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बैंकों की बदलती भूमिका

उम्मीद है कि निजी क्षेत्र के बैंकों को सरकारी काम करने की अनुमति देने से निजी क्षेत्र के बैंक भी देश के विकास और सामाजिक क्षेत्र की पहल को आगे बढ़ाने में बराबर के साझीदार होंगे और देश के करोड़ों बैंक उपभोक्ताओं को लाभ होगा। छोटे और मझोले आकार के सरकारी बैंकों का निजीकरण पुनर्पंूजीकरण की राजकोषीय चुनौतियों की चिंताओं को कम करेगा।

Bankसांकेतिक फोटो।

जयंतीलाल भंडारी

इस समय देश में बैंकों की बदलती भूमिका के तीन परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं। एक, निजी क्षेत्र के सभी बैंकों को सरकार से जुड़े विभिन्न कामों की अनुमति, दो- छोटे और मझोले आकार के सरकारी बैंकों का चरणबद्ध निजीकरण और तीन- कुछ सरकारी बैंकों को मिला कर बड़े मजबूत बैंक के रूप में स्थापित करना। गौरतलब है कि 24 फरवरी को वित्त मंत्रालय ने निजी क्षेत्र के सभी बैंकों को सरकार से जुड़े विभिन्न कामों जैसे कर संग्रह, पेंशन भुगतान और लघु बचत योजनाओं में हिस्सा लेने आदि की अनुमति दे दी है।

यह बात महत्त्वपूर्ण है कि अब तक केवल कुछ बड़े निजी क्षेत्र के बैंकों को सरकारी कामकाज करने की अनुमति थी। अब निजी बैंक भी देश की अर्थव्यवस्था के विकास, सरकार की सामाजिक क्षेत्र की पहल में मददगार और ग्राहकों की सुविधा बढ़ाने के लिए बराबर के साझीदार होंगे। ऐसे में सरकार के इस निर्णय से ग्राहकों की सुविधा, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता सेवाओं के मानकों में कुशलता और बढ़ेगी।

गौरतलब है कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट प्रस्तुत करते हुए कुछ सरकारी बैंकों के निजीकरण की घोषणा की थी। उनके मुताबिक अब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए पहले की तरह अहम नहीं रह गए हैं। अब कुछ सरकारी बैंकों का निजीकरण अपरिहार्य है, क्योंकि सरकार के पास पुनर्पूंजीकरण की राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। गौरतलब है कि पीजे नायक की अध्यक्षता वाली भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की समिति ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सरकार के नियंत्रण से बाहर निकालने के लिए सिफारिश की थी।

इसी क्रम में सरकार ने छोटे एवं मझोले आकार के चार सरकारी बैंकों के निजीकरण के लिए चिह्नित किया है। ये बैंक हैं- बैंक आॅफ महाराष्ट्र, बैंक आॅफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया। कहा गया है कि जिन बैंकों का निजीकरण होने जा रहा है, उनके खाताधारकों को कोई नुकसान नहीं होगा। निजीकरण के बाद भी उन्हें सभी बैंकिंग सेवाएं पहले की तरह मिलती रहेंगी। अगर इन चार छोटे-मझोले बैंकों के निजीकरण में सरकार को सफलता मिलती है तो आगामी वर्षों में कुछ अन्य बैंकों को निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि जहां एक ओर सरकार बैंकों के निजीकरण की ओर आगे बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर देश में चार बड़े मजबूत सरकारी बैंकों को आकार देने की रणनीति पर भी आगे बढ़ रही है। उल्लेखनीय है कि 1991 में बैंकिंग सुधारों पर एमएल नरसिंहन की अध्यक्षता में समिति का गठन हुआ था। उसने देश में बड़े और मजबूत बैंकों की सिफारिश की थी और कहा था कि देश में तीन-चार अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े बैंक होने चाहिए। उस समिति की रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में छोटे बैंकों को बड़े बैंक में मिलाने का फार्मूला केंद्र सरकार पहले भी अपना चुकी है।

पिछले वर्ष 2020 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के दस बैंकों का एकीकरण कर चार बैंक बनाए थे। उल्लेखनीय है कि बैंकों के एकीकरण की योजना के तहत यूनाइटेड बैंक आॅफ इंडिया तथा ओरिएंटल बैंक आॅफ कॉमर्स का विलय पंजाब नेशनल बैंक के साथ किया गया था। इसी तरह सिंडिकेट बैंक का विलय केनरा बैंक के साथ और इलाहाबाद बैंक का विलय इंडियन बैंक के साथ तथा आंध्र बैंक एवं कॉर्पोरेशन बैंक को यूनियन बैंक आॅफ इंडिया के साथ एकीकृत कर दिया गया था। वर्ष 2019 में विजया बैंक और देना बैंक का विलय बैंक आॅफ बड़ौदा के साथ कर दिया गया था। इस तरह कुल सरकारी बैंकों की संख्या जो मार्च 2017 में सताईस थी, वह घट कर इस समय बारह हो गई है।

माना जा रहा है कि भारत में बैंकों की जन हितैषी योजनाओं के संचालन संबंधी भूमिका के कारण सरकारी बैंकों की मजबूती के अधिक प्रयास जरूरी हैं। चूंकि सरकार की जनहित की योजनाएं सरकारी बैंकों पर आधारित हैं, ऐसे में मजबूत सरकारी बैंकों की जरूरत स्पष्ट दिखाई दे रही है। देश भर में चल रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था करने और उन्हें बांटने की जिम्मेदारी सरकारी बैंकों को सौंप दी गई है। सरकारी बैंकों द्वारा एक ओर मुद्रा लोन, एजुकेशन लोन और किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए बड़े पैमाने पर कर्ज बांटा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर बैंकरों को लगातार पुराने लोन की रिकवरी भी करनी पड़ रही है।

निश्चित रूप से सरकारी बैंकों के एकीकरण से बड़े और मजबूत बैंक बनाया जाना एक अच्छी रणनीति का भाग है। यह कदम उद्योग-कारोबार, अर्थव्यवस्था और आम आदमी सभी के परिप्रेक्ष्य में लाभप्रद होगा। इसमें बैंकों की बैलेंसशीट सुधरेगी, बैंकों की परिचालन लागत घटेगी। पूंजी उपलब्धता से बैंक ग्राहकों को सस्ती दरों पर कर्ज मुहैया करा सकेंगे।

मजबूत बैंकों से धोखाधड़ी के गंभीर मामलों को रोका जा सकेगा, साथ ही फंसा कर्ज (एनपीए) भी घटेगा। बैंकों के विलय के साथ ही बैंकों के लिए नए परिचालन सुधार भी दिखाई देंगे। सरकारी बैंक मजबूत बन कर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करते हुए अर्थव्यवस्था को गतिशील कर सकेंगे। सरकारी बैंकों के विलय से बैंकों की ग्राहक सेवा बेहतर होगी। बैंकों में नई तकनीकी विशेषज्ञता आ सकेगी और बैंक कर्मियों में वेतन असमानता दूर होगी।

चूंकि सरकारी बैंकों के निजीकरण की डगर पर सरकार पहली बार आगे बढ़ी है, इसलिए उसे बैंकों के निजीकरण का स्पष्ट खाका पेश करना होगा। निस्संदेह अपेक्षाकृत छोटे और मझोले बैंकों के निजीकरण से शुरुआत करके बैंकों के निजीकरण के हालात का उपयुक्त जायजा लिया जा सकता है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि मजबूत सरकारी बैंकों के गठन की तुलना में बैंकों का निजीकरण अधिक कठिन काम है। सबसे पहले सरकार को रिजर्व बैंक के साथ विचार मंथन करके यह निर्धारित करना होगा कि बैंकों के निजीकरण के लिए किस तरह के संभावित खरीदार होंगे। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के कार्य समूह की इस अनुशंसा पर भी ध्यान देना होगा कि बड़े कॉर्पोरेट और औद्योगिक घरानों को भी खरीदार बनने की इजाजत दी जा सकती है।

निस्संदेह बैंकों के निजीकरण के लिए सरकार को अगले वित्तवर्ष 2021-22 में शीघ्र शुरुआत करनी होगी, क्योंकि पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगेगा। इसके अलावा सरकार को परिचालन के कई मुद्दों पर विचार मंथन भी करना होगा। सरकार को तय करना होगा कि चयनित बैंक में वह अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचेगी या कुछ हिस्सेदारी अपने पास रख कर प्रबंध का कार्य खरीदार को सौंपेगी? सरकार को कर्मचारियों के मसले से निपटने के लिए भी रणनीति बनाना होगी। चूंकि सरकारी बैंकों में बड़ी तादाद में कर्मचारी हैं, इसलिए निजीकरण के बाद खरीदार कर्मचारियों को किस तरह रोजगार में बनाए रखेगा, इस विषय पर भी विस्तृत खाका तैयार करना होगा। साथ ही निजीकरण के लिए सरकार द्वारा परिचालन के मसलों को भी प्रभावी ढंग से निपटाना होगा।

उम्मीद है कि निजी क्षेत्र के बैंकों को सरकारी काम करने की अनुमति देने से निजी क्षेत्र के बैंक भी देश के विकास और सामाजिक क्षेत्र की पहल को आगे बढ़ाने में बराबर के साझीदार होंगे और देश के करोड़ों बैंक उपभोक्ताओं को लाभ होगा। छोटे और मझोले आकार के सरकारी बैंकों का निजीकरण पुनर्पंूजीकरण की राजकोषीय चुनौतियों की चिंताओं को कम करेगा। स्टेट बैंक सहित कुछ मजबूत सरकारी बैंक ग्रामीण इलाकों सहित विभिन्न क्षेत्रों में सरल बैंकिंग सेवाओं के साथ सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए और अधिक विश्वसनीय वाहक बनेंगे। निस्संदेह इन विभिन्न बैंकिंग सुधारों से देश के आम आदमी, उद्योग-कारोबार सहित संपूर्ण अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।

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