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राजनीति: बाइडेन के साथ बदलेगी दुनिया

शीत युद्ध के दौरान अमेरिका पाकिस्तान को एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी देश मानता था और पाकिस्तान को अरबों डॉलर की आर्थिक और सामरिक मदद देता रहा था। लेकिन आज भारत-अमेरिकी संबंध सबसे बेहतर दौर में माने जा रहे हैं, अमेरिका में बसे लगभग बीस लाख भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक अमेरिका को आगे ले जाने में योगदान दे रहे हैं।

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्‍ट्रपति जाे बाइडेन लोगों को संबोधित करते हुए। फाइल फोटो।

ब्रह्मदीप अलूने

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ‘चिकन गेम’ मॉडल होता है। इसमें खिलाड़ी का उद्देश्य अपने हितों को अधिकतम करना होता है। वह इस बात की परवाह नही करता कि इससे दूसरे को कितना लाभ हो। महाशक्ति अमेरिका की नीतियों में यह मॉडल सदैव प्रतिबिंबित होता रहा है। अमेरिका ऐसा राष्ट्र है जहां नीतियां राजनीतिक पार्टियां या राष्ट्रपति तय नहीं करते, बल्कि तय वही होता है जो अमेरिकी हित में हो, चाहे सत्ता में कोई भी रहे।

डोनाल्ड ट्रंप को शिकस्त देने के साथ ही जो बाइडेन की अगुवाई में अमेरिका को आगे का सफर तय करना है। इससे वैश्विक स्तर पर पड़ने वाले असर को लेकर संभावनाओं और आशंकाओं का भी अनुमान लगाया जा रहा है। ट्रंप को अन्य अमेरिकी राष्ट्रपतियों के मुकाबले अपेक्षाकृत असंतुलित और अनियंत्रित माना गया, लेकिन इन सबके बाद भी अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को लेकर वे अग्रगामी नीति अपनाते रहे। जो बाइडेन के लिए आंतरिक और बाष्टय चुनौतियां सामने हैं और उनकी नीतियों पर परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक ट्रूमैन, बिल क्लिंटन और बराक ओबामा का असर दिख सकता है।

लेकिन इसके साथ ही यह याद रखना भी जरूरी है कि सामरिक नीति, आर्थिक नीति, अप्रवासन कानून, वित्तीय मामले और विदेश नीति में अमेरिका के लिए उसके राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं। अमेरिका में किसी भी पार्टी की सत्ता रहे, वे उसी रास्ते पर चलते हैं जिससे अमेरिका की सुरक्षा हो और उसकी प्रगति सुनिश्चित रहे।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डेमोक्रेटिक पार्टी के ट्रूमैन बने थे और उनकी नीतियों का प्रभाव इसके बाद लगातार अमेरिकी विदेश नीति पर दिखता रहा है। ट्रूमैन का साफ मत था की साम्यवादी प्रसार को रोका जाना चाहिए। रूस को लेकर उनकी यह स्पष्ट सोच रही कि मास्को शांति की नीति को दुर्बलता समझता है, अत: उसके खिलाफ सख्ती की नीति ही अपनाई जानी चाहिए।

अब जो बाइडेन रूस को लेकर मुखर हो सकते हैं और चीन भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। पिछले कुछ वर्षों में चीन और रूस के संबंध मजबूत हुए हैं और एक दूसरे पर निर्भरता भी बढ़ी है। आने वाले समय में रूस के आसपास के देशों में नाटो का प्रभाव अमेरिका बढ़ा सकता है और यह चीन को मंजूर नहीं होगा। ट्रंप व्यापार को लेकर उत्सुक रहते थे, वहीं बाइडेन की प्राथमिकताओं में सामरिक सहयोग हो सकता है और अमेरिका की यह नीति भारत के लिए मुफीद हो सकती है।

बाइडेन के पहले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा की एशिया-प्रशांत केंद्रित नीति के केंद्र में भारत रहा है, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले समय में भी चीन और पाकिस्तान की तुलना में अमेरिका भारत को तरजीह देता रहे। सामरिक और रणनीतिक रूप से क्वाड को लेकर भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया के साथ अमेरिकी सहयोग जारी रहेगा। डेमोक्रेट मानवाधिकारों जैसे मुद्दों पर मुखर रहे हैं।

बाइडेन वीगर मुसलमानों की स्थिति को लेकर चीन की आलोचना कर सकते हैं। ऐसा वे पहले भी करते आए हैं। ऐसे में भविष्य में अमेरिका-चीन संबंध सामान्य रह पाना आसान नहीं है। इसका असर कोरिया प्रायद्वीप पर भी पड़ सकता है। उत्तर कोरिया चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। चीन उत्तर कोरिया को न केवल रोजमर्रा की जरूरतों का सामान मुहैया कराता है, बल्कि उसे परमाणु र्इंधन और हथियार बनाने के लिए धन, साधन और तकनीक भी देता है।

डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग की मुलाकातों से कुछ भी हासिल न हो सका, जबकि बाइडेन उत्तर कोरिया पर और भी कड़े प्रतिबंध लगा सकते हैं। अमेरिका के लिए बड़ा मसला दुनियाभर में फैले उसके सैन्य अड्डे भी हैं। इनकी संख्या कम करने को लेकर बिल क्लिंट्न ने तत्परता दिखाई थी।

बाइडेन की अफगान और पाकिस्तान नीति बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। ट्रंप ने अफगानिस्तान में शांति बहाली को लेकर पाकिस्तान पर भरोसा नहीं दिखाया और वे पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता रोकने के पक्षधर रहे। वैश्विक मामलों में बाइडेन की बेहतर समझ रही है। उन्हें 2008 में पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान हिलाल-ए-पाकिस्तान से नवाजा गया था।

बाइडेन को यह सम्मान पाकिस्तान को अमेरिका से डेढ़ अरब डॉलर की आर्थिक मदद दिलवाने में अहम भूमिका निभाने के कारण दिया गया था। ऐसे में इस संभावना से कैसे इंकार किया जा सकता है कि बाइडेन पाकिस्तान को लेकर थोड़ा नरम रुख अपनाएं और ऐसा होने पर तालिबान से बातचीत की राह खुल सकती है।

महाशक्तियों के हित और शक्ति संतुलन के बीच तेल संपदा का भी एक महत्त्वपूर्ण द्वंद्व है जो शह और मात के खेल को पश्चिम एशिया तक खींच लाता है। मध्य पूर्व में अपने हितों को लेकर अमेरिका हमेशा से सतर्क रहा है। बराक ओबामा ने 2015 में ईरान से परमाणु समझौता किया था, जिसके तहत 2016 में अमेरिका और अन्य पांच देशों से ईरान को तेल बेचने और उसके केंद्रीय बैंक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार की अनुमति मिली थी।

ओबामा के इस समझौते को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की कोशिशों के तौर पर देखा गया था। बाद में डोनाल्ड ने इस समझौते को बेकार बता कर इससे अपने को अलग कर लिया और इस इलाके में शांति की कोशिशों को भी धराशायी कर दिया था। ईरान को दबाने की ट्रंप प्रशासन की कोशिशें दूसरे देशों को बिल्कुल रास नहीं आ आई थीं।

परमाणु कार्यक्रमों पर नजर रखने वाली संस्था इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अनुसार ईरान 2015 के समझौते का पालन कर रहा था, ऐसे में ट्रंप के ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप पूरी तरह निराधार था। यूरोपीय संघ और ट्रंप के बीच व्यापारिक मतभेद जगजाहिर रहे। ट्रंप की आर्थिक नीतियों से यूरोप के देश नाराज रहे। ऐसे में अब बाइडेन ईरान से संतुलित रिश्तों की पुन: बहाली कर सकते हैं।

बीते कुछ समय में ईरान और चीन के बीच सहयोग बढ़ा है, जबकि ईरान को साम्यवाद से दूर रखने की अमेरिका की पुरानी नीति रही है। बाइडेन को न केवल ईरान का विश्वास जीतना होगा, बल्कि यह कोशिश भी करनी होगी कि मध्य पूर्व में रूस और चीन के प्रभाव को संतुलित किया जाए।

अपने चुनाव प्रचार के दौरान बाइडेन ने मुसलमानों के साथ बेहतर बर्ताव और ट्रंप प्रशासन की प्रवासी विरोधी नीतियों पर दोबारा विचार करने का वादा किया था। लेकिन यूरोप में पिछले दो दशकों में यह देखा गया है कि अमेरिका भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता। लेकिन सीएए, अनुच्छेद 370 जैसे मसलों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों और खासतौर पर कमला हैरिस ने काफी आपत्ति जताई थी।

हालांकि इसका प्रभाव भारत अमेरिकी संबंधों को प्रभावित करेगा, इसकी संभावना कम ही है। साल 2000 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने इक्कीसवीं शताब्दी के लिए भारत अमेरिकी संबंधों पर एक संयुक्त दस्तावेज जारी किया था, जिसमें आने वाले समय में भारत अमेरिकी संबंधों को एक नई दिशा मिलने के संकेत दिए गए थे।

इसे शीत युद्ध के समय की अमेरिकी नीति से अलग नई शुरूआत माना गया था। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका पाकिस्तान को एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी देश मानता था और पाकिस्तान को अरबों डॉलर की आर्थिक और सामरिक मदद देता रहा था। लेकिन आज भारत-अमेरिकी संबंध सबसे बेहतर दौर में माने जा रहे हैं, अमेरिका में बसे लगभग बीस लाख भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक अमेरिका को आगे ले जाने में योगदान दे रहे हैं।

दबाव समूह के रूप में काकस आॅन इंडिया एंड इंडियन अमेरिकंस निचले सदन का सबसे बड़ा दबाव समूह है। ऐसे में आशा यह की जाती है कि अमेरिकी कूटनीति संतुलन की कूटनीति से ऊपर उठ कर अपने दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन जारी रखेगी और बाइडेन के काल में भी भारत अमेरिका संबंध मजबूत बने रहेंगे।

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