबकि कल तक पाकिस्तान भेजे जा रहे आमिर खान संघ सरचालक मोहन भागवत के हाथों पुरस्कृत हो चुके हैं तो सरहद से लेकर आपके घर के बीचोबीच सुकमा तक की नाकामियों की जिम्मेदारी किसकी है – यही सवाल पूछता इस बार का बेबाक बोल।

बिहार चुनावों के संभावित नतीजों को देखते हुए अमित शाह ने तुरुप का पत्ता खेल दिया था। ‘बिहार में अगर भाजपा हारी तो पटाखे पाकिस्तान में फूटेंगे’। चुनावी रैलियों में सीने की मापजोख आपने शुरू की और 56 इंच को बहादुरी का पैमाना बनाया। सरहद, सीमा और देशभक्ति के सिवा कुछ नहीं सुना। आप बिहार तो हारे लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावों में उतरने के पहले नोटबंदी का ब्रह्मास्त्र भी चला डाला। आठ नवंबर 2016 के बाद से इस नोटबंदी का चरम विस्तार चरमपंथियों तक कर डाला। गृह मंत्रालय ने दावा किया कि नोटबंदी के बाद चरमपंथियों की कमर टूट गई और पत्थर बरसने बंद हो गए। हर आतंकवादी, भ्रष्टाचारी की नींद उड़ गई और गरीब आदमी चैन की नींद सो रहा है। पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के नेस्तनाबूत होने की खबरें भी आर्इं।

पाकिस्तान की पिछली नापाक हरकतों के खिलाफ आपने लक्षित सैन्य हमला करके अपना फर्ज तो निभाया। लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावों में उसके पोस्टर लगाकर अपनी देशभक्ति की कीमत भी वसूल ली। ऐसे हमले जितनी खामोशी से किए जाते हैं उसका श्रेय आपने इतना हल्ला मचाकर लिया कि शायद सैन्य बल भी हैरान होगा। रक्षा मंत्री संघ को श्रेय देने लगे, संघ मोदी को। और श्रेय का सामूहिक गान मोदी के आगे नतमस्तक रहा। पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए लक्षित सैन्य हमला जरूरी था। लेकिन उसके बाद आपने कूटनीतिक स्तर पर क्या किया। जब एमसीडी चुनावों की जीत को भाजपा के सिपाही सुकमा के शहीदों को समर्पित कर रहे थे तो उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि जल्द ही उन्हें इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि सरहद पर हमारे सैनिकों का सिर किसने काटा? दिल्ली में तो आप पूरे जेएनयू को ही राष्टÑद्रोहियों का अड्डा साबित कर देते हैं। लेकिन कश्मीर में डल झील के किनारे पीडीपी की नीतियों के साथ किस तरह कदमताल करते हैं यह समझ से परे है।

छत्तीसगढ़ और अन्य उन इलाकों में नक्सली गतिविधियां आक्रामक रूप से क्यों बढ़ गई हैं जहां भाजपा का शासन है, यह भी एक बड़ा सवाल है। और इसका जवाब यह है कि भारत मां की जय के नारे के नाम पर वोट मांगने के बाद आप भारत मां की जमीन से जुड़ी संतानों को भूल जाते हैं। आप कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जो हासिल कर चुके हैं वह एक सत्य है। लेकिन वह जिन अंक-शस्त्रों की वजह से हुआ है उसकी चीरफाड़ अभी बाकी है। इसने तुम्हें घाव दिया-यह बता कर तो आपने सत्ता ले ली। लेकिन घाव की मरहम-पट्टी करना आपकी जिम्मेदारी थी – यह आप भूल गए। 14 मई 2014 के बाद से प्रधानमंत्री लगातार अथक चुनाव लड़ रहे हैं। अपने हर चुनावी भाषण में वे खुद को देश का सबसे बड़ा पहरेदार घोषित कर रहे थे। पिछले तीन सालों में जो भी हो रहा है वह ‘ऐतिहासिक’ ही हो रहा है। भारत की धरा पर ‘सबसे पहले’ ही हो रहा है। हर कदम को ‘ऐतिहासिक’ बताने की होड़ में आप कभी खुद को सबसे बड़ा सेवक, कभी सबसे बड़ा किसान तो कभी सबसे बड़ा मजदूर घोषित कर देते हैं। फिलवक्त तो आपकी सबसे बड़ी उपाधि सबसे बड़े ऋषि यानी राष्ट्र ऋषि की है, लेकिन हम अभी यह दावा भी नहीं कर सकते कि इन पंक्तियों के छापेखाने में पहुंचने तक आपका कोई झंडाबरदार आपके साथ नई उपाधि न जोड़ दे।
तो इतने ‘ऐतिहासिक’ और इतने सारे ‘पहली बार’ में हमारे पास एक और मिसाल यह भी है कि सरहद की सुरक्षा के दावे करने वाली सरकार के पास एक पूर्णकालिक रक्षा मंत्री भी नहीं है। मनोहर पर्रीकर ने जिस हिमालयी गान के साथ सरहद की सेवा शुरू की थी उतनी ही जल्दी अपना सुर बदल कर गोवा की राह पकड़ ली। सरहद को पाकिस्तान की नापाक हरकतों से मुक्त कराने से ज्यादा जरूरी गोवा को कांग्रेस से मुक्त कराना था और उसके लिए कांग्रेस-युक्त भाजपा भी तो चाहिए थी।

लक्षित सैन्य हमले के अलावा पर्रीकर काल का कुछ हासिल है तो हर ऐतिहासिक कदम का श्रेय नरेंद्र मोदी को देना। फिलहाल पर्रीकर का अधिभार जेटली जी संभाल रहे हैं जिनके हिसाब से हर मर्ज का इलाज नोटबंदी ही था। जेटली जी बार-बार मीडिया से कह रहे हैं कि भारतीय सेना पर जनता अपना भरोसा कायम रखे। हमें जेटली जी के इस बयान से भी आपत्ति है। भला, जनता सेना पर से अपना भरोसा क्यों खोएगी। हमारी फौज में हमारे ही किसान और कामगार के बेटे-बेटी जाते हैं। आम जनता के घरों से ही सरहद के सिपाही निकलते हैं। सेना पर से भरोसा खोने का मतलब अपनी संतानों पर से भरोसा खोना होगा।

हां, लेकिन यह जरूरी है कि धीरे-धीरे जनता आपकी बातों से भरोसा खो रही है। आप जिस श्रीराम के जयकारे सबसे ज्यादा लगाते हैं उनकी भाषा में ही आपको याद दिलाया जाए। सीता को लाने निकले राम को समुद्र रास्ता देने से इनकार कर रहा था। राम की विनय की भाषा समझ नहीं आई तो तुलसीदास कहते हैं ‘बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत’। तो जनता आपसे पूछ रही है कि आखिर पाकिस्तानी हुकूमत को यह खौफ क्यों नहीं है कि भारत उसकी र्इंट से र्इंट बजा देगा, जिसका आप दावा करते हैं। आखिर भारत सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि उसने पाकिस्तान को आतंकवादी राष्टÑ घोषित नहीं किया है। पाकिस्तान आपको तवज्जो नहीं दे रहा, लेकिन यह सच है कि कारोबार के लिहाज से अभी तक आपने पाकिस्तान को तरजीही राष्टÑ का तमगा दे रखा है।

हमारे रक्षा मंत्री तो हिमालय और सरहद छोड़ समुद्र किनारे का गोवा संभाल रहे हैं और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की छवि ट्विटर मंत्री से ज्यादा कुछ रहने नहीं दी गई। सरकार के दो सशक्त विभाग का यह कमजोर चेहरा दुश्मनों को कितना खौफ दिला पाएगा और कौन सी कूटनीतिक चाल चल पाएगा यह तो जनता पूछेगी ही। बागी बने किसान और जंगलों में घूम रहे जवानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसके पास थी? नक्सलियों से निपटने के लिए एक आम राजनैतिक सहमति बनाना किसकी जिम्मेदारी थी? सरहद पर हमारे सैनिकों के साथ बर्बरता हो चुकी थी तब प्रधानमंत्री जी तुर्की के राष्टÑपति रज्जब तैयब इर्दोगान के लिए लाल कालीन बिछा चुके थे। हम आपको याद दिला दें कि इर्दोगान खूंखार आतंकवादी संगठन इस्लामिक इस्टेट के घनघोर प्रशंसक हैं और पाकिस्तान को समर्थन देते कोई पर्दा नहीं करते। खैर, इसके बावजूद कारोबारी और अन्य लिहाज से तुर्की से दोस्ती बहुत जरूरी है, और कूटनीतिक संबंधों को वृहद स्तर पर देखने की दरकार होती है। लेकिन आपकी ही मखमली कालीन पर इर्दोगान आपको कश्मीर का कांटा चुभो गए। कश्मीर को लेकर पाक के बगलगीर हो गए। लगातार चुनाव जीत रही या राज्यों में जोड़-तोड़ कर सरकार बना रही मोदी और शाह की शाहकार जोड़ी कूटनीतिक स्तर पर कितनी कमजोर है यह पर्दा उठाने के लिए इर्दोगान को धन्यवाद देकर हम यह खतरा भी उठा सकते हैं कि हमें देशद्रोही का तमगा पकड़ा दिया जाए।

कभी एक सैनिक के बदले दस सैनिकों का सिर काट लाने का हुंकार भरने वाले लोग आज मीडिया को सलाह दे रहे हैं कि शहीदों की विधवाओं को रोते हुए न दिखाएं। कभी आप सभाओं में शहीदों के परिवारों की रोती हुई तस्वीरों के नाम पर वोट मांगते थे। लेकिन आज आपको ये रोती हुई तस्वीरें शहीदों का अपमान लगने लगी हैं। भारत जैसा कृषि-प्रधान देश शुरू से हो गो-सेवक रहा है। खेतिहर इलाकों में हिंदू हो या मुसलमान का घर अब भी पहली रोटी गाय के नाम पर ही बनती है। गोशाला हर घर की समृद्धि का प्रतीक हुआ करती है। लेकिन यह चुनावी और जंगी भाषणों का असर है कि कल जो सेवक थे वे अब रक्षक बन गए हैं। सेवक और रक्षक के संचारी भाव के अंतर को समझेंगे तो पिछले तीन साल में बदली संस्कृति को भी समझ लेंगे।

मोदी और शाह की शाहकार जोड़ी सेवकों के देश को रक्षकों का देश तो बना बैठी है लेकिन किसान से लेकर जवान तक की रक्षा के वादों में नाकाम रही है। तो आप क्या समझते हैं कि मन सिर्फ आपका बदलता है, जुबान सिर्फ आपकी बदलती है या सेवक, मजदूर से लेकर ऋषि तक की भूमिका बदलने का सिर्फ आपका ही मन करता है। आप यह सब कर रहे हैं क्योंकि समर्थन आपके पास है। लेकिन यह याद रखें कि आपका बहुमत कभी भी 500 के नोट की तरह पुराना और चलन से बाहर हो सकता है। क्योंकि धारक को 500 अदा नहीं कर आरबीआइ को बेवफा तो आपने ही बनाया।

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  1. प्रकाश डी
    May 6, 2017 at 9:26 am
    True
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    Reply
    1. R
      Raj Kumar
      May 6, 2017 at 6:10 am
      जनता धृतराष्ट्र हो चुकी है,,,
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      Reply