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राजनीतिः विकास से बेदखल होते लोग

मौजूदा हालात में शहरी मेहनतकश दो तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। एक तरफ घर से बेदखल हो उसे विस्थापन झेलना पड़ रहा है, और दूसरी ओर आधुनिकीकरण और मशीनीकरण के नाम पर उसके रोजगार के साधनों को छीना जा रहा है। कम से कम कामगार और ज्यादा से ज्यादा उत्पादन उद्योगों का मूल मंत्र बन गया है।

Author May 4, 2018 03:34 am
प्रतीकात्मक चित्र

पंकज सिंह

नई आर्थिक नीतियों के सत्ताईस बरस बाद भी आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित होते जा रहे हैं। कृषि के हालात भी बेहद खराब हैं। इससे बेरोजगारी बढ़ रही है और नतीजतन हमारे शहरों पर दबाव बढ़ रहा है। शहरों में रोजगार के हालात और गंभीर हैं। लेकिन ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी को मिला कर देखें तो चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। देश के शहरों को हमने समृद्धि के टापू में बदल दिया है, जहां रोजाना लाखों नौजवान बेरोजगार जैसे-तैसे जीने की चाह में खिंचे चले आ रहे हैं। दूसरी ओर भारतीय शहरों को विश्व स्तरीय शहर, सुविधायुक्त सक्षम विकास केंद्र और नवीनतायुक्त केंद्र बनाने की होड़ लगी है। सरकारी नीतियों और शहरी योजनाओं के जरिए विकास का जो नया ककहरा लिखा जा रहा है, उसमें दो तस्वीरें उभरती हैं। पहली, शहर आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विस्तार पा रहे हैं। इससे विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की कीमत पर सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन दूसरी तस्वीर कहीं ज्यादा भयावह है। इसमें बस्तियों और झुग्गी-झोपड़िय़ों को उजाड़ कर विश्व स्तरीय शहर के सपनों की नींव रखी जा रही है।

मौजूदा हालात में शहरी मेहनतकश दो तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। एक तरफ घर से बेदखल हो उसे विस्थापन झेलना पड़ रहा है, और दूसरी ओर आधुनिकीकरण और मशीनीकरण के नाम पर उसके रोजगार के साधनों को छीना जा रहा है। कम से कम कामगार और ज्यादा से ज्यादा उत्पादन उद्योगों का मूल मंत्र बन गया है। सरकारी स्तर पर देखें तो सरकारी महकमों में भी अब भर्तियां नहीं के बराबर हो रही हैं और ठेका प्रथा, जो कामगारों के हितों के सर्वथा प्रतिकूल है, को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में ठेके के शिक्षक हैं। अस्पतालों में ठेके के डॉक्टर और कर्मचारी हैं। यही हाल सब जगह है। तो फिर ऐसे में उद्योग जगत इसे अपनाएगा ही, जो उसके हित में है।

सरकार आज दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था बेहतरीन दौर में है। अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रतीक शेयर बाजार सूचकांक दिन-प्रतिदिन नई ऊंचाइयों को छूता हुआ तीस हजार के जादुई आंकड़े को कब का पार कर चुका है और दावा है कि यह जल्द ही चालीस हजार के पार भी पहुंच जाएगा। पांच सितारा होटल, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, फ्लाईओवर, मेट्रो रेल और सस्ती होती हवाई यात्रा आर्थिक व्यवस्था की मजबूती का खुशनुमा अहसास कराती हैं। लेकिन इस खुशहाली का दूसरा यानी स्याह पक्ष भी है जिसमें उजड़ती बस्तियां, छूटते रोजगार, बढ़ती आत्महत्याएं और आपराधिक गतिविधियां हमें चारों तरफ दिखाई देती हैं। इससे देश के तिरानवे फीसद असंगठित क्षेत्र के कामगार प्रभावित हुए हैं।

बताने की जरूरत नहीं कि बीते सत्ताईस सालों में भूमंडलीकरण के साये में बढ़ी व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता ने तकनीक का विकास किया और कम से कम श्रम के इस्तेमाल से अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति ने बेरोजगारों की एक बड़ी खेप तैयार की है। सिमटते औद्योगीकरण के दौर में शहर के बस्ती वाले, रेहड़ी-पटरी वाले, बेघर मजदूर, निर्माण मजदूर, घरेलू कामगार, रिक्शा चालक, कूड़ा बीनने वाले और कच्ची बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, वहीं मध्य वर्ग के युवा भी बेरोजगारी की इस मार से बच नहीं पाए हैं। विनिर्माण के बजाय सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देने के कारण अनौपचारिक क्षेत्र में ज्यादा संख्या में लोग आए और इससे बढ़ी बेदखली के कारण लोग अपने रोजगार से दूर होकर तथाकथित गैरकानूनी रोजगार करने लगे।

इन शहरी कामगारों की समस्याओं को समझने के लिए दिल्ली की छह पुनर्वास बस्तियों में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की एक परियोजना के तहत ‘साझा मंच’ ने शहरी रोजगार योजना बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और न्यूनतम मजदूरी सहित कई शोध और कार्यशालाएं की गई थीं। इससे यह बात सामने आई कि शहर में मुख्यत: तीन प्रकार के रोजगार हैं। एक- वेतन भोगी रोजगार, जो असुरक्षित है। दूसरा, स्वरोजगार जो गैरकानूनी है। तीसरा, अर्द्ध रोजगार, यह असुरक्षित और गैरकानूनी है। इन अध्ययनों से तीन महत्त्वपूर्ण मांगें सामने आर्इं। पहली, कानूनी पहचान का हक, दूसरी वैध जगह और साधन और तीसरी आसान शर्तों पर कर्ज।

कामगार तबकों के इन्हीं अध्ययनों के आधार पर राष्ट्रीय शहरी रोजगार का अधिकार कानून का प्रारूप भी तैयार किया गया है। इस प्रारूप पर असंगठित मजदूर संस्थाओं, राष्ट्रीय मजदूर संघों और नागरिक संगठनों के साथ अलग-अलग सेमिनारों में चर्चा भी हुई है और मौटे तौर पर राष्ट्रीय शहरी रोजगार का अधिकार कानून पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस की जरूरत पर सहमति बनी है, ताकि इस कानून के मसौदे पर विभिन्न मजदूर आंदोलनों की एक समझ बन सके और यह एक व्यापक एवं प्रभावशाली कानून बन सके। मौजूदा समय में इसके लिए व्यापक अभियान चलाने की जरूरत है ताकि सरकार इसे जल्द से जल्द लागू कर सके।

इस मसौदे के जो महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं, उनमें पहला यह है कि शहरी क्षेत्रों में कामगारों की आजीविका को सुनिश्चित किया जाना चाहिए और प्रत्येक वयस्क व्यक्ति, जिसने उत्पादन कार्य के लिए पंजीकरण करवाया है, को साल के तीन सौ दिन काम मिलना चाहिए। दूसरा यह कि न्यूनतम मजदूरी की जगह जीने लायक मजदूरी मिलने का हक होना चाहिए, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है। मसौदे का तीसरा बिंदु कहता है कि जहां वेतनभोगी मजदूर के लिए मालिक है जिसे त्रिपक्षीय आयोग में रखा जा सकता है, वहां स्व-रोजगार, अर्द्ध-रोजगार और बेरोजगार के लिए कोई मालिक नहीं होता। इसलिए सबके लिए सरकार को ही प्रधान नियोक्ता (जिम्मेदार मालिक) मानना चाहिए। इसका मतलब यह भी है कि अगर वेतन-भोगी या स्व-रोजगार या बेरोजगार व्यक्ति को जीने लायक मजदूरी से कम मिल रहा हो तो उसकी भरपाई कल्याणकारी सरकार और श्रम विभाग द्वारा की जाएगी। चौथे बिंदु में इस बात का प्रावधान है कि मजदूर वर्गों के कल्याण के लिए अलग-अलग बोर्ड बनाने के स्थान पर इसकी पूरी जिम्मेदारी श्रम विभाग को लेनी चाहिए, जिससे मजदूर वर्गों की एकता बनी रहेगी और श्रम विभाग को भी अधिक उत्तरदायी बनया जाएगा।

इस प्रारूप में काम का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में रखा गया है और केवल रोजगार गारंटी की मांग नहीं है जो एक प्रकार से सरकार की मर्जी और लोगों की मजबूरी पर निर्भर है और अधिकार को कल्याण का रूप दे देती है। मसौदे का एक बिंदु कहता है कि मजदूर के रहने की व्यवस्था काम के नजदीक अनिवार्य रूप से होना चाहिए, ताकि आमदनी का बड़ा हिस्सा परिवहन पर खर्च करने की जरूरत न हो। हर काम करने या चाहने वाले को श्रम विभाग की ओर से रोजगार पहचान पत्र मिलना चाहिए जो शहर में ही नहीं, लेकिन गांव में भी काम के लिए स्वीकृत हो ताकि प्रवासी मजदूर अधर में न लटका रहे।

मसौदे में कहा गया है कि हर रोजगार स्वस्थ और सुरक्षित होना चाहिए। विकलांग और कमजोर व्यक्तियों के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए, ताकि मजदूर के साथ-साथ पर्यावरण और समाज की भी हिफाजत हो। रोजगार बढ़ाने के लिए हर सार्वजनिक काम और योजना में चालीस फीसद राशि रोजगार के लिए सुरक्षित होनी चाहिए और सरकारी विभागों में नियुक्तियों पर लगी रोक हटाई जानी चाहिए- इससे श्रम विभाग की कार्यकुशलता भी बढ़ेगी। मसौदे में इस बात पर जोर दिया गया है कि पूरी प्रणाली में मजदूरों की भागीदारी होनी चाहिए, जिसमें संगठन बनाने का हक शामिल है।
आज समय की मांग है कि इन बिंदुओं पर खुली चर्चा हो और व्यापक समझ बनाई जाए।

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