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ऑनलाइन शिक्षा और चुनौतियां

इसमें कोई शक नहीं कि शिक्षा हासिल करने की इच्छा रखने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा गरीब तबके से है। इनमें शहरी और ग्रामीण गरीब दोनों हैं। कंप्यूटरों की कमी और इंटरनेट की सुविधा का अभाव आॅनलाइन शिक्षा में बड़ी बाधा के रूप में उभरा है। नेटवर्क जैसी तकनीकी समस्या भी इसमें रोड़ा साबित हुई है। आॅनलाइन परीक्षाओं के आयोजन में भी अड़चनें कम नहीं हैं।

online educationसांकेतिक फोटो।

नागेश्वर राव

शिक्षा की सार्थकता से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। देश को मजबूत बनाने के लिए महात्मा गांधी ने भी सबसे ज्यादा जोर शिक्षा पर ही दिया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले तिहत्तर वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में भारत ने काफी प्रगति की है। अठारह से तेईस वर्ष के तकरीबन पौने चार करोड़ (करीब साढ़े सत्ताईस फीसद) छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं, उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या भी आशातीत रूप से बढ़ी है और देशभर में नौ सौ तिरानवे विश्वविद्यालय, चालीस हजार के आसपास महाविद्यालय और ग्यारह हजार के लगभग निजी उच्च शिक्षण संस्थान हैं।

लेकिन इसके बावजूद अठारह से तेईस वर्ष की सत्तर फीसद से ज्यादा आबादी उच्च शिक्षा की परिधि से बाहर है। देश के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। इसका एक बड़ा कारण बच्चों का बीच में ही पढ़ाई छोड़ देना भी है। यह प्रवृत्ति लाखों बच्चों को उच्च शिक्षा से विमुख करती है। हालांकि इसके भी कारण हैं। अगर स्कूली शिक्षा से उच्च शिक्षा तक की बात करें तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने की दर लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की ज्यादा है। आर्थिक और सामाजिक कारणों के कारण बालिकाओं को दूरदराज के स्कूल-कालेज में पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता। इसी संकट को दूर करने में आॅनलाइन शिक्षा बड़ी भूमिका निभा रही है।

यह तो अब साबित हो ही चुका है कि अगर आॅनलाइन शिक्षा का ढांचा मजबूत हो और सुगमता के साथ सब तक इसकी पहुंच बन जाए समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है। कोरोना महामारी के काल में दुनिया का स्वरूप बदल गया है और व्यक्ति से लेकर समाज के हर क्षेत्र में यह बदलाव परिलक्षित हो रहा है।

भविष्य में ये बदलाव और ठोस रूप लेते दिखाई देंगे। इन्हीं में शिक्षा और रोजगार भी हैं। आज देश में हम जिस आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं, उसका अहम पक्ष शिक्षा से ही जुड़ा है। अच्छी बात तो यह है कि भारत के पास संसाधन और इच्छाशक्ति दोनों ही की कमी नहीं है। प्रधानमंत्री ई-योजना के तहत पचास लाख विद्यालयों और पचास हजार से अधिक उच्च शिक्षण संस्थाओं को डिजिटल बनाने की योजना बन चुकी है। जाहिर है, देश के करोड़ों नागरिकों को शिक्षित करने की दिशा में यह बड़ा कदम होगा। आॅनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देकर हम दुनिया के सामने मिसाल कायम कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति में शिक्षा से जुड़े ऐसे कई आयाम हैं जिन पर अब तक कोई पाठ्यक्रम नहीं बने हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत आॅनलाइन शिक्षा के माध्यम से उच्च शिक्षा को नई दिशा देने के प्रयास किए गए हैं। अब शिक्षा में ज्ञान और कौशल के सांमजस्य पर जोर होगा। नई शिक्षा नीति में विभिन्न विषयों को एकीकृत करने का प्रयास किया जाएगा। राष्ट्रीय आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नई शिक्षा नीति में सकल नामांकन अनुपात को पचास फीसद से ज्यादा तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही देश में गुणवत्तापरक शिक्षा का दायरा भी बढ़ाने पर जोर है।

इसके लिए ई-पुस्तकालय और स्वयंप्रभा इत्यादि विषयों पर एक सुव्यवस्थित शिक्षण व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास चल रहा है। स्वयंप्रभा नामक यह प्रयास 2016 में शुरू हुआ था, जिसमें लगभग तीन हजार विषयों की पाठयसामग्री उपलब्ध है। यह सामग्री अभियांत्रिकी, तकनीक, समाज विज्ञान, मानविकी, शिक्षक शिक्षा आदि विषयों से संबद्ध हैं। इस तरह की पाठ्यसामग्री के विषय वार निर्माण के साथ-साथ स्वयंप्रभा के तीस से ज्यादा चैनलों द्वारा शिक्षा का प्रसार करने का प्रयास किया गया है।

इन विषयों के वीडियो व अन्य सामग्री देश के प्रतिष्ठित विद्वान और विषय विशेषज्ञ तैयार करते हैं। इस प्रकार के विषयों के अध्ययन के लिए कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय मे वर्ष में दो बार प्रवेश ले सकता है। यह प्रवेश निशुल्क है। इसमें डिजिटल पाठ्य सामग्री के साथ-साथ वीडियो द्वारा शिक्षण व्यवस्था होती है। चर्चा का भी आयोजन किया जाता है। यह शिक्षण व्यवस्था अत्यंत लोकप्रिय साबित हुई है। इस प्रकार आॅनलाइन शिक्षा का यह प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहुविषय नीति की ज्ञान परंपरा को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे शिक्षार्थी पर आर्थिक भार भी ज्यादा नहीं पड़ेगा और उसे घर बैठे गुणवत्तापरक शिक्षा उपलब्ध होगी।

परंपरागत शिक्षा व्यवस्था की कुछ मूलभूत अड़चनों का नुकसान हमें उठाना पड़ा है। तमाम उच्च शिक्षा संस्थानों में नामांकन उच्च प्रतिशत पर ही बंद हो जाता है और लाखों छात्रों को दाखिला नहीं मिल पाता। उदाहरण के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के ही कुछ कॉलेजों को लें जहां दाखिला निन्यानवे प्रतिशत अंकों पर बंद हो जाता है। देश के तमाम प्रतिष्ठित कॉलेजों की स्थिति भी ऐसी ही है।

ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी छात्र कहां जाएं, खासतौर से आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समाज के बच्चों के लिए तो और गंभीर संकट है। आखिर गरीब तबके का कोई भी विद्यार्थी कैसे अच्छे संस्थानों में पढ़ पाएगा। बेहतरीन शिक्षण संस्थाओं की प्रामाणिकता अच्छे शिक्षण से ही बनती है। ऐसे में आॅनलाइन शिक्षा ही वह माध्यम है जो इस समस्या का समाधान करती है। आॅनलाइन शिक्षा दाखिले की नकारात्मक सोच को ही बदल देती है। इसमें दाखिले का एकमात्र आधार ज्ञानार्जन की इच्छाशक्ति होता है।

भारत की आबादी विशाल है। अगर कक्षा और ब्लैक बोर्ड तक ही शिक्षा सिमटी रही तो लाखों बच्चे गुणवत्तायुक्त उच्च शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। करोड़ों विद्यार्थियों के लिए कालेजों और विश्वविद्यालयों का भारी-भरकम तंत्र खड़ा करना अत्यंत खचीर्ला और चुनौतीपूर्ण काम है। इसलिए यहां आॅनलाइन शिक्षा प्रासंगिक हो जाती है। आॅनलाइन शिक्षा व्यवस्था पर अमेरिकी शोध संस्थाओं की रिपोर्टें भी इस बात की पुष्टि करती हैं।

कई आंकड़े भारत के पक्ष में हैं। दुनिया में अगले एक दशक में कामगारों की सबसे बड़ी जमात भारत में ही होगी और इसमें सत्रह से पैंतालीस साल के बीच के लोग ही होंगे। इसलिए भारत सरकार की योजना 2035 तक उच्च शिक्षण संस्थाओं में छात्रों की संख्या के आंकड़े को पचास प्रतिशत तक पहुंचाने की है, जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा अस्सी से नब्बे फीसद के बीच है।

अहम सवाल यह है कि क्या परंपरागत शिक्षा व्यवस्था के द्वारा यह आंकड़ा प्राप्त किया जा सकता है। दरअसल ऐसा होना संभव नहीं दिखाई देता, क्योंकि देश में हजारों कॉलेज और विश्वविद्यालय के बनाए जाने के बाद भी बड़ी संख्या में बच्चे स्कूली शिक्षा के उपरांत कॉलेज तक नहीं पहुंच पाते। इसीलिए आज आॅनलाइन शिक्षा को सार्थक और बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट में इस बात की तस्दीक की गई है कि आॅनलाइन शिक्षा प्रणाली में शिक्षा और मूल्यांकन कहीं ज्यादा गुणवत्तापूर्ण रहा है। शिक्षक के लिए भी विद्यार्थियों के साथ अकादमिक संपर्क ज्यादा सशक्त ढंग से होता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों तक इंटरनेट की पहुंच बनी है। भारत ब्रॉडबैंड मिशन के तहत अगले साल यानी 2022 तक देश के हर गांव और शहर को इंटरनेट से जोड़ दिया जाएगा।

आॅनलाइन शिक्षा की राह में और भी अड़चनें हैं। इसमें कोई शक नहीं कि शिक्षा हासिल करने की इच्छा रखने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा गरीब तबके से है। इनमें शहरी और ग्रामीण गरीब दोनों हैं। कंप्यूटरों की कमी और इंटरनेट की सुविधा का अभाव आॅनलाइन शिक्षा में बड़ी बाधा के रूप में उभरा है। नेटवर्क जैसी तकनीकी समस्या भी इसमें रोड़ा साबित हुई है। आॅनलाइन परीक्षाओं के आयोजन में भी अड़चनें कम नहीं हैं। भाषा को लेकर भी समस्याएं हैं। ऐसे में जब तक तकनीकी ढांचा मजबूत नहीं बनेगा और हर व्यक्ति के पास कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा नहीं होगी, तब तक आॅनलाइन शिक्षा का सपना साकार नहीं होगा।
(लेखक इग्नू के कुलपति हैं)

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