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यमन पर अमेरिका का दांव

अमेरिका को लग रहा है कि हूथी विद्रोहियों से बेहतर संबंध उसके लिए सामरिक और आर्थिक रूप से ज्यादा मददगार हो सकते हैं। हूथी विद्रोहियों की सैन्य ताकत को कम करके नहीं आंका जा सकता। इसमें यमन की सेना के बेहद प्रशिक्षित और हथियार चलाने में दक्ष सैनिक शामिल हैं।

Author Updated: February 23, 2021 4:43 AM
Yamanसांकेतिक फोटो।

ब्रह्मदीप अलूने

अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान अरब देशों के साथ किए गए अरबों डॉलर के सैन्य समझौतों की समीक्षा करने की बात कह कर यमन युद्ध में सऊदी अरब के लिए अमेरिकी सहयोग रोकने की घोषणा की है। बाइडेन की यह नई यमन नीति अमेरिका के पारंपरिक साझेदार सऊदी अरब के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है, वहीं वैश्विक राजनीति में भी इसके गहरे निहितार्थ देखे जा सकते हैं। यमन दक्षिण पश्चिम एशिया का एक ऐसा देश है जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम है और पिछले एक दशक से राजनीतिक अस्थिरता व जातीय संघर्ष से जूझ रहा है।

यहां युद्ध के मैदान में शिया और सुन्नी एक दूसरे के सामने हैं। पिछले पांच छह साल से सऊदी अरब के नेतृत्व वाला गठबंधन हूथी विद्रोहियों पर हमले कर रहा है। इस गठबंधन में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे राष्ट्र शामिल हैं और अब अमेरिका ने यमन समस्या के सैनिक समाधान के बजाय कूटनीतिक प्रयास तेज करने का इरादा जताया है।

यमन के बड़े हिस्से पर हूथियों का कब्जा है और इनकी राजनीतिक विचारधारा शाही शासन के खिलाफ है। यमन के विभिन्न जातीय समूहों पर सऊदी अरब और ईरान का बड़ा प्रभाव है और इन राष्ट्रों के हितों का खमियाजा यमन को भोगना पड़ रहा है। यह देश गृहयुद्ध के बाद से बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है, लाखों लोग मारे जा चुके हैं और लाखों नागरिक विस्थापित होकर दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर हैं।

आम नागरिक सैन्य समूहों का निशाना बन रहे है। सऊदी अरब समर्थित राष्ट्रपति मंसूर हादी की नीतियों से नाराज होकर शिया समर्थक हूथी विद्रोहियों ने जो संघर्ष शुरू किया था, उसके बाद हादी को देश छोड़ कर भागने को मजबूर होना पड़ा था और इस समय हूथी विद्रोहियों का देश के अधिकतर हिस्सों पर नियंत्रण है। इन सबके बीच सऊदी अरब की आक्रामक नीति से यमन के हालात बेहद बिगड़ गए हैं। यमन के प्रधानमंत्री मइन अब्दुलमलिक सईद जो सऊदी अरब समर्थक हैं, इस वक्त हूथी विद्रोहियों के निशाने पर हैं।

यमन की आंतरिक राजनीति भी जटिलताओं से भरी रही है। शिया यहां बड़ा जातीय समूह है, जबकि सत्ता पर सुन्नी समर्थकों का कब्जा रहा है। शिया समर्थक हूथी शाही शासन के खिलाफ हैं और उन्हें ईरान का समर्थन हासिल है। शिया-सुन्नी संघर्ष के कारण ही यमन युद्ध का मैदान बन गया है। ट्रंप प्रशासन ईरान के खिलाफ सख्त नीति अपनाएं हुए था, वहीं बाइडेन इस मामले में ओबामा के ज्यादा करीब नजर आते हैं। ओबामा काल में उपराष्ट्रपति रहे बाइडेन ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के पारित होने में भी अहम भूमिका निभाई थी।

यह एक ऐसा अनूठा समझौता माना जाता है जिसके बाद अप्रत्याशित रूप से भारत अपने सामरिक मित्र रूस से दूर होकर अमेरिका का रणनीतिक साझेदार बन गया। यमन को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन की नीति से न केवल ईरान-अमेरिका संबंधों में गरमाहट आ सकती है, बल्कि कई क्षेत्रों पर इसका असर पड़ सकता है। अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में इस समय सबसे बड़ी चुनौती रूस और चीन की है और वे अमेरिका-ईरान विवाद का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। यह देखा गया है कि अमेरिका और ईरान के संबंधों में तल्खी का फायदा रूस और चीन को मिल रहा है और यह दोनों देश सामरिक रूप से अरब इलाके में लगातार मजबूत हो रहे हैं।

ईरान ने चीन और रूस के साथ सामरिक और आर्थिक भागीदारी लगातार बढाई है। वैश्विक प्रतिबंधों के बीच भी ईरान को इन दोनों देशों का भरपूर समर्थन और मदद मिलती रही है। ईरान को लगता है कि वह पश्चिम के नुकसान को चीनी निवेश और उसे तेल बेच कर भरपाई कर लेगा। 2015 में जब ईरान के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे तो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संबंधों के दायरे को और बढ़ाने पर सहमति बनाई थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच कथित रूप से लायन-ड्रैगन डील भी हुई, जिसे अमेरिकी वर्चस्ववाद को रोकने की बड़ी कोशिश के रूप देखा गया और इस करार के अनुसार ढाई दशकों में ऊर्जा, सुरक्षा और आर्थिक मामलों में चीन और ईरान के बीच बड़ा सहयोग बढ़ने की संभावना बताई गई है।

इसी प्रकार ईरान और रूस के बीच भी संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ईरान के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक डॉ मोहसिन फखरीजादेह और अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए ईरानी सेना के जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या की निंदा कर रूस और ईरान के बीच मजबूत संबंधों को मील का पत्थर बताया था। रूस और ईरान के बीच भौगोलिक रूप से भी रिश्तों को मजबूत करने वाले तत्व मौजूद हैं। मास्को को कैस्पियन सागर, काला सागर, बाल्टिक सागर, श्वेत सागर और लाडोगा झील जैसे पांच सागरों का पत्तन कहा जाता है।

इन सागरों से लगते देशों के साथ रूस के संबंधों और उसके प्रभाव से रूस के वैश्विक प्रभुत्व का पता चलता है। इन क्षेत्रों के अधिकांश इस्लामिक देशों से रूस के मजबूत संबंध है। अमेरिका की आंख में चुभने वाला ईरान कैस्पियन सागर के तट पर है, जो रूस का सामरिक मित्र है। अमेरिकी द्वारा ईरान पर बनाए जा रहे दबाव को खारिज करते हुए पुतिन ने ईरान के साथ रणनीतिक संबंधों को मजबूती दी है। इसके साथ ही रूस ने ईरान और चीन के साथ हिंद महासागर और ओमान की खाड़ी में संयुक्त सैन्य अभ्यास कर अमेरिकी नीतियों को चुनौती देने से भी गुरेज नहीं किया। इस समय रूस ईरान को सबसे ज्यादा हथियार देने वाला देश भी है।

अब बाइडेन यमन में शांति स्थापित करने के लिए हूथी विद्रोहियों पर हमले रोक कर ईरान को नियंत्रित और संतुलित करने की ओर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। यमन लाल सागर और हिंद महासागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले जलडमरू मध्य पर स्थित है और यहां से दुनिया का दो तिहाई तेल गुजरता है। एशिया से यूरोप और अमेरिका जाने वाले जहाज भी यहीं जाते हैं। इसलिए समुदी व्यापार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण इस इलाके पर महाशक्तियों की गहरी नजर और व्यापारिक हित रहे हैं।

अमेरिका को लग रहा है कि हूती विद्रोहियों से बेहतर संबंध उसके लिए सामरिक और आर्थिक रूप से ज्यादा मददगार हो सकते है। हूथी विद्रोहियों की सैन्य ताकत को कम करके नहीं आंका जा सकता। इसमें यमन की सेना के बेहद प्रशिक्षित और हथियार चलाने में दक्ष सैनिक शामिल हैं। माना जाता है की हूथी विद्रोहियों के पास करीब दो लाख जवानों वाली सेना है। ये जवान टैंक, मिसाइल से लेकर हर तरह के हथियार चलाने में सक्षम हैं। इसीलिए प्रमुख आबादी वाले शहरों सहित यमन के लगभग एक तिहाई क्षेत्र पर इनका कब्जा है।

सऊदी अरब को लेकर जो बाइडेन के अविश्वास का कारण सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की व्यापारिक नीतियां भी हैं, जो उन्हें रूस के करीब बताती रही हैं। 2018 में हुए जी-20 सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने जिस प्रकार की गर्मजोशी दिखाई थी, उसने सबको अचरज में डाल दिया था।

इसीलिए अब बाइडेन प्रशासन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से ज्यादा किंग सलमान को तरजीह दे रहा है और अमेरिका ने इसकी बाकायदा घोषणा भी कर दी है। जाहिर है जो बाइडेन यमन में शांति बहाल करके अरब क्षेत्र में अपने प्रभाव को मजबूत करके सऊदी अरब पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहते है, वहीं ईरान को लेकर उनकी नीति में संतुलन दिखने लगा है। यमन को लेकर अमेरिका की इस नीति से मध्य पूर्व में शांति की स्थापना की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

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