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राजनीतिः छोटे सिक्के, बड़ा बवाल

सरकार और रिजर्व बैंक को नए सिक्के बाजार में उतारने से पहले कुछ सवाल खुद से भी पूछने चाहिए। सवाल एक, दो, तीन, पांच, दस, बीस, पच्चीस पैसे के सिक्कों का नहीं है। ये सिक्के इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से ही हमारी अर्थव्यवस्था से ओझल हो चुके हैं। लेकिन पच्चीस और पचास पैसे के सिक्कों का क्या हुआ? इन्हें तो आज तक सरकार या आरबीआइ ने बंद नहीं किया है।

अभिषेक कुमार सिंह

किसी देश को डावांडोल करने का एक तरीका उसे आर्थिक रूप से दिवालिया करना भी होता है। जाली मुद्रा के कारोबार के जरिए यह तरीका सदियों से आजमाया जाता रहा है। दुश्मन पड़ोसी देशों से घिरे हमारे देश को इस समस्या (नकली मुद्रा) से लगातार जूझना पड़ रहा है। पर समस्या तब और बढ़ जाती है जब घरेलू मोर्चे पर ही अर्थव्यवस्था में कोई फांस पैदा कर दी जाए, खासतौर से मुद्रा को लेकर। पिछले कुछ समय से ऐसी ही एक फांस पच्चीस-पचास पैसे के सिक्कों से लेकर एक, दो, पांच और दस रुपए के सिक्कों को लेकर पैदा हो गई है।

यों डिजाइन से लेकर टिकाऊपन का मसला हो तो छोटी मुद्राओं के ये सिक्के देश के विकास और संस्कृति की झलकियां पेश करते हैं, पर साथ ही यह भी दर्शाते हैं कि कैसे वैध होने के बावजूद देश में भारतीय मुद्रा के रूप में सिक्के एक बड़ी मुसीबत बन गए हैं। सिक्कों की समस्याओं से जुड़ा एक पहलू दस रुपए के सिक्के का है। देश के आर्थिक इतिहास में यह शायद पहला मौका था, जब कुछ समय पहले भारतीय रिजर्व बैंक को कानूनन स्वीकृत अपनी इस मुद्रा के बारे में स्पष्टीकरण देना पड़ा था। फरवरी, 2018 में रिजर्व बैंक ने दस रुपए के सिक्के के बारे में अखबारों में बाकायदा विज्ञापन देकर बताया था कि देश में चौदह अलग-अलग डिजाइन वाले दस रुपए के सभी सिक्के वैध हैं और इनमें से किसी को भी वापस लेने की घोषणा उसने नहीं की है।

असल में, इस घोषणा के पीछे बीते करीब दो-तीन वर्षों से विभिन्न राज्यों में कायम उन अफवाहों का हाथ है, जिनमें दावा किया जा रहा है कि भारी संख्या में जाली सिक्के बाजार में चलाए जा रहे हैं। इसके बाद लोग दस रुपए का सिक्का लेन-देन के दौरान स्वीकारने से कतराने लगे। दस रुपए की समस्या का समाधान अभी भी नहीं निकला है। इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने बीस रुपए मूल्य वर्ग का नया सिक्का अर्थव्यवस्था में जोड़ने का फैसला कर लिया है। इसके पीछे कागज के नोटों की छपाई पर हो रहे भारी खर्च को मुख्य कारण बताया गया है। चूंकि कागजी नोट अधिकतम पांच साल की अवधि में खराब होकर चलन से बाहर हो जाते हैं, जबकि सिक्कों की जीवन-अवधि काफी लंबी है, इसलिए रिजर्व बैंक की योजना छोटी राशि वाली मुद्रा की पूर्ति नोटों के बजाय सिक्कों से करने की है।

रिजर्व बैंक के तर्क देखें तो छोटी मुद्राओं के सिक्के लाने की उसकी योजना का हर कोई समर्थन कर सकता है। आंकड़ों के हिसाब से देश की अर्थव्यवस्था में करीब छब्बीस हजार करोड़ रुपए मूल्य के सिक्के चलन में हैं। एक आंकड़ा यह भी है कि इस समय देश की अर्थव्यवस्था में पांच से बीस रुपए मूल्य वर्ग के सत्तावन अरब नोट प्रचलित हैं, जिनका कुल मूल्य अस्सी हजार करोड़ रुपए बैठता है। सिर्फ दस और बीस रुपए के प्रचलित नोटों का मूल्य पचास हजार करोड़ रुपए से अधिक है। समस्या यह है कि पांच साल की अवधि में खराब होने वाले इन नोटों की निरंतर भरपाई करनी है तो रिजर्व बैंक को करीब चालीस अरब नोट छापने पड़ेंगे, जिस पर करीब आठ हजार करोड़ का खर्च आएगा। इसके बजाय सिक्कों की ढलाई पर किया गया निवेश ज्यादा टिकाऊ होता है। देश में दस रुपए के सिक्कों की भरमार से यह तथ्य सही साबित हुआ है। बेशक, इसी तरह बीस रुपए का सिक्का बाजार में उतारने की रिजर्व बैंक की योजना एक समझदारीपूर्ण फैसला लगती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू ऐसा है, जिसे नजरअंदाज करना घातक होगा।

असल में समस्या यह है कि आज एक ओर पच्चीस और पचास पैसे मूल्य के सिक्के का कोई नाम लेवा नहीं बचा है। ये लीगल टेंडर हैं। सरकार और रिजर्व बैंक की नजर में ये वैध मुद्राएं हैं। पर इन्हें लेने वाला कोई नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल एक, दो व पांच रुपए के सिक्कों का हो रहा है, क्योंकि क्रेडिट, डेबिट (एटीएम) कार्ड और पेटीएम-फोनपे जैसे डिजिटल वॉलेट के दौर में कोई शख्स सिक्कों का बोझ अपनी जेब पर नहीं डालना चाहता। सबसे बुरा किस्सा तो दस रुपए के सिक्के के साथ जुड़ गया है। अरसे से यह अफवाह देश के अलग-अलग हिस्से में फैली है कि दस रुपए के ज्यादातर सिक्के नकली हैं। इनके अलग-अलग चिह्नों और डिजाइन को लेकर यह संशय और भी और भी ज्यादा फैला है। हालांकि इस साल फरवरी में अखबारों में विज्ञापन देकर रिजर्व बैंक स्पष्ट कर चुका है। पर जनता रिजर्व बैंक के आश्वासनों पर कम ही भरोसा कर रही है। देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर के अलावा उत्तर प्रदेश-महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में ऐसी अफवाहें जोरों पर हैं कि नकली टकसालों में भारी संख्या में बनाकर ये सिक्के बाजार में खपाए जा रहे हैं।

देश के करोड़ों लोगों में सिक्कों के असली-नकली को लेकर जो डर बैठ गया है, उसे आसानी से दूर करना मुमकिन नहीं है। हालांकि जिन जगहों पर ऐसी खबरें ज्यादा हैं, वहां स्थानीय प्रशासन घोषणा करता रहा है कि अगर कोई दस रुपए का सिक्का लेने से इनकार करता है, तो मय-सबूत उसके खिलाफ डीएम या एसडीएम के पास शिकायत दी जाए। ऐसे लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर शिकायत दर्ज करके कार्रवाई की जाएगी। लेकिन न तो ग्राहक महज दस रुपए के लिए इतना झंझट मोल लेना चाहते हैं और न दुकानदार-ऑटो चालक आदि इस ऊहापोह से बाहर आना चाहते हैं कि यह सिक्का लिया जाए या नहीं। यही नहीं, ज्यादातर बैंक भी अपने ग्राहकों से दस रुपए का सिक्का यह कह कर लेने से इनकार कर रहे हैं कि उनके पास इन्हें रखने की जगह नहीं है।

यह सही है कि टिकाऊ माने जाने वाली छोटी धनराशियों के सिक्कों की ढलाई सरकार को काफी महंगी पड़ती है। अक्सर उनकी लागत सिक्के पर अंकित मूल्य से कहीं ज्यादा होती है। ऐसे में वह मुद्रा बाजार से गायब हो जाती हैं। कभी बीस पैसे के पीतल धातु के सिक्के की ऐसी जमाखोरी हुई कि वह अचानक अर्थव्यवस्था से ही विलुप्त हो गया। पर यदि किसी फर्जी टकसाल को दस रुपए के सिक्के की ढलाई की लागत साढ़े नौ रुपए भी पड़ रही होगी, तो पचास पैसे के तात्कालिक विशुद्ध मुनाफे के लिए कई खतरे लोग उठाते ही होंगे। बहुत मुमकिन है कि आज जो संशय दस रुपए के सिक्के को लेकर देश में है, वैसा ही संदेह बाजार में आने वाले बीस रुपए के सिक्के को लेकर पैदा हो जाए।

सरकार और रिजर्व बैंक को नए सिक्के बाजार में उतारने से पहले कुछ सवाल खुद से भी पूछने चाहिए। सवाल एक, दो, तीन, पांच, दस, बीस, पच्चीस पैसे के सिक्कों का नहीं है। ये सिक्के इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से ही हमारी अर्थव्यवस्था से ओझल हो चुके हैं। लेकिन पच्चीस और पचास पैसे के सिक्कों का क्या हुआ? इन्हें तो आज तक सरकार या आरबीआइ ने बंद नहीं किया है। पर ये सिक्के अचानक हर बटुए और गुल्लक से गायब हो चुके हैं। कैसी विडंबना है कि विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य निर्धारण और ब्याज राशियों को दर्शाने के लिए अब भी कागजों पर 85.13 पैसे जीवित हैं, लेकिन दशमलव के बाद वाली राशियों को वास्तविकता में दर्शाने का कोई औचित्य अब बचा नहीं है। ऐसे ज्यादातर मामलों में अब पूर्णांक (राउंड फिगर) से ही काम चलाया जाता है। अफवाहों के चलते दस रुपए के सिक्के में भी खोट पैदा हो चुका है। इसलिए बीस रुपए का सिक्का बाजार में लाने से पहले सरकार को यह प्रबंध अवश्य करना होगा कि बैंक हो या बाजार, कोई उसे बिना वजह धकियाने पर आमादा न हो जाए।