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राजनीतिः विदेशी मुद्रा कोष की नई चिंताएं

पिछले वित्त वर्ष में व्यापार घाटा चार साल में सबसे ज्यादा रहा। देश और दुनिया के आर्थिक और वित्तीय संगठनों की रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण इन दिनों रुपए के मूल्य में लगातार गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बन गई है। यही वह प्रमुख कारण है जिससे पिछले महीने रुपया अब तक के सबसे निम्न स्तर पर पहुंच गया था।

Author August 14, 2018 4:23 AM
भारत के विदेशी मुद्रा कोष में लगातार गिरावट आ रही है। इसका प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों से भारत के चालू खाते के घाटे (सीएडी) में वृद्धि होना है। यह बात अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने अपनी रिपोर्ट में कही है।

जयंतीलाल भंडारी

भारत के विदेशी मुद्रा कोष में लगातार गिरावट आ रही है। इसका प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों से भारत के चालू खाते के घाटे (सीएडी) में वृद्धि होना है। यह बात अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने अपनी रिपोर्ट में कही है। वर्ष 2017-18 में देश का चालू खाते का घाटा बढ़ कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 1.9 फीसद हो गया है, जो पिछले वर्ष 0.7 फीसद रहा था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कच्चे तेल की कीमतों के कारण चालू खाते का घाटा वर्ष 2018-19 में और बढ़ सकता है। इसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा कोष पर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में विदेशी संस्थागत निवेशकों के निवेश जोखिमपूर्ण होंगे। भारत को कारोबार संबंधी सुधार लागू करके प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) लाने की जरूरत है। इसी प्रकार एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स की इस साल की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक व्यापार संबंधी मुद्दों, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों की वजह से भारत से पूंजी बाहर जाने का जोखिम पूर्ण परिदृश्य बन गया है। इसका असर यह हुआ है कि देश के आयात बिल तेजी से बढ़ने, निर्यात बिलों की रफ्तार धीमी पड़ने और विदेशी निवेशकों द्वारा नए निवेश की कमी के कारण देश में डॉलर की आवक कम हो गई। तीन अगस्त को विदेशी मुद्रा कोष का स्तर 404 अरब डॉलर से भी कम रह गया, जो एक महीने पहले 413 अरब डॉलर के स्तर पर था।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि अमेरिका और चीन के व्यापार युद्ध की शुरुआत से चीनी मुद्रा युआन सहित दुनिया के उभरते हुए देशों की मुद्राओं की कीमत भी डॉलर के मुकाबले घट गई है। चूंकि डॉलर में निवेश दुनिया में सबसे सुरक्षित निवेश माना जा रहा है, इसलिए दुनिया के निवेशक बड़े पैमाने पर डॉलर की खरीद कर रहे हैं। अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक व्यापार युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन दिनों पैदा हो रही आर्थिक चिंताओं से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में जोखिम लेने से बच रहे हैं और वे अब अधिक सुरक्षित अमेरिकी डॉलर और बांड में निवेश कर रहे हैं। अमेरिकी डॉलर में लगातार आ रही मजबूती और अमेरिका में दस साल के सरकारी बांड पर प्राप्ति (यील्ड) तीन फीसद की ऊंचाई पर पहुंच गई है। ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआइ) भारत सहित तेजी से उभरते बाजारों में नया निवेश नहीं कर रहे हैं और वर्तमान निवेश को तेजी से निकाल रहे हैं। इस वर्ष जनवरी से जून तक विदेशी निवेशकों ने भारत से करीब सात अरब डॉलर की निकासी की है। उल्लेखनीय है कि जून में प्रकाशित एमएससीआइ सूचकांक के अनुसार वैश्विक कोषों का भारत के प्रति आकर्षण साल 2013 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। साल 2015 तक भारत विदेशी निवेशकों की आंख का तारा था और तब उभरते बाजारों में होने वाले प्रत्येक सौ डॉलर निवेश में से सोलह डॉलर भारत को मिले। लेकिन अब यह निवेश गिर कर मात्र साढ़े नौ डॉलर रह गया है। ऐसे हालात से भारतीय वित्तीय बाजार की सेहत बिगड़ गई है। साथ ही, भारतीय बाजार से विदेशी पूंजी बाहर जाने की चिंताएं खड़ी हो गई हैं।

एक ओर जहां विदेशी निवेश भारत से बाहर जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते विदेश व्यापार घाटे के कारण डॉलर की मांग भी लगातार बढ़ी है। पिछले वित्त वर्ष (2017-18) में देश ने निर्यात के तीन सौ अरब डॉलर के लक्ष्य स्तर को छू लिया। लेकिन निर्यात की तुलना में आयात डेढ़ गुना बढ़ा, परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2017-18 के लिए व्यापार घाटा बढ़ कर 156.83 अरब डॉलर हो गया, जो वित्त वर्ष 2016-17 में 108.50 अरब डॉलर था। पिछले वित्त वर्ष में व्यापार घाटा चार साल में सबसे ज्यादा रहा। देश और दुनिया के आर्थिक और वित्तीय संगठनों की रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण इन दिनों रुपए के मूल्य में लगातार गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बन गई है। यही वह प्रमुख कारण है जिससे पिछले महीने रुपया अब तक के सबसे निम्न स्तर पर पहुंच गया था। निकट भविष्य में भी तेल की कीमत में कोई बड़ी गिरावट नहीं होगी।

अमेरिका ने भारत, चीन सहित सभी देशों को ईरान से कच्चे तेल का आयात चार नवंबर तक बंद कर देने को कहा है। इसके बाद भी वहां से तेल मंगाने वाले वाले देशों के खिलाफ अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। भारत में इराक और सऊदी अरब के बाद सबसे ज्यादा कच्चा तेल ईरान से मंगाया जाता है। ईरान यूरोपीय बैंकों के माध्यम से यूरो में भुगतान स्वीकार करता है। डॉलर की तुलना में यूरो में भुगतान भारत के लिए लाभप्रद है। ईरान से कच्चे तेल का आयात सस्ते परिवहन के कारण भी भारत के लिए फायदेमंद है। ऐसे में भारत द्वारा ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद किए जाने से कच्चे तेल खरीद संबंधी नई चिंताएं सामने होंगी।

दुनिया के अन्य उभरते हुए देशों की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी कम जोखिम वाली है। भारत के लिए अच्छा आधार यह है कि भारत की डॉलर पर कर्ज निर्भरता कम है। इसलिए डॉलर की मजबूती का अन्य देशों की तुलना में भारत पर असर कम है। साथ ही, आर्थिक मामलों में भारत की जो रेटिंग सुधरी है, उससे भी अर्थव्यवस्था की मुश्किलें कम हुई हैं और निर्यात बढ़ने की संभावनाएं बनी हैं। इन सकारात्मक तथ्यों के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी घटक सशक्त हैं। इसी कारण उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में दिखाई दे रहे आर्थिक दुष्प्रभावों की तुलना में भारत मामूली रूप से ही प्रभावित दिखता है। जबकि तुर्की और ब्राजील जैसे कई देश आज आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़े हैं, जिसके लिए अमेरिका में आर्थिक वृद्धि की बहाली होने से पूंजी की तीव्र निकासी और मौद्रिक नीति को कड़ा करने के फेडरल रिजर्व के कदमों को जिम्मेदार माना जा रहा है।

विदेशी निवेशकों को भारत की ओर लुभाने और डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत संभालने के लिए जरूरी है कि सरकार आयात नियंत्रित करने और निर्यात बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़े। हाल ही में भारतीय निर्यातक संगठनों के महासंघ (एफआइईओ) ने कहा है कि सरकार द्वारा निर्यातकों को दी जा रही रियायतें वैश्विक निर्यात की बढ़ती चुनौतियों का सामना करने के मद्देनजर कम हैं। वैश्विक संरक्षणवाद की नई चुनौतियों के बीच सरकार को निर्यात प्रोत्साहन के लिए और अधिक कारगर कदम उठाने होंगे। तेल कीमतों पर नियंत्रण और सस्ते कच्चे तेल के मोल-भाव के लिए भारत को चीन के साथ-साथ दक्षिण कोरिया और जापान का गठजोड़ बनाने के रास्ते पर बढ़ना होगा। अर्थ विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों को लेकर ऐसा गठजोड़ तेल उत्पादक देशों से मोल-भाव करके तेल की कीमत कुछ कम कराने में अवश्य सफल होगा।

अर्थ विशेषज्ञों का मत है कि निकट भविष्य में डॉलर की तुलना में रुपया 72 के स्तर को पार कर सकता है। रुपए की कीमत में और किसी बड़ी गिरावट से बचने के लिए हाल ही में प्रकाशित बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच की रिपोर्ट पर ध्यान दिया जाना होगा। इसमें कहा गया है कि भारत में तेजी से बढ़ रही विकास दर के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए और रुपए की कीमत और विदेशी मुद्रा कोष का उपयुक्त स्तर बनाए रखने के लिए आरबीआइ को प्रवासी भारतीय बांड जारी करके 30 से 35 अरब डॉलर जुटाने चाहिए। निश्चित रूप से ऐसे प्रभावी कदमों से डॉलर के मुकाबले रुपए की घटती हुई कीमत पर रोक लगाई जा सकेगी, विदेशी मुद्रा भंडार का उपयुक्त स्तर बनाए रखा जा सकेगा और भारत से पूंजी बाहर जाने पर रोक लग सकेगी।

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