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राजनीतिः ट्रंप का दांव और दुनिया की सांसत

ट्रंप का ताजा फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल संकट को बढ़ाएगा। राहत की बात यही है कि परमाणु करार पर मुहर लगाने वाले अन्य देश ट्रंप के फैसले से सहमत नहीं हैं। उन्होंने ट्रंप के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। रूस और चीन ट्रंप के फैसले का विरोध कर चुके हैं। परमाणु करार के अन्य भागीदार फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन भी ट्रंप के फैसले से नाराज हैं। फ्रांस ने तो यहां तक कह दिया है कि वह इस फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

ट्रंप अंतरराष्ट्रीय समझौतों से अलग होने का रिकार्ड बना रहे हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन समझौते से अलग होने का फैसला लिया। फिर वे ‘ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप’ से अलग हो गए।

खाड़ी के देशों में एक बार फिर उठे संकट से दुनिया परेशान है। इसके लिए जिम्मेवार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिन्होंने ईरान के साथ 2015 में हुए परमाणु करार से अलग होने का फैसला किया है। ट्रंप के फैसले का सीधा असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ेगा। ईरान और सऊदी अरब समेत खाड़ी के देशों में अगर तनाव बढ़ा तो भारत और चीन की परेशानी बढ़ेगी, क्योंकि दोनों मुल्क ऊर्जा की अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए खाड़ी के देशों पर निर्भर हैं। वैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से दुनिया लगातार परेशान हो रही है। ट्रंप अंतरराष्ट्रीय समझौतों से अलग होने का रिकार्ड बना रहे हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन समझौते से अलग होने का फैसला लिया। फिर वे ‘ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप’ से अलग हो गए।

अब ट्रंप का ताजा फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल संकट को बढ़ाएगा। राहत की बात यही है कि परमाणु करार पर मुहर लगाने वाले अन्य देश ट्रंप के फैसले से सहमत नहीं हैं। उन्होंने ट्रंप के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। रूस और चीन ट्रंप के फैसले का विरोध कर चुके हैं। परमाणु करार के अन्य भागीदार फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन भी ट्रंप के फैसले से नाराज हैं। फ्रांस ने तो यहां तक कह दिया है कि वह इस फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

ट्रंप के ताजा फैसले को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं। इस फैसले के पीछे सऊदी अरब और इजराइल का भारी दबाव बताया गया, क्योंकि वे ईरान की बढ़ती ताकत से परेशान थे। हालांकि कुछ लोग इसमें तेल के खेल को जिम्मेवार मान रहे हैं। क्योंकि तेल उत्पादक देशों के बीच तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में इजाफा होगा। इससे सऊदी अरब और कुछ अमेरिकी तेल कंपनियों के खासे आर्थिक हित सधेंगे। सस्ते तेल ने कई मुल्कों की आर्थिक सेहत बिगाड़ दी। इनमें सऊदी अरब भी शामिल है। खाड़ी देशों में सक्रिय अमेरिकी कंपनियों को भी इससे नुकसान पहुंचा। सऊदी अरब का राजकोषीय घाटा खासा बढ़ गया था। तेल से होने वाली आमदनी में भारी कमी के कारण सऊदी अरब ने अपनी जनता को दी जाने वाली कई आर्थिक रियायतें समाप्त कर दी थीं।

ऐसे में सऊदी अरब और अमेरिका चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत सौ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाए। वैसे भी सऊदी अरब अमेरिकी हथियारों का बड़ा खरीदार है। इसलिए सऊदी अरब के आर्थिक हितों का ध्यान अमेरिका को रखना ही पड़ेगा। दूसरी तरफ सऊदी अरब और उसके धुर विरोधी इजराइल की परेशानी यह थी कि परमाणु करार होने के बाद ईरान ने आर्थिक प्रतिबंधों के समाप्त होने का तेजी से लाभ उठाया। ईरान ने अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को बचा लिया। इसी के बल पर उसने सीरिया से लेकर यमन तक सैन्य हस्तक्षेप किया।

हालांकि परमाणु करार से अमेरिका के बाहर होने के फैसले के बाद करार के दूसरे भागीदार ईरान के साथ खड़े हैं क्योंकि ईरानी बाजार को न तो चीन खोना चाहता है, न फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी। रूस तो वैसे ही ईरान का सहयोगी है। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी कतई सऊदी अरब और इजराइल के खेल में शामिल होना नहीं चाहते। 2015 में हुए परमाणु करार के बाद यूरोपीय देशों का ईरान के साथ व्यापार खासा बढ़ा। ईरान बड़ी संख्या में यात्री जहाज खरीदने जा रहा है। इस पर यूरोपीय कंपनियों की नजर है। ईरान के तेल और गैस पर जर्मनी की कंपनियों की नजर है, जहां मशीनरी की भारी जरूरत है।

अमेरिका के ताजा फैसले का असर कितना पड़ेगा यह चीन, भारत और रूस के रवैये से तय होगा। दरअसल, ईरान के तेल का चालीस प्रतिशत निर्यात चीन और भारत को होता है। इस समय ईरान प्रतिदिन 38 लाख बैरल तेल का उत्पादन कर रहा है। चीन की ऊर्जा खपत हर साल दस प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। चीन ईरान से प्रतिदिन लगभग 7 लाख 50 हजार बैरल तेल आयात कर रहा है। चीन और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार में भी तेजी आई है। ईरान का चीन से व्यापार, जो कुछ साल पहले तक सालाना दो अरब डॉलर था, बढ़ कर अब साठ अरब डॉलर हो गया है।

चीन के लौह अयस्क का बड़ा बाजार ईरान है। यही नहीं, ईरान में रेलवे के क्षेत्र में चीन ने भारी निवेश की योजना बनाई है। चीन ने ईरान को भी ‘वन बेल्ट वन रोड’ योजना में शामिल किया है। चीन ने ईरान के साथ द्विपक्षीय व्यापार को एक दशक में छह सौ अरब डॉलर सालाना करने का लक्ष्य बनाया है। चीन और ईरान महत्त्वपूर्ण सैन्य साझेदार भी हैं। 2016 में दोनों मुल्कों ने नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास को लेकर समझौता किया। चीन ने ईरान को जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल की आपूर्ति की है। यही नहीं, चीन ने कई ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों को भी प्रशिक्षित किया है।

ईरान के साथ परमाणु समझौते को लेकर अगर संकट ज्यादा बढ़ा तो भारत की चिंता बढेÞगी। ईरान भारत की सामरिक मजबूरी है। दूसरी तरफ अमेरिका से दोस्ती के तमाम दावे भारत कर रहा है। वैसे में भारत को हर फैसला काफी सावधानी से लेना होगा क्योंकि ईरान को नजरअंदाज करना भी भारी पड़ सकता है। इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान भारत का तीसरा बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है। 2017-18 में ईरान ने प्रतिदिन भारत को 2 लाख बैरल तेल निर्यात किया। 2018-19 में भारत ने ईरान से तेल आयात प्रतिदिन 3 लाख 96 हजार बैरल तक करने की योजना बनाई है। अगर भारत अमेरिकी फैसलों का अनुसरण करेगा तो उसकी परेशानी बढ़ेगी। भारत को इसका सामरिक नुकसान होगा।

भारत और ईरान के बीच व्यापार सालाना 13 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसमें गैर-पेट्रोलियम व्यापार लगभग तीन अरब डॉलर है। ईरान ने भारत को कई छूट भी दे रखी हैं। इसके अलावा भारत के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह है। भारत ने इस बंदरगाह के विकास के लिए काफी पैसा लगाया है। भारत के सहयोग से चाबहार के पहले चरण का विकास हो चुका है। भारत के लिए चाबहार इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह उसके लिए अफगानिस्तान में जाने का महत्त्वपूर्ण रास्ता है। अगर भारत ने अमेरिकी फैसले के साथ चलने का फैसला किया तो उसे इसका नुकसान होना तय है। ट्रंप के फैसले के बाद ही दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास ने इशारों में भारत को कड़े संकेत दिए।

ईरानी दूतावास के राजनयिकों ने अमेरिकी फैसले के बाद प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत को अपने सामरिक हितों को बचाए रखने के लिए रणनीतिक फैसले लेने होंगे। सामरिक हित शब्द का इस्तेमाल कर ईरानी दूतावास ने साफ संकेत दिए कि ईरान अफगानिस्तान में भारत के आर्थिक हितों को समझता है। फिर अफगानिस्तान में जाने का रास्ता ईरान है। ईरानी अधिकारियों ने उम्मीद जताई कि भारत ईरान के साथ द्विपक्षीय संबंध अच्छे रखेगा और किसी अन्य देश के दबाव में नहीं आएगा। ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि भारत तेल के भुगतान के लिए यूरोपीय बैंकों और यूरो का इस्तेमाल कर सकता है।

भारत चाबहार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा के संस्थापक सदस्यों में से एक है। यह गलियारा ईरान से यूरोप तक जाएगा। इसकी योजना 2002 में बनाई गई थी। 2015 के बाद से इसके काम में तेजी लाने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अमेरिकी फैसले के बाद इसमें भी दिक्कत आएगी। क्योंकि इस गलियारे को धन मुहैया कराने वाली अंतराष्ट्रीय संस्थाओं पर दबाव बढ़ाया जाएगा।

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