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राजनीतिः नई पीढ़ी को आपातकाल के बारे में बताना जरूरी है

इमरजेंसी ऐसी ही एक घटना है जिससे न सिर्फ सबक लिया जाए बल्कि आने वाली पीढ़ी को आगाह किया जाए कि सत्ता का मद कितना ही ज्यादा क्यों न हो, कभी जनता की आवाज को दबा नहीं सकता। हालांकि इन चार दशकों में गंगा में न जाने कितना पानी बह गया होगा लेकिन उन दुश्वारियों का दर्द आज भी हमारी पीढ़ी के लोगों के जेहन में जिंदा है।

Author June 26, 2018 4:46 AM
आज भी आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस पार्टी संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास नहीं रखती और उनको अपमानित करने में लगी हुई है

विजय गोयल

हाल ही में पुरानी फाइलों को छांटते वक्त आपातकाल के दौरान किया गया पत्राचार और साहित्य जब आंखों के सामने से गुजरा तो आपातकाल की यादें न सिर्फ ताजा हो गर्इं बल्कि वे जख्म भी ताजा हो गए जो तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने देश के लोकतंत्र को दिए थे। चालीस साल कोई छोटा समय नहीं होता है, इतने में करीब पूरी की पूरी पीढ़ी ही बदल जाती है। लेकिन यह बहुत जरूरी है कि इतिहास की घटनाओं को न सिर्फ जेहन में ताजा रखा जाए बल्कि उन्हें सबक के तौर पर भी लिया जाए। खासतौर से नई पीढ़ी को आपातकाल के बारे में बताना बहुत जरूरी है ताकि वह समझ सके कि किस तरह से आपातकाल लगा था, मानवाधिकार छीन लिये गए थे, जिनकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते।

मुझे आज भी 25 जून 1975… की वो रात याद है जब मेरे पिता श्री चरती लाल गोयल को अन्य बड़े-बड़े नेताओं के साथ पहले ही दिन गिरफ्तार कर लिया गया। क्योंकि देश में जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन चल रहा था इसलिए यह गिरफ्तारी बड़ी ही सामान्य लगी। परिवार को उम्मीद थी कि पिताजी जल्दी ही वापस आ जाएंगे। अगले दिन कोई अखबार छपा ही नहीं। हमें ही नहीं, बल्कि दुनिया को भी बीबीसी के माध्यम से पता चला कि भारत में इमरजेंसी लग गई है। तब इमरजेंसी (आपातकाल) क्या और कितनी भयानक होगी यह किसी को नहीं पता था।

मैं उन दिनों श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स का छात्र था। तब दिल्ली छात्रसंघ के अध्यक्ष हमारे आज के कैबिनेट के सहयोगी और वित्तमंत्री अरुण जेटली थे। विद्यार्थी परिषद ने यह तय किया कि आपातकाल और सरकारी ज्यादतियों के खिलाफ परिसर में जुलूस निकालेंगे। आपातकाल के विरोध में हुआ वह पहला प्रदर्शन था। अरुण जेटली को तुरंत ही गिरफ्तार कर लिया गया। हम और रजत इमरजेंसी का विरोध करने के लिए भूमिगत गतिविधियों में सक्रिय हो गए। कुछ दिनों का इंतजार कैसे कुछ हफ्तों में और फिर महीनों में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। आपातकाल लगने के आठ दिन बाद आरएसएस समेत देश-भर के छब्बीस संगठनों पर प्रतिबंध थोप दिया गया और शुरू हो गया देश के लोकतंत्र को हर तरह से रौंदने का सिलसिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी अपने कथित पांच और इक्कीस सूत्री कार्यक्रम को जबरदस्ती लागू करवाने में जुट गए।

उस समय कांग्रेस-विरोधी जो नेता इक्कीस सूत्री कार्यक्रम का समर्थन कर देते थे वे जेल जाने से बच जाते थे। यदि कुछ उदाहरणों को छोड़ दें तो देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस, सभी सरकार के आगे नतमस्तक हो गए। लेकिन विरोध की ज्वाला धीरे-धीरे जनांदोलन में तब्दील हो गई। इधर दिल्ली पुलिस तमाम कोशिशों के बावजूद मुझे और मेरे साथियों को गिरफ्तार नहीं कर पाई, तब मैंने साथियों के साथ गिरफ्तारी देने का निर्णय लिया और दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय के कॉफीहाउस की छत पर काफी विषम परिस्थितियों में सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी। पिताजी जेल में थे, पर उसके बाद भी मुझे घरवालों का पूरा समर्थन प्राप्त था। तब आरएसएस और विद्यार्थी परिषद की योजना से सत्याग्रहों का सिलसिला शुरू हुआ और बड़ी संख्या में नौजवानों ने सत्याग्रह कर गिरफ्तारियां देनी शुरू कीं। हमारे अंदर 1947 से पहले के स्वतंत्रता आंदोलन जैसा जज्बा था।

इमरजेंसी ऐसी ही एक घटना है जिससे न सिर्फ सबक लिया जाए बल्कि आने वाली पीढ़ी को आगाह किया जाए कि सत्ता का मद कितना ही ज्यादा क्यों न हो, कभी जनता की आवाज को दबा नहीं सकता। हालांकि इन चार दशकों में गंगा में न जाने कितना पानी बह गया होगा लेकिन उन दुश्वारियों का दर्द आज भी हमारी पीढ़ी के लोगों के जेहन में जिंदा है। शायद व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्त्व उस तानाशाही के कठिन दुश्चक्र के बाद ही समझ आया। हम तमाम लोग जो इस लड़ाई में साथ लड़े, भले ही विचारधारा के स्तर पर हम लोगों में कई विरोधाभास थे, लेकिन एक चीज जो हमें जोड़ती थी वह थी देश के संविधान की रक्षा और जनता की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सम्मान का जज्बा, जिसे कुचलने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगा रही थी।

यह सच है कि अब देश में वे हालात कभी नहीं आएंगे, लेकिन आज भी एक सवाल बार-बार जेहन में कौंध रहा है कि देश के लोकतंत्र पर इमरजेंसी जैसा भयानक प्रहार करने वाली कांग्रेस क्या आज तक अपने उस दुष्कृत्य के लिए शर्मिंदा हुई? जिन हालात में तत्कालीन कांग्रेस नेताओं ने देश पर इमरजेंसी थोपी, क्या कांग्रेस की नई पीढ़ी वैसे हालात से बचने की कोशिश कर रही है? जिस तरह से तत्कालीन कांग्रेस नेताओं ने देश के संविधान की हत्या की थी और तमाम विपक्ष ने एकजुट होकर उसे बचाने का संघर्ष किया था, क्या कांग्रेस की नई पीढ़ी उस संघर्ष का सम्मान करने को तैयार है? यह सवाल जेहन में इसलिए भी कौंधा क्योंकि वर्तमान हालात में ऐसा लगता नहीं कि कांग्रेस की वर्तमान पीढ़ी ने इमरजेंसी के अपने काले इतिहास से कोई सबक लिया है।

कांग्रेस पार्टी के नेता अपने व्यक्तिगत हित के लिए कभी भी किसी भी तरह के लोकतंत्र की हत्या करने से नहीं चूके। यहां बात देश के लोकतंत्र की ही नहीं हो रही बल्कि कांग्रेस पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की भी हो रही है। मुझे याद है कि उस वक्त भी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के वही हालात थे जो आज हैं। उस वक्त भी मां-बेटे की आवाज के आगे हर आवाज बौनी थी आज भी मां-बेटे की आवाज के आगे हर आवाज दबी हुई है। हाल में अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के वक्त अपने आंतरिक लोकतंत्र के साथ जैसा मजाक कांग्रेस ने किया, वैसे निम्नस्तरीय उदाहरण भारतीय राजनीति के इतिहास में बेहद कम होंगे। आपातकाल के चार दशक बीत जाने के बाद भी कांग्रेस उस मानसिकता से उबर नहीं पाई है। बेहद छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए संविधान और संवैधानिक संस्थाओं के अपमान और उनको अस्वीकार करने की प्रवृत्ति कांग्रेस में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि एक समय पूरे देश पर राज करने वाली कांग्रेस एक पार्टी के तौर पर खत्म होने के कगार पर है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि जिन मुद्दों को लेकर हमने उस दौर में सत्ता और सत्ताधारी कांग्रेस के साथ संघर्ष किया था, कांग्रेस की उस शैली में आज भी कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलता है।

हालांकि यह तुलना अतार्किक लग सकती है, फिर भी यदि आधी सदी के कांग्रेस राज और मोदी सरकार के राज की तुलना की जाए तो यह साफ होता है कि भाजपा गरीबी हटाओ जैसे चुनावी नारे देने के बजाय गरीबी को जड़ से मिटाने में यकीन करती है। पिछले चार सालों में मोदी सरकार की योजनाओं के तहत बुनियादी ढांचे का जिस तरह से विकास किया गया है वह गांधीजी के ‘अंतिम व्यक्ति’ के कल्याण के सिद्धांत के अनुरूप है। यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि भाजपा के डीएनए में संविधान और उसकी संस्थाओं के प्रति अटूट विश्वास है। यही वजह है कि इन चार सालों में ‘सबका साथ सबका विकास’ जैसे उद्देश्य को पूरा करने के लिए मोदी सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। आपातकाल की 43वीं वर्षगांठ पर भाजपा देश के सभी लोकतांत्रिक दलों और जनता का आह्वान करती है कि वे हमेशा कांग्रेस जैसी तानाशाही प्रवृत्ति वाली पार्टियों से सतर्क रहें। विशेषकर युवा पीढ़ी, जिसने आपातकाल को देखा और भुगता नहीं, उस पीढ़ी को आपातकाल के बारे में खासतौर पर बताया जाए ताकि लोकतंत्र पर काले बादल न मंडराएं।

आज भी आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस पार्टी संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास नहीं रखती और उनको अपमानित करने में लगी हुई है चाहे वह न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग हो या फिर संसद हो। आपातकाल को काले दिवस के रूप में मनाना इसलिए भी जरूरी है कि लोकतंत्र पर जो यह काला धब्बा है यह दोबारा न लग पाए और कोई भी पार्टी या शासक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र पर दोबारा कुठाराघात न कर सके। मेरे पिताजी आज नहीं हैं, पर उन आपातकाल के दिनों की याद करके आंखें आज भी नम हो जाती हैं कि कैसे हम पिता-पुत्र जेल में थे और हमारे पांच भाई-बहन का परिवार चट्टान की तरह हमारे पीछे खड़ा हुआ था। आए दिन हमें जो मुसीबतें झेलनी पड़ती थीं उनका सामना हम मजबूती से करते थे। यह केवल मेरे परिवार की कहानी नहीं है, पूरे देश में जो एक लाख चालीस हजार लोग गिरफ्तार कर जेल में डाल दिए गए थे यह उन सबके परिवारों की कहानी है। राजनीति कई बार कितना घिनौना रूप ले लेगी इस पर सहज विश्वास नहीं होता। आशा है, आपातकाल की उन कड़वी यादों से सीख कर हम सकारात्मक सोच की तरफ बढ़ेंगे।

(लेखक संसदीय कार्य राज्यमंत्री हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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