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राजनीतिः शिक्षा सामग्री में बदलाव की जरूरत

ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री में एक और बड़ी कमी लैंगिक भिन्नता से सही तरीके से न निपटने की है। एक तो पाठ्यपुस्तकों में इस तरह की सामग्री की भारी कमी है, साथ ही उनकी व्याख्या में वही पितृसत्तावादी औजार इस्तेमाल किए जाते हैं। जगह-जगह उनके अपने पूर्वग्रह सामने आए हैं, जो इस मामले में कोई नई दृष्टि देने के बजाय पुरानी मान्यतों को ही पुनरुत्पादित करते हैं।

Author Published on: July 10, 2020 1:51 AM
कोविड-19 अभी अपनी जड़ें जमाए रहने वाला है और विद्यालयों में पढ़ाई सामान्य होने में और समय लगेगा।

आलोक रंजन

वर्तमान दौर में विद्यालयी शिक्षा ‘ऑनलाइन’ हो गई है। आधारभूत ढांचे और शिक्षकों की कमी से जूझ रहे विद्यालयों तक में अब इसकी पहुंच है। ऑनलाइन कक्षा इस समय की सबसे बड़ी जरूरत के रूप में पेश की जा रही है। इसके साथ ही विशेषज्ञ इसके विभिन्न दोषों पर भी ध्यान दिलाने लगे हैं। इसके साथ-साथ ऑनलाइन कक्षाओं के समर्थक उन पुरानी काट के अध्यापकों को भी कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, जो नया सीखने में हिचकते हैं। अब वे भी सीखने वालों में शामिल हैं। इनमें से शायद ही कोई ऐसा मुद्दा हो, जो तत्काल समीक्षा की मांग करता है, इसलिए इन सबके बावजूद ऑनलाइन टीचिंग धड़ल्ले से चल रही है।

मगर इनके अलावा एक ऐसी समस्या भी है, जिस ओर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो। वर्तमान हालात ऐसे हैं कि हर किसी को ऑनलाइन शिक्षा में ही भविष्य दिखता है। स्कूली शिक्षा से जुड़े सभी बोर्ड अपनी परीक्षाएं स्थगित कर रहे हैं और विद्यार्थियों को उत्तीर्ण करने के अलग-अलग विकल्प सामने ले आए हैं। ये बातें उस डरावने तथ्य की ओर इशारा करती हैं, जिससे सब बचना चाहते हैं। कोविड-19 अभी अपनी जड़ें जमाए रहने वाला है और विद्यालयों में पढ़ाई सामान्य होने में और समय लगेगा। इसलिए तमाम कमियों के बावजूद पढ़ने-पढ़ाने का ऑनलाइन तरीका ही मुख्य विकल्प रहने वाला है।

ऑनलाइन अध्यापन में मुख्य बात है कक्षा के लिए जरूरी अध्ययन सामाग्री यानी ‘कंटेंट’। निजी विद्यालयों को छोड़ दिया जाए, तो ज्यादातर सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालय ऐसी जगहों पर ऑनलाइन कक्षाएं ले रहे हैं, जहां रिकॉर्डिंग की सुविधा नहीं है। कारण साफ है, इसके लिए अतिरिक्त क्लाउड स्पेस की जरूरत पड़ेगी, जो मुफ्त नहीं है। विद्यार्थी और अध्यापक दोनों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है। लगभग हर विद्यार्थी की मांग होती है कि कक्षा में जो विषय पढ़ाया गया उसकी लिखित या वीडियो सामग्री मिल जाए, ताकि वे बाद में उसका उपयोग कर सकें। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि आमतौर पर वे कोई भी संकल्पना एक बार में ही नहीं सीख जाते। सामान्य कक्षाओं में सहपाठियों के बीच शंका समाधान का, संबंधित अध्यापक से बातचीत का विकल्प खुला रहता है, लेकिन ऑनलाइन कक्षाओं में ये अवसर न्यून रहते हैं। ऑनलाइन कक्षाओं के आम होने से काफी पहले से ही पाठ्य-सामग्री की ऑनलाइन उपलब्धता है। इंटरनेट के इस दौर में इससे बड़ी बात क्या हो सकती है! यह सच है कि इंटरनेट पर किसी भी कक्षा से संबंधित सामग्री के कई विकल्प मौजूद हैं, लेकिन वे कक्षीय उपभोग के लिए कितने उपयोगी हैं- प्रश्न यह है। हिंदी विषय से जुड़े कंटेंट हमें सचेत होने पर मजबूर कर देते हैं कि अगर विद्यार्थी उनका उपयोग कर रहे हैं, तो वे उनसे जो सीखेंगे वह शिक्षा के वृहत उद्देश्यों के साथ-साथ भाषा शिक्षण के लक्ष्यों को भी भटकाव के दलदल में धकेल देगा।

भारत की स्कूली शिक्षा में एनसीईआरटी को अच्छी साख है। उसकी किताबों का आमुख इन वाक्यों से शुरू होता है- ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिद्धांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है, जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच अंतराल बनाए हुए है।’ इन वाक्यों को पढ़ने के बाद अगर इंटरनेट पर उपलब्ध अध्ययन समग्री की विवेचना करें तो यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि वे विद्यालयी शिक्षा के इन जरूरी तरीकों से कितने दूर हैं। लगभग सारी सामग्री ‘सरलार्थ’ और ‘सारांश’ बता देने तक सीमित हैं और ज्यादा हुआ तो महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने तक। इन सबके बीच में भाषा के तत्त्व छूट जाते हैं और उसके माध्यम से मिलने वाला समाजीकरण भी पीछे रह जाता है।

वर्तमान विद्यालयी शिक्षा का उद्देश्य किसी भी तरह परीक्षा में अंक अर्जित करना रह गया है और यह कोई बहुत बड़ा रहस्योद्घाटन भी नहीं है। इसलिए हिंदी और अन्य विषयों में समझ विकसित करने के बदले परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने के लिए जरूरी बातें ही महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। इस प्रवृत्ति के पीछे विद्यार्थी, माता-पिता और अध्यापक की तिकड़ी काम करती है और यही ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री में भी झलकता है।

हिंदी विषय से जुड़ी सामग्री का अध्ययन करें तो एक बड़ा प्रश्न समावेशन का उठ खड़ा होता है। सबको साथ लेकर चलने का यह मुद्दा बहुस्तरीय है, जिसमें जेंडर, भौगोलिक विविधता, धार्मिक भिन्नता आदि प्रमुख रूप से दिखते हैं। 1961 में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में त्रिभाषा सूत्र विकसित हुआ और कोठारी आयोग ने आवश्यक जांच-परख और तैयारी के बाद इसे शिक्षा में प्रयोग होने लायक मान कर अपनी रिपोर्ट में इसकी संस्तुति भी कर दी। यह बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 का प्रमुख हिस्सा बना। तमिलनाडु और पुदुच्चेरी को छोड़ कर देश भर में यह लागू हो गया। उसके तहत अनचाहे रूप से ही सही, लेकिन बड़ी संख्या में विद्यार्थी हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ रहे हैं। उन विद्यार्थियों की दृष्टि से देखें तो ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री शून्य है, क्योंकि वे उनके स्तर पर आकर संकल्पनाओं को नहीं सिखाते हैं।

उन कंटेंट में धार्मिक और लैंगिक विविधता को उचित तरीके से बरतने का अभाव दिखता है। भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है, जहां कई धर्मावलंबी एक साथ रह रहे हैं, लेकिन हिंदी विषय की बात आते ही यह एक खास धर्म तक सीमित होकर रह जाता है। त्रिभाषा सूत्र से इतर भी देखें तो केंद्र सरकार द्वारा संचालित नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों के विद्यार्थी हिंदी को एक विषय के रूप में पढ़ते हैं। इन विद्यालयों की पहुंच देश के उन इलाकों में भी है, जहां अलग-अलग धर्मों के विद्यार्थी हिंदी भाषा साहित्य का अध्ययन करते हैं, जैसे दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्य। यहां प्रश्न यह नहीं है कि उनके धार्मिक विश्वासों को पाठ्यपुस्तक में क्यों अवकाश नहीं दिया गया, बल्कि उपलब्ध पाठ्य सामग्री के जो ऑनलाइन विश्लेषण प्रस्तुत किए जाते हैं, उनमें यह कहीं नहीं दिखता कि उनके काम को वह विद्यार्थी भी एक सहायक सामग्री की तरह देख रहा है, जिसका धर्म हिंदी की धार्मिक कविताओं से अलग है। उन धार्मिक रचनाओं को समझने के लिए जिन किस्सों और तौर-तरीके की जरूरत है, उनकी सामान्य जानकारी भी अन्य धर्मावलंबी विद्यार्थियों को नहीं है।

ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री में एक और बड़ी कमी लैंगिक भिन्नता से सही तरीके से न निपटने की है। एक तो पाठ्यपुस्तकों में इस तरह की सामग्री की भारी कमी है, साथ ही उनकी व्याख्या में वही पितृसत्तावादी औजार इस्तेमाल किए जाते हैं। जगह-जगह उनके अपने पूर्वग्रह सामने आए हैं, जो इस मामले में कोई नई दृष्टि देने के बजाय पुरानी मान्यतों को ही पुनरुत्पादित करते हैं।

हिंदी पढ़ने, बोलने और लिखने वाला समाज आश्चर्यजनक रूप से इस बात से निरपेक्ष है कि विद्यार्थियों को किस तरह की सामग्री परोसी जा रही है। विद्यालयों और अध्यापकों को सचेत होकर ऑनलाइन सामग्री की छंटनी करनी होगी। इसके पीछे का सूत्र साफ है- लोकतांत्रिक मूल्य और सबका समावेशन। वीडियो और लिखित सामग्री प्रदाताओं को यह समझना पड़ेगा कि हिंदी केवल हिंदी पट्टी में नहीं पढ़ी जाती। इसे एक विषय के रूप में देश के अलग-अलग भूगोल में भिन्न धर्म मानने वाले विद्यार्थी पढ़ते हैं। उनकी जरूरतों का ध्यान रखना आवश्यक है तभी यह उनके लिए एक जरूरी सामग्री बन पाएगी। इसके साथ-साथ किसी भी संकल्पना को समझते हुए उस विद्यार्थी की कल्पना करनी होगी, जिसे हिंदी का कुछ नहीं पता।

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