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सबरंगः ‘चुनाव से नहीं कोई डर, काम ही कसौटी पर’

भारतीय राजनीति में जब गाय, गीता और गंगा को स्थापित करने की कवायद चल रही थी उस वक्त मध्य प्रदेश एक नजीर बन चुका था। यहां के मुखिया राजनीति में अध्यात्म की ब्रांडिंग कर चुके थे। वे प्रतीक चुनते हैं आदि गुरु शंकराचार्य को। आतंकवाद, नक्सलवाद से लेकर नदी और पर्यावरण के मसले को जोड़ते हैं अद्वैतवाद से। शंकराचार्य की सांस्कृतिक यात्राओं से प्रेरणा लेकर जल, जंगल और जमीन से जुड़े इस राज्य को जोड़ने की कोशिश की गई जिसके अनुगामी धुर विपक्षी दिग्विजय सिंह भी हुए और नर्मदा किनारे चल पड़े। अद्वैतवाद से लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को जनता के बीच लेकर गए। नर्मदा यात्रा, एकात्म यात्रा से लेकर लोकमंथन करनेवाले शिवराज एक जननायक की छवि बनाने में कामयाब रहे हैं। हर मंच से उतर कर जनता से घिर जानेवाले सौम्य छवि वाले शिवराज के साथ ली हुई सेल्फी यूं ही नहीं सूबे के आम घरों में फोटो फ्रेम में टंगी मिलती है। अपनी राष्टÑभक्त वाली छवि से कभी कोई संकोच नहीं किया इसलिए रानी पद्मावती को राष्टÑमाता कहते हैं और भोपाल में भारत माता का मंदिर बनवाने का रास्ता साफ करते हैं। वे कहते हैं कि सत्ता की बुनियाद अध्यात्म है और विकास व अध्यात्म को साथ लेकर चलना मैं जानता हूं। 13 सालों तक राज करने के बाद जनता उनके लिए जो भी फैसला सुनाए लेकिन भारतीय राजनीति में अध्यात्म का मॉडल स्थापित करने का श्रेय तो रखते हैं। शिवराज सिंह चौहान से जनसत्ता के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत।

शिवराज सिंह चौहान

’विकास और अध्यात्म को साथ लेकर चल रहे मध्य प्रदेश जैसे अहम राज्य में लगातार तीन पारी के बाद आप चौथी बार जनता की अदालत में होंगे। इस बार की तैयारी कैसी है?
जवाब : जो लगातार काम करते हैं, वे चुनावों के लिए विशेष तैयारी नहीं करते, और चुनावों के लिए क्या तैयारी करनी। अभी तो वक्त है, पार्टी रणनीति बनाएगी। लेकिन अभी ऐसा कुछ खास उल्लेखनीय नहीं है। हमने तो लगातार जनता के लिए ही काम किया है और हमेशा जनता की दिशा में ही काम करेंगे तो चुनावों से क्या डरना।
’तो आपके वो कौन से काम हैं जिनके कारण आप चुनावों की तैयारी के लिए इंतजार कर सकते हैं।
जवाब : मैं एक काम की बात नहीं कर सकता। मध्य प्रदेश में समग्र विकास का काम अद्भुत तरीके से हुआ है। सारे काम जनता की ही दिशा में हैं। हमने हर क्षेत्र में कदम उठाए हैं खासकर कृषि के क्षेत्र में। आपने इस सूखे के साल में भी मध्यप्रदेश में हरियाली देखी होगी। सच कहें तो मध्यप्रदेश में कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में क्रांति हुई है, जिसका बहुत हल्ला नहीं मचाया गया है। हमने सबसे बड़ा काम पानी रोकने का किया है। इसी का नतीजा है कि इस साल सूखे के बाद भी अच्छी फसल हुई है। कृषि सिंचाई क्षेत्र सात लाख हेक्टेयर से बढ़कर 40 लाख हेक्टेयर का हो गया है। कृषि विकास दर लगातार सालों में 20 फीसद के ऊपर बनी हुई है। पूरी दुनिया के हिसाब से देखें तो यह बड़ी बात है। पांच साल में उत्पादन दोगुना हुआ है।
’बुनियादी संरचनाओं के विकास को किस तरह से देखते हैं?
जवाब : बुनियादी संरचनाओं को विकसित करने पर हमारा जोर रहा है। हमने विकास की जमीन बना दी है। बिजली की स्थिति बहुत बेहतर है। हम अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली का उत्पादन कर रहे हैं और अपने उपभोग के बाद बची हुई बिजली दूसरे राज्यों को दे रहे हैं। कृषि विकास दर भी 20 फीसद के ऊपर है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सभी जगह सड़कें और बुनियादी सुविधाओं का निर्माण हुआ है। कांग्रेस के कार्यकाल में शहर और गांव अविकसित थे। पिछले साल हमारे 100 में से 22 शहर प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत के कार्यक्रम के अंतर्गत आए थे। पहले हम शौचालयों में बहुत पीछे थे और आज शौचालय निर्माण में नंबर एक पर हैं। गांवों में जलापूर्ति, हाट, बाजार, सड़कें व नालियां ये ऐसे काम हैं जो हर किसी को दिखाई देते हैं।
’पिछले दिनों आपने कहा भी था कि मध्य प्रदेश का शहर इंदौर वाशिंगटन से बेहतर है?
जवाब : वह मैंने दूसरे संदर्भ में कहा था, जिसे कुछ ज्यादा ही तूल दे दिया गया। मैंने बात की थी इंदौर हवाई अड्डे से लेकर विशेष कॉरीडोर से गुजरने की। वाशिंगटन हवाई अड्डे से निकलकर वहां की सड़कों की स्थिति की तुलना में कहा था कि इंदौर हवाई अड्डे से निकल कर आपको वैसा ही लगेगा। अब अगर इसके बाद कोई एक खास गली-कूचे की तस्वीर लेकर बात करने लगे तो उसका क्या करें।
’किसी राज्य के लिए सबसे अहम चीजों में से एक शिक्षा और शिक्षकों की स्थिति पर आपका रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?
जवाब : इसमें हम आगे चल रहे हैं। कांग्रेस के कार्यकाल में शिक्षकों को 1200 रुपए मिलते थे, गुरुजी को 500 रुपए। पता नहीं कितनी तरह की श्रेणियां बना कर रखी गई थीं। हमने कहा कि सभी शिक्षक होंगे कोई शिक्षाकर्मी, गुरुजी या अध्यापक नहीं होगा। आज के समय में राज्य के शिक्षकों को 38 से 35 व 32 हजार तक की मासिक तनख्वाह मिल रही है। अगर शिक्षकों की ही हालत ठीक नहीं होगी तो राज्य का भविष्य क्या होगा। शिक्षक तो शिक्षण की आत्मा हैं। अगर द्रोणाचार्य को अपने बच्चे को दूध की जगह पानी में आटा मिलाकर पिलाना पड़ेगा तो उसे एकलव्य का अंगूठा तो काटना ही पड़ेगा।
’कमजोर तबके के लोगों के रोजगार को लेकर क्या दशा-दिशा है।
जवाब : अगर आप संपूर्णता में देखें तो हमारी भौगोलिक हालत जमीन पर निर्भर रहने की है। हम समुद्र तट पर रहने वाले नहीं हैं, जहां खास तरह के कारोबार हो सकते हैं। हमारा मुख्य संसाधन हमारी जमीन है और हमने इस पर काम किया है। आप देखें, मंदी के दिनों में भी हमने विकास की गति बना रखी है। उसमें अच्छा काम कर रखा है। हमने आवासीय जमीन का अधिकार कानून बनाकर दिया। दीनदयाल रसोई योजना चलाई। गरीबों की सुरक्षा का पूरा कवच तैयार कर दिया। कृषि विकास में हम आगे हैं। भावांतर भुगतान योजना जो हम लेकर आए उसका अध्ययन तो केंद्र का नीति आयोग भी कर रहा है। हमारी एक नहीं अनेक उपलब्धियां हैं।
’आज जब देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा गूंज रहा है तो आपके यहां महिला सशक्तीकरण का क्या हाल है?
जवाब : जहां तक महिला सशक्तीकरण की बात है तो पैदा होने से लेकर अंतिम सांस तक के सफर में हमने महिलाओं को सशक्त किया है। लाडली लक्ष्मी योजना है, किताबें निशुल्क हैं, दूर तक जाना है तो साइकिल दी है। स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर रोजगार तक में 50 फीसद का आरक्षण दिया है। पुलिस की नौकरी में भी 33 फीसद आरक्षण दिया है। मुफ्त किताबों से लेकर पहला बच्चा होने पर खुशी मनाने तक का इंतजाम किया है।
’आपकी बातचीत के केंद्र में किसान हैं। इस बार के बजट में भी खेती-किसानी को ही केंद्र में रखा गया था। लेकिन किसानों का आंदोलन कुछ और ही तस्वीर कह रहा। अपने सूबे को लेकर आप क्या कहेंगे?
जवाब : खेती-किसानी के क्षेत्र में जो आज हो रहा है वह पहले कभी नहीं हुआ। फसल की लागत का 50 फीसद मुनाफा देकर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना। यह विचार ही क्रांतिकारी है। यह तो स्वामीनाथन रिपोर्ट से आगे की बात है। पहली बार शिक्षण और प्रशिक्षण से किसानों की हैसियत मजबूत करने की बात कही गई है। मान लीजिए किसी किसान ने बंपर पैदावार की, लेकिन उसकी फसल के मूल्य ही गिर गए तो क्या फायदा होगा? अगर कीमत ही गिर गई तो 25 कुंतल की फसल पर भी मुनाफा नहीं होगा। अब लागत पर 50 फीसद मुनाफा तय करेंगे। इससे पहले पिछले साल आई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भी क्रांतिकारी थी। मॉडल खेती की कल्पना पहली बार की गई है। एक बात और अहम है। इस बार प्याज के दाम बढ़ गए और किसान ने मुनाफा कमाया या लहसुन पर मुनाफा कमाया तो वह फिर अगली बार पूरा जोर प्याज और लहसुन पर ही देगा जिससे फसल की कीमत नीचे चली जाएगी और उसे नुकसान होगा। किसान क्या और कैसे बोए और उपभोक्ताओं तक कैसे पहुंचाए इसमें उसकी मदद करनी होगी ताकि उसे नुकसान नहीं झेलना पड़े। केंद्रीय बजट में जो बांस मिशन का प्रावधान किया गया है वह किसानों की आय बढ़ाएगा। बांस कच्चा माल है, उसकी जरूरत ज्यादा है। हमें किसानों को शिक्षित करना होगा। इस बार ‘डीप इरिग्रेशन’ की बात की गई है। प्रधानमंत्री ने कम पानी में ज्यादा सिंचाई की राह तैयार की है। अभी तक होता यह था कि खेतों में नहर का पानी डाल दिया जाता था जिससे रिसाव होता था और जमीन दलदली हो जाती थी। पंजाब के खेत इसी का दुष्परिणाम झेल रहे हैं। एक बात और कहूंगा कि किसी भी नीति और योजना का परिणाम आने में समय लगता है। खेती और किसानी को लेकर हमारी दिशा अब सही हो गई है।
’आप कांग्रेस को अपने विपक्ष के रूप में किस तरह देखते हैं। इस सवाल का संदर्भ यह है कि वह बहुत सी जगहों पर फिर से खड़ी हो रही है और भाजपा व राजग के लिए चुनौती बन रही है।
जवाब : मुझे नहीं पता कि यह किस अवधारणा के तहत कहा जा रहा है। अभी 19 राज्यों में भाजपा की सरकार है। एक जमाना था जब हमारे सिर्फ चार मुख्यमंत्री मंच पर होते थे और अपनी उपलब्धियां बताते थे और आज जब एक मंच पर जुटकर हमारे 19 मुख्यमंत्री उपलब्धियां बताने लगेंगे तो फिर सुनने का समय नहीं रह जाएगा। एक चुनाव में कुछ सीटें कम हो जाने को कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार के रूप में नहीं देखा जा सकता। अलग-अलग राज्यों में कुछ ज्यादा और कम होते रहते हैं। इस बार भी भाजपा को गुजरात में 49 फीसद वोट मिले हैं। 22 साल सत्ता में रहने के बाद भी 49 फीसद वोट पा लेना चमत्कार है। अब धारणा बनती है कि प्रधानमंत्री शक्तिशाली हैं तो यह होना चाहिए। राजस्थान में दो सीटों से ही पूरा आकलन करने लगेंगे। अब बात करते हैं कि लोकसभा चुनाव में किसकी अगुआई होगी। और जब लोकसभा में तुलना होगी तो स्वाभाविक रूप से मानिए कि पहली पसंद नरेंद्र मोदी होंगे।
’भाजपा शासित राज्यों के बहुत से मंत्रियों ने तेजी से अपनी लोकप्रियता खोई है। अच्छी चीजों का श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है। तो मध्यप्रदेश के चुनाव में आप इस अवधारणा को कैसे देखते हैं।
जवाब : राज्य के चुनाव में राज्य की ही अगुआई देखी जाती है जो स्वाभाविक है। लेकिन केंद्र में भाजपा है। आज कमजोर तबकों के बीच प्रधानमंत्री आवास योजना सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। इसी तरह उज्ज्वला योजना भी लोकप्रिय हुई है। नागरिक हितों की योजनाओं से लोेगों को निजी तौर पर फायदा पहुंच रहा है। पहले भाजपा गरीबों की पार्टी नहीं मानी जाती थी। अब सबसे बड़ा अंतर यही आ रहा है कि भाजपा को गरीबों की हितकारी माना जा रहा है। मोदी जी जिस तरह से काम कर रहे हैं, उससे साफ है कि गरीबों के लिए काम हो रहा है। इन सबके बावजूद चुनाव में राज्य का नेतृत्व ही कसौटी पर रहेगा।
’लगातार तीन साल तक राज करने का भी कुछ खमियाजा भुगतने का डर है?
जवाब : मैं जहां जाता हूं, वहां मुझे जनता का इतना प्यार मिलता है कि कभी इस तरह का डर नहीं लगता। मैं कभी यह दावा नहीं करता कि सबकुछ परफेक्ट है। हां, परफेक्ट बनाने की कोशिश जरूर रहती है। लगातार सुधार की प्रक्रिया चलती रहती है। जनता का प्यार मिल रहा है, लगातार 13 सालों से।
’जब आप जनता के बीच होते हैं तो लोग आपके साथ सेल्फी लेने के लिए आतुर होते हैं और आप भी सुरक्षा घेरा तोड़ लोगों से घुलते-मिलते हैं। क्या कभी इसे लेकर असहज भी होते हैं?
जवाब : मेरे लिए मध्य प्रदेश का मतलब मेरा साढ़े सात करोड़ लोगों का परिवार है। मैं पागलपन की हद तक अपनी जनता से प्यार करता हूं। मेरी इच्छा है कि सबको प्यार करूं और गले लगाऊं। जो जितना कमजोर दिखता है उतनी ही उसके पास जाने की कोशिश होती है। जनता ही तो मेरी सुरक्षा है। जननेता को सुरक्षा की क्या चिंता।
’तो आप चौका लगाने के लिए तैयार हैं?
जवाब : अब यह तो जनता ही बताएगी।
’आपकी तैयारी पूरी है?
जवाब : जी हम तो तैयार हैं।
’अपनी पार्टी के अंदर आपकी स्थिति कितनी मजबूत है?
जवाब : यह सुखद है कि मध्य प्रदेश भाजपा में कोई गुटबाजी नहीं है। जिले में अलग कारणों से मतभेद होते हैं। हमारे यहां सब ठीक है।
’आपके राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कितनी भूमिका है?
जवाब : मुझे गर्व है कि मैं संघ का स्वयंसेवक हूं। ऐसा संगठन, जिसके स्वयंसेवक राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित रहते हैं। उन्हीं में से हम एक हैं। संघ कभी किसी काम में हस्तक्षेप नहीं करता। वह राष्ट्र  निर्माण में जुटा रहता है। परस्पर पूरकता का मामला है। हमने नर्मदा सेवा यात्रा निकाली। लेकिन यह संघ ने हमें नहीं कहा था। नदी और पर्यावरण को लेकर चिंता थी इसलिए निकाली। आदि गुरु शंकराचार्य ने मंत्र दिया था कि हम सब एक हैं। हमें लगा कि यह विचार फैलाना चाहिए। एकात्म यात्रा में जो भीड़ उमड़ी उसे देखकर लगा कि हम सफल रहे। अद्वैत वेदांत के सूत्रों को जनता तक पहुंचाना चाहता हूं।

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