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राजनीतिः बागवानी क्रांति की जरूरत

आयातित फलों-सब्जियों की वजह से भारतीय उत्पादक मुसीबत से घिरते जा रहे हैं। इसका कारण है कि प्रति हेक्टेयर पैदावार के मोर्चे पर भारत बहुत पीछे है। फिर फल, फूल, सब्जी आदि को संरक्षित करने के लिए जरूरी प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और कोल्ड स्टोरेज जैसे बुनियादी ढांचे की भारी कमी है। इसके चलते कुल पैदावार का एक-चौथाई हिस्सा हर साल सड़ जाता है।

Author Updated: February 4, 2017 3:47 AM
(Express Pic)

पिछली जनगणना के मुताबिक बीते एक दशक में किसानों की तादाद में नब्बे लाख की कमी आई है। यानी हर रोज 2460 किसान खेती छोड़ रहे हैं। उदारीकरण के समर्थकों के मुताबिक यह खेती पर बोझ कम होने का संकेत है। मगर इस दौरान खेतिहर मजदूरों की तादाद में हुई 3.77 करोड़ की बढ़ोतरी उनके उत्साह पर पानी फेर देती है। इससे यह प्रमाणित होता है कि किसान मजदूर बन रहे हैं। उनकी दशा में सुधार नहीं, गिरावट आ रही है। यह भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में हो रहा है। आज यूरोप में तमाम तरह की सब्सिडी के बावजूद हर मिनट एक किसान खेती-किसानी को अलविदा कह रहा है। जनगणना में एक कड़वा सच यह भी उजागर हुआ कि पिछले एक दशक में जहां अनियमित और ठेके पर काम करने वालों की संख्या बढ़ी है, वहीं स्थायी रोजगार वालों की तादाद 2.6 फीसद घटी है।

तेरह साल पहले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन ने एक रिपोर्ट में बताया था कि चालीस फीसद किसान केवल इसलिए खेती कर रहे हैं कि उनके पास कोई दूसरा अच्छा विकल्प नहीं है। देखा जाए तो खेती-किसानी की दुर्दशा के लिए सरकारें दोषी नजर आएंगी, क्योंकि वे किसानों की उपज की वाजिब कीमत दिलाने में नाकाम रहती हैं। उपज की वाजिब कीमत के अलावा कृषि पर अत्यधिक जनभार भी किसानों की बदहाली का एक प्रमुख कारण है। दुनिया भर में देखा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घटने के साथ ही उस पर निर्भर लोगों की तादाद भी घटने लगती है। मगर भारत में ऐसा नहीं हुआ। 1950-51 में देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान पचपन फीसद था, जो आज पंद्रह फीसद से भी कम रह गया है, जबकि इस दौरान कृषि पर निर्भर लोगों की तादाद चौबीस करोड़ से बढ़ कर बहत्तर करोड़ हो गई है। यही कारण है कि खेती पर निर्भर लोगों की आमदनी घटती गई। कृषि क्षेत्र में कम आमदनी के कारण ही गांवों से शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है।

घाटे का सौदा बनी खेती-किसानी के सामने बदलता मौसम चक्र नई चुनौती लेकर आया है। आज न तो समय से बारिश होती है और न उसकी आवृत्ति समान रहती है। यही कारण है कि हर साल देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में रहता है। इसीलिए अब ऐसी खेती की मांग बढ़ती जा रही है, जिसमें कम पानी लगता हो और उसकी बिक्री से किसानों को लगातार आमदनी हो। विशेषज्ञों के मुताबिक यह काम फलों-सब्जियों की खेती से ही संभव है। गौरतलब है कि देश के 8.5 फीसद फसली क्षेत्र पर बागवानी की जाती है, लेकिन इनसे कृषि के सकल घरेलू उत्पाद का तीस फीसद प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, फलों और सब्जियों की खेती अन्य फसलों के मुकाबले चार से दस गुना ज्यादा लाभ देती है। शहरीकरण, मध्यवर्ग का विस्तार, बढ़ती आमदनी, खान-पान की आदतों में बदलाव के चलते दुनिया भर में अनाज के बजाय फलों-सब्जियों की मांग तेजी से बढ़ी है। आंकड़ों के मुताबिक प्रति व्यक्ति आय में एक फीसद की बढ़ोतरी से सब्जी की खपत 1.02 फीसद और फलों की 1.9 फीसद बढ़ जाती है। स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में फल और सब्जी की खपत में तेजी से इजाफा होगा।
मगर समस्या है कि चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल और सब्जी उत्पादक होने के बावजूद भारत इस बाजार में भरपूर हिस्सेदारी नहीं बना पा रहा है। गौरतलब है कि भारत विश्व का 12.6 फीसद फल और 14 फीसद सब्जी उत्पादन करता है, लेकिन फलों और सब्जियों के कुल वैश्विक बाजार में उसकी हिस्सेदारी महज 0.5 और 1.7 फीसद है। भारत का फल और सब्जी आयात लगातार बढ़ते हुए दो अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

आमतौर पर वैश्विक बाजार में भारत की कम हिस्सेदारी के लिए बड़ी आबादी और घरेलू खपत को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, लेकिन गहराई से देखा जाए तो इसके लिए देश की वे परिस्थितियां जिम्मेदार हैं, जिनके कारण भारतीय फल और सब्जी विदेशी बाजारों में पहुंचते-पहुंचते महंगी होकर गैर-प्रतिस्पर्धी हो जाती हैं। सबसे बड़ी बाधा है परिवहन की ऊंची लागत। दूसरे, देश में मांग के अनुरूप गुणवत्ता निर्धारण सुविधाओं की भारी कमी है। भारत में अन्य देशों की तुलना में माल ढुलाई लागत बीस से तीस फीसद ज्यादा है। इससे भारतीय उत्पाद खुदरा बाजार में दस-पंद्रह फीसद महंगे हो जाते हैं और उनकी बाजार हिस्सेदारी प्रभावित होती है। मसलन, देश के सेब उत्पादक क्षेत्र उत्तर भारत में हैं और सेब का मुख्य कारोबार दिल्ली में होता है। इससे उत्तर भारत में घरेलू सेब आयातित सेब से सस्ता पड़ता है। लेकिन अत्यधिक दूरी और ढुलाई लागत के कारण दक्षिण और पश्चिमी भारत के बाजारों में घरेलू सेब आयातित सेब से महंगा पड़ने लगता है। कमोबेश यही स्थिति आलू की है।

अब स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि आयातित फलों-सब्जियों की वजह से भारतीय उत्पादक मुसीबत से घिरते जा रहे हैं। इसका कारण है कि प्रति हेक्टेयर पैदावार के मोर्चे पर भारत बहुत पीछे है। फिर फल, फूल, सब्जी आदि को संरक्षित करने के लिए जरूरी प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और कोल्ड स्टोरेज जैसे बुनियादी ढांचे की यहां भारी कमी है। इसके चलते कुल पैदावार का एक-चौथाई हिस्सा हर साल सड़ जाता है। इससे किसानों का मुनाफा मारा जाता है और उनके पास निवेश करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचता। किसानों के साथ-साथ आयातित फल-सब्जी उपभोक्ताओं के लिए भी खतरनाक है, क्योंकि बंदरगाहों पर आयातित फलों-सब्जियों की गुणवत्ता की जांच-परख की सुविधा नहीं है। यही कारण है कि इनके साथ संक्रामक तत्त्वों के आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि बदली परिस्थितियों ने फलों और सब्जियों की खेती के लिए सुनहरा मौका दिया है, लेकिन समस्या है कि किसानों को इनकी खेती के लिए प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। इसे देखते हुए श्वेत क्रांति के पहले की परिस्थितियां याद आती हैं, जिसमें पशुपालकों के पास दूध तो था, लेकिन विपणन ढांचा न होने के कारण दूध उत्पादन घाटे का सौदा था। उस समय दूध उत्पादन को एपीएमएसी के दायरे से बाहर किया गया और दूध की खरीद-बिक्री पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटा दिया गया। देश भर में दूध संग्रह केंद्र खुले और पशुपालकों को आजादी दी गई कि वे केंद्र पर जितना दूध लाएंगे, उसकी खरीद की जाएगी। इसका नतीजा श्वेत क्रांति के रूप में सामने आया, जिससे न केवल दूध की किल्लत दूर हुई, बल्कि किसानों को नियमित आय का जरिया मिल गया। दूध और फल-सब्जी में कई समानताएं हैं। दोनों जल्दी खराब होने वाले हैं और उत्पादक इन्हें अपने पास रख नहीं सकते।

इसके साथ-साथ भारत को कम लागत वाले परिवहन-विपणन ढांचे का निर्माण करना होगा। यह तभी होगा जब हम सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डों की स्थिति सुधारें और प्रसंस्करण, भंडारण और कोल्ड चेन में भारी निवेश करें। बागवानी क्षेत्र के विकास पर गठित सौमित्र चौधरी समिति ने भी बीज विकास से लेकर भंडारण-विपणन की अत्याधुनिक व्यवस्था करने की सिफारिश की थी, लेकिन यूपीए सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। अब मोदी सरकार जिस ढंग से ग्रामीण आधारभूत ढांचे और इ-मंडी का विकास कर रही है उससे न केवल किसानों की बदहाली दूर होगी, बल्कि भारतीय फल और सब्जी दुनिया भर में अपनी धाक जमाने में कामयाब होंगे। इससे न तो आलू, प्याज, टमाटर को सड़कों को पर फेंकने की नौबत आएगी और न उपभोक्ताओं के आंसू निकलेंगे।

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