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राजनीति: स्वास्थ्य क्षेत्र की खराब सेहत

भारत में डॉक्टरों की उपलब्धता की स्थिति वियतनाम और अल्जीरिया जैसे देशों से भी बदतर है। देश में इस समय लगभग साढ़े सात लाख सक्रिय डॉक्टर हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण गरीब लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने में देरी होती है। यह स्थिति अंतत: पूरे देश के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

Health and well beingस्वास्थ्य सेवाओं में आम जनता की बढ़ती जरूरतों के हिसाब से जीडीपी में बजट कम है।

नीति आयोग ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए खर्च बढ़ाने की जरूरत बताई है। आयोग के सदस्य वीके पॉल का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और देश के हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्यों को मिल कर स्वास्थ्य सेवाओं की मद में खर्च को बढ़ाना होगा। यह कटु सत्य है कि हमारे देश में आबादी के हिसाब से स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय स्थिति में हैं। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र डेढ़ फीसद ही खर्च होता है। हालांकि अब सरकार ने अगले पांच साल में इसे तीन फीसद तक करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन भारत जैसी विशाल आबादी के हिसाब से यह भी कम है। दुनिया के कई देश स्वास्थ्य सेवाओं की मद में आठ से नौ फीसद तक खर्च कर रहे हैं।

कोराना काल ने एक बार फिर हमारे देश की लचर स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल दी है। यदि देश का स्वास्थ्य ढांचा बेहतर होता तो कोराना काल में जनता को ज्यादा सुविधाएं दी जा सकती थीं। कोरोना काल में जहां एक ओर अनेक डॉक्टरों ने कई तरह के खतरे उठा कर कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों का जोर आर्थिक लाभ प्राप्त करने पर ही रहा। यह सही है कि धीरे-धीरे हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो रहा है, लेकिन जब इस दौर में भी गंभीर रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए अस्पतालों में स्ट्रेचर जैसी बुनियादी सुविधा भी न मिल पाए, तो देश की स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस प्रगतिशील दौर में भी ऐसी खबरें प्रकाश में आती रही हैं जब अस्पतालों ने मरीज के शव को घर पहुंचाने के लिए एंबुलेंस तक मुहैया करा पाने में लापरवाही और लाचारी जाहिर की।

इस समय पूरा विश्व कोरोना विषाणु को लेकर चिंतित है, तो दूसरी तरफ हमारी चिंता यह है कि भारत जैसे देश में इसका संक्रमण कैसे रोका जाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है भारत जैसे देश में संक्रामक रोगों को रोकने की कोई कारगर नीति नहीं बन पाई है। 1940 के बाद से संक्रामक रोगों से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। तब से अब तक कई तरह की बीमारियां सामने आई हैं। भविष्य में और नए-नए रोग आने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार संक्रामक रोगों के बढ़ने की बड़ी वजह मानवशास्त्रीय और जनसांख्यिकीय बदलाव हैं।

पिछले दिनों अमेरिका के “सेंटर फॉर डिजीज डाइनामिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी” (सीडीडीईपी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में लगभग छह लाख डॉक्टरों और बीस लाख नर्सों की कमी है। भारत में दस हजार एक सौ नवासी लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर की सिफारिश की है। इसी तरह चार सौ तिरासी लोगों पर एक नर्स है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में एंटीबायोटिक दवाइयां देने के लिए उचित तरीके से प्रशिक्षित स्टाफ की भी भारी कमी है, जिससे जीवन बचाने वाली दवाइयां मरीजों को नहीं मिल पाती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियां भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी। इस रिपोर्ट के अनुसार सन 2012 से 2030 के बीच इन बीमारियों के इलाज पर करीब 6.2 खरब डॉलर (41 लाख करोड़ रुपए से अधिक) खर्च होने का अनुमान है। इन बीमारियों के भारत और चीन के शहरी इलाकों में तेजी से फैलने का खतरा बताया गया है। रिपोर्ट कहती है कि असंक्रामक रोग शहरों में रहने वाली मानव आबादी के स्वास्थ्य के लिए ही खतरा नहीं हैं, बल्कि इसके चलते अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होने का अनुमान है। बढ़ता शहरीकरण और वहां पर काम और जीवनशैली की स्थितियां असंक्रामक रोगों के बढ़ने का मुख्य कारण है। सन 2014 से 2050 के बीच में भारत में चालीस करोड़ चालीस लाख आबादी शहरों का हिस्सा बनेगी। इसके चलते शहरों में अनियोजित विकास होने से स्थिति बदतर होगी।

हमारे देश में व्यवस्था की नाकामी और विभिन्नि वातावरणीय कारकों के कारण बीमारियों का प्रकोप ज्यादा होता है। भारत में डॉक्टरों की उपलब्धता की स्थिति वियतनाम और अल्जीरिया जैसे देशों से भी बदतर है। देश में इस समय लगभग साढ़े सात लाख सक्रिय डॉक्टर हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण गरीब लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने में देरी होती है। यह स्थिति अंतत: पूरे देश के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर गठित संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह माना है कि हमारे देश में आम लोगों को समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के अनेक कारण हैं। इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओं के ढांचे को और दुरुस्त बनाने की जरूरत है। दरअसल स्वास्थ्य सेवाओं के मुद्दे पर भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। जनसंख्या वृद्धि के कारण बीमार लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

गरीबी और गंदगी के कारण विभिन्न संक्रामक रोगों से पीड़ित लोग इलाज के लिए तरस रहे हैं। गौरतलब है कि चीन, ब्राजील और श्रीलंका जैसे देश भी स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमसे ज्यादा खर्च करते हैं। जबकि पिछले दो दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि दर चीन के बाद सबसे अधिक रही है। इसलिए पिछले दिनों योजना आयोग की एक विशेषज्ञ समिति ने भी यह सिफारिश की थी कि सार्वजनिक चिकित्सा सेवाओं के लिए आबंटन बढ़ाया जाए।

विडंबना यह है कि भारत में दूसरी सरकारी योजनाओं की तरह स्वास्थ्य योजनाएं भी लूट-खसोट की शिकार हैं। निजी अस्पताल शोषण का बड़ा जरिया बन गए हैं। डॉक्टरों द्वारा दवा कंपनियों से लेने वाली विभिन्न सुविधाओं को देखते हुए पिछले दिनों भारतीय चिकित्सा परिषद ने एक आचार संहिता के तहत डॉक्टरों को सजा की रूपरेखा तय की थी। यह कोई छिपी बात नहीं है कि दवा कंपनियां अपनी दवाइयां लिखवाने के लिए डॉक्टरों को महंगे-महंगे उपहार देती हैं। इसलिए डॉक्टर इन कंपनियों की दवाइयां बिकवाने की कोशिश करते हैं। हद तो तब हो जाती है जब कुछ डॉक्टर अनावश्यक दवाइयां लिख कर दवा कंपनियों को दिया वचन निभाते हैं। इस व्यवस्था में डॉक्टर के लिए दवा कंपनियों का हित रोगी के हित से ऊपर हो जाता है।

दलाली के युग में संवेदना के लिए कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि आज भी बड़ी संख्या में डॉक्टर गांवों की तरफ रुख नहीं करते हैं। दरअसल इस दौर में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का खमियाजा ज्यादातर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्ग आबादी को उठाना पड़ रहा है। इसी वजह से देश के अनेक राज्यों में जहां एक ओर बच्चे विभिन्न गंभीर बीमारियों के कारण काल के गाल में समा रहे हैं तो दूसरी ओर महिलाओं को भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। वृद्धों का हाल तो और भी दयनीय है। अनेक परिवारों में वृद्धों को मानसिक संबल नहीं मिल पाता है। साथ ही उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है।

ऐसी स्थिति में उन्हें जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं भी मुहैया न हों तो उनका जीवन नरक बन जाता है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं का चुस्त-दुरुस्त और ईमानदार होना न केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी जरूरी है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है। देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास हेतु बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने के लिए एक गंभीर पहल की जरूरत है। इस कोराना काल में कोरोना विषाणु से डरने की नहीं लड़ने की जरूरत नहीं है। अब समय आ गया है कि सरकार बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करने और संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए एक दीर्घकालिक नीति बनए।

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