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राजनीति : संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन की जरूरत

अनेक ताकतवर देश संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित प्रस्तावों के प्रतिकूल कार्य कर उनका निरादर करते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन करने और इनका उपयोग अपने हित में करने की प्रवृत्ति भी महाशक्तियों में देखी जाती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से ही इस प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

राजू पांडेय

अनेक ताकतवर देश संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित प्रस्तावों के प्रतिकूल कार्य कर उनका निरादर करते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन करने और इनका उपयोग अपने हित में करने की प्रवृत्ति भी महाशक्तियों में देखी जाती है। परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद भी अमेरिका समेत सभी ताकतवर देशों के पास न केवल परमाणु हथियार हैं, बल्कि उन पर नए परमाणु हथियारों को विकसित करने के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने अपने पचहत्तर वर्ष पूरे कर लिए। काफी समय से इस संस्था में कुछ मूलभूत बदलावों की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। पिछले माह हमारे प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के पचहत्तरवें अधिवेशन को संबोधित करते हुए इसके वर्तमान स्वरूप और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए। उनके संबोधन के बाद संयुक्त राष्ट्र में बदलाव की मांग जोर पकड़ने लगी है।

संयुक्त राष्ट्र का गठन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में सामूहिक सुरक्षा और शांति की स्थापना के मकसद से हुआ था। संयुक्त राष्ट्र के आलोचक मानते हैं कि 1945 से आज तक- जब अजरबैजान और आर्मीनिया के बीच संघर्ष जारी है- संयुक्त राष्ट्र इस लक्ष्य की प्राप्ति में अनेक बार पूर्णत: विफल रहा है। अपनी स्थापना के पहले पैंतालीस वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को महाशक्तियों के पारस्परिक अविश्वास और शत्रुता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा विएतनाम, ग्रेनेडा और पनामा पर आक्रमण किया गया।

इसी प्रकार सोवियत संघ ने हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान में सैन्य हमले और हस्तक्षेप किए। विशेषज्ञों का एक बड़ा समूह मानता है कि शक्तिशाली राष्ट्र अपनी ताकत बढ़ाने और अपने राष्ट्रीय हितों की सिद्धि के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का इस्तेमाल करते हैं। कई उदाहरणों से जाहिर है कि जब अमेरिका जैसी महाशक्तियों का हित जुड़ा हुआ था तब विवादों के निपटारे और शांति की स्थापना के लिए यूएन ज्यादा सक्रिय रहा और उसके प्रयासों को कामयाबी भी मिली। पर जब अन्य सदस्यों के हित इन विवादों से जुड़े हुए थे तो संयुक्त राष्ट्र की वैसी रुचि या सक्रियता नहीं दिखी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेताओं- अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन- को बिना किसी प्रजातांत्रिक प्रक्रिया के दी गई वीटो शक्ति का दुरुपयोग इन ताकतवर देशों द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की सिद्धि के लिए खुल कर किया गया। जुलाई 2020 तक स्थिति यह थी कि पूर्व सोवियत संघ और आज के रूस ने एक सौ सोलह बार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने इक्यासी बार, यूनाइटेड किंगडम ने उनतीस बार और फ्रांस तथा चीन ने सोलह-सोलह बार वीटो पावर का इस्तेमाल किया था।

इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की गैर-लोकतांत्रिक संरचना और कार्यप्रणाली संयुक्त राष्ट्र की नाकामी का एक प्रमुख कारण रही है। इसकी सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य अपनी शक्तिशाली स्थिति का दुरुपयोग यूएन के ऐसे निर्णयों के क्रियान्वयन में बाधा डालने के लिए करते रहे हैं, जो उनके राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल हैं, भले ये निर्णय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और समरसता की स्थापना में सहायक क्यों न हों।

अब जब प्रत्यक्ष पारंपरिक युद्ध के बजाय ‘प्रॉक्सी वार’ का युग आ चुका है, तब यूएन के लिए शांति स्थापित करना और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। अब ताकतवर देश अपने राजनीतिक-सामरिक-व्यापारिक हितों की सिद्धि के लिए अनेक छोटे देशों में राजनीतिक अस्थिरता, सत्ता परिवर्तन, तानाशाही और वर्ग संघर्ष, गृहयुद्ध तथा हिंसा को बढ़ावा देते देखे जाते हैं। छद्म युद्ध में संबंधित पक्षों की प्रतिबद्धता, उनकी असली प्राथमिकता और उनके वास्तविक चरित्र को समझ पाना कठिन होता है, इस कारण शांति प्रक्रिया की सफलता भी संदिग्ध होती है।

विभिन्न देशों में चल रहे हिंसक संघर्षों में आतंकवादियों की सक्रिय भूमिका देखी गई है और इसी कारण यूएन के शांति अभियान अब और अधिक चुनौतीपूर्ण और खतरनाक हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस के अनुसार, शांति रक्षक दल के सदस्य और सैनिक आतंकवाद से मुकाबला करने में प्राय: दक्ष नहीं होते। यही कारण है कि ये आतंकवादियों का निशाना बनते हैं और इनकी बर्बर हत्याएं भी हो रही हैं। इन शांति अभियानों के औचित्य और इन अभियानों के लिए अंशदान को लेकर अलग-अलग देशों का रवैया भिन्न-भिन्न रहा है।

खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप यूएन को दिए जाने वाले अंशदान को लेकर अत्यंत अनुदार रहे हैं। उन्होंने इसमें भारी कटौती भी की है। स्थिति यह है कि यूएन विभिन्न शांति अभियानों में हिस्सेदारी करने वाले विभिन्न देशों के शांति सैनिकों को उनके देश के साथ किए गए अनुबंध के आधार पर भुगतान करने में भी स्वयं को असमर्थ पा रहा है। हाल के दिनों में यूएन विश्व के विभिन्न देशों में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की रक्षा में नाकाम रहा है। इराक और सीरिया में आइएसआइएस के आतंकियों के बर्बर अत्याचारों से धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए यूएन की कोशिशें नाकाफी थीं। म्यांमा में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार को रोकने में भी यूएन विफल रहा।

यमन में मानवाधिकारों के उल्लंघन तथा स्त्रियों और बच्चों पर हो रहे अत्याचारों के विषय में संयुक्त राष्ट्र अपेक्षित कठोरता नहीं दिखा पाया। सार्वभौमिक समानता के आदर्श के ठीक विपरीत यूएन में छोटे, निर्धन और निर्बल देशों के लिए अपनी सुरक्षा और विकास से संबंधित मामलों को उठाने के अवसर नहीं के बराबर हैं। इन देशों की समस्याओं पर तभी चर्चा होती है जब महाशक्तियों के हित इनसे जुड़े होते हैं।

अनेक ताकतवर देश संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित प्रस्तावों के प्रतिकूल कार्य कर उनका निरादर करते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन करने और इनका उपयोग अपने हित में करने की प्रवृत्ति भी महाशक्तियों में देखी जाती है। परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद भी अमेरिका समेत सभी ताकतवर देशों के पास न केवल परमाणु हथियार हैं, बल्कि उन पर नए परमाणु हथियारों को विकसित करने के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं। अमेरिका परमाणु अप्रसार संधि के आधार पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने की वकालत कर रहा है, जबकि खुद उसके पास परमाणु हथियारों का बड़ा जखीरा है। इजराइल के परमाणु हथियारों के संबंध में अमेरिका और यूएन वैसी तत्परता नहीं दिखाते जैसी ईरान के विषय में दिखाई गई।

संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों को स्वतंत्रता होती है कि वे किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर यूएन में चर्चा कर सकते हैं, पर इस आजादी का दुरुपयोग अनेक देश करते रहे हैं और अपने राजनीतिक स्वार्थ की सिद्धि के लिए ऐसे मुद्दों को उठाते रहे हैं जिनका यूएन से कोई संबंध नहीं होता। पाकिस्तान ऐसे देशों में अग्रणी है जो यूएन में भारत के आंतरिक मामलों पर गैरजरूरी और गैरजिम्मेदार टिप्पणियां निरंतर करता रहा है।

इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र के अनेक समर्थक इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद यूएनओ ने विभिन्न देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई और नब्बे के दशक के मध्य में विभिन्न देशों के बीच तनाव कम करने और युद्ध टालने में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों की भूमिका की भी अनेक बार प्रशंसा हुई है।

इसके शांति अभियान महज हिंसा और संघर्ष टालने तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि इन्होंने अनेक देशों में तानाशाही से प्रजातंत्र की ओर बढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षकों ने युद्ध, हिंसा और अराजकता के काल में पीड़ित मानवता की सेवा की है। यूएन प्रजातांत्रिक समाज और शासन व्यवस्था को बढ़ावा देता रहा है। स्वास्थ्य तथा शिक्षा की बेहतर और जवाबदेह व्यवस्था तथा मानवाधिकारों का संरक्षण और पर्यावरण हितैषी जीवन शैली जैसी विशेषताएं सहज रूप से जुड़ी हुई होती हैं।

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों ने मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष को विकसित और समृद्ध करने में अपनी भूमिका निभाई है। ताकतवर राष्ट्रों के संकीर्ण हितों, महत्त्वाकांक्षाओं और विश्व को नियंत्रित करने की उनकी लालसा ने संयुक्त राष्ट्र की सफलताओं को सीमित किया है, पर विश्व शांति की स्थापना, उदार और समावेशी वैश्विक दृष्टिकोण के निर्माण, मानवाधिकारों की रक्षा तथा प्रजातांत्रिक मूल्यों के संरक्षण में संयुक्त राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका ने इसे विश्व की अस्तित्व रक्षा के लिए अपरिहार्य और अनिवार्य बना दिया है।

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