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जातिप्रथा से मिलता से भ्रष्टाचार को बढ़ावा

भ्रष्टाचार के कारण सारी व्यवस्था त्रस्त है। इसके उन्मूलन के लिए संसद से सड़क तक बहस छिड़ गई है। डॉक्टर लोहिया कहा करते थे कि दृष्टि, दिशा और संकल्प तीनों का होना अनिवार्य है..

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की साल 2014 की सूची में भारत 85वें पायदान पर था।

भ्रष्टाचार के कारण सारी व्यवस्था त्रस्त है। इसके उन्मूलन के लिए संसद से सड़क तक बहस छिड़ गई है। डॉक्टर लोहिया कहा करते थे कि दृष्टि, दिशा और संकल्प तीनों का होना अनिवार्य है। भ्रष्टाचार एक निगुर्ण शब्द है। जब उसकी व्यापक व्याख्या की जाएगी और उसके उन्मूलन के लिए ठोस कार्यक्रम बनाए जाएंगे तब उसका सगुण स्वरूप दिखाई पड़ेगा। भ्रष्टाचार ने आचार, विचार, प्रवृत्ति और प्रकृति को ग्रसित कर लिया है। भोगवाद के गंदे कूड़े पर भ्रष्टाचार के कीड़े जन्म लेते हैं, पलते और बढ़ते हैं। जाति प्रथा के कारण उसको संरक्षण मिलता है। भ्रष्टाचारी को जाति के नाम पर संरक्षण मिल जाता है। सभी राजनीतिक दलों के नेता, नौकरशाह और कुछ हद तक तथाकथित बुद्धिजीवी एकजुट होकर अपनी जाति वालों को बचाने में लग जाते हैं। दूसरा है वर्ग चरित्र और वर्ग स्वार्थ के कारण सभी भ्रष्टाचारी एक दूसरे को संरक्षण देते रहते हैं। इसके लिए सिद्धांत बनाने में उन्हें दक्षता हासिल है।

राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का व्यावसायिक भ्रष्टाचार से तालमेल रहता है। सत्ता और व्यवसाय का रिश्ता बहुत पुराना है। सारा समाज उस जाल में फंस जाता है और छटपटाता रहता है। भोग, भय और भ्रम के दलदल में धंसा समाज संघर्ष कैसे कर सकता है! राज्यसभा और लोकसभा के सेवानिवृत्त कई महासचिव सरकारी अनुग्रह और अनुकंपा के कारण सुख सुविधा पाते रहे हैं। कैबिनेट सचिव, जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के शिखर पर होते हैं वे सेवानिवृत्ति के बाद सरकार के अनुग्रह का लाभ उठाते हैं। क्या उनसे हम न्याय, निष्पक्षता, नैतिकता, पारदर्शिता और निर्भयता की अपेक्षा कर सकते हैं!

सेवानिवृत्ति के बाद कई लोग सरकारी और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के निदेशक, सलाहकार और वकील बन कर लाभ उठाते हैं। ऐसे लोगों से संबंधित संस्थानों, प्रतिष्ठानों में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध किसी सकारात्मक पहल की उम्मीद भला कितनी की जा सकती है! जो न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद किसी कंपनी का वकील बन गया है, उससे उसकी अनियमितताओं के विरुद्ध निष्पक्षता की उम्मीद कहां तक की जा सकती है? वही जब किसी राजनीतिक दल का दामन थाम लेता है तो उसकी तमाम भ्रष्ट गतिविधियों की अनदेखी शुरू कर देता है। क्या ऐसा कानून बनाया जा सकता है कि सेवानिवृत्ति के बाद कोई न्यायाधीश वकालत न करे, किसी आयोग में न जाए और किसी सरकारी और निजी कंपनी में सवैतनिक या अवैतनिक पद धारण नहीं कर सके। किसी राजनीतिक दल में न जाए। यही नियम भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों पर भी लागू होना चाहिए। निर्णय लेने वाले अगर अपनी दो पीढ़ी तक के रिश्तेदारों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाते हैं तब आजीवन सभी पदों के लिए अयोग्य घोषित कर दिए जाएं। क्या यह संभव है? मैं कह सकता हूं कि यह संभव नहीं है। कारण- राजनीति, प्रशासन और व्यवसाय का गठबंधन। इसके पीछे भी जाति प्रथा एक बड़ा कारण है।

संपत्ति के संग्रह और खर्च पर नियंत्रण करने के लिए जब तक कानून नहीं बनेगा तब तक लोभग्रस्त समाज भ्रष्टाचार से पीड़ित रहेगा। ऊपर से बीस प्रतिशत लोगों के पास 52.7 प्रतिशत और नीचे से बीस प्रतिशत लोगों के पास 5.2 प्रतिशत राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी है। पत्नी के जन्मदिवस पर हवाई जहाज उपहार में देना, शादी में लाख-लाख लोगों को भोजन करवाना और दो-चार सौ करोड़ रुपए खर्च कर देना क्या भ्रष्टाचार नहीं है? सैकड़ों करोड़ का महल बनाना और छत पर हैलीपैड बनाना क्या अपराध नहीं है? वेतन से कई गुना ज्यादा भत्ता और अन्य सुविधाओं के रूप में लेना क्या भ्रष्टाचार नहीं है? आइपीएल के खेल में खिलाड़ी बिकते और खरीदे जाते हैं और उसमें हजारों करोड़ का गुप्त खेल खेला जाता है, क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? क्या खर्च पर सीमा लगाने के लिए कोई कानून बनाया जा सकता है? नहीं बनेगा, क्योंकि राष्ट्रप्रेम और दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं है।

न्यूनतम और अधिकतम आय के अंतर को परिभाषित किया जाए। राष्ट्रपति और चौकीदार के वेतन में एक दस या एक बीस का अंतर हो, इस पर सहमति बना कर संसद द्वारा कानून बनाया जाए। देश में स्वयंसेवी संगठनों की भरमार है। 2005-06 से 2008-09 तक तीन वर्षों में भारत में स्वयंसेवी संगठनों ने कुल अट्ठाईस हजार सात सौ अठहत्तर करोड़ रुपए विदेशी अनुदान प्राप्त किए हैं, ऐसा संसद में कहा गया है। कुछ एनजीओ विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में काम कर रहे हैं! खासकर कृषि क्षेत्र में देशी कंपनियों को नुकसान पहुंचाने और विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए सक्रिय हैं। इसमें अफसर, राजनेता, व्यावसायिक घराने और तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा संरक्षित लोग लगे हुए हैं! उनके परिवार के लोग इसमें शामिल हैं विदेशी सहायता प्राप्त करने में उनके पद और प्रभाव का उपयोग किया जाता है।

लोकतंत्र में कोई संविधान और कानून से ऊपर नहीं होता है। अयोग्य और कुपात्र को विशिष्ट अलंकरण प्रदान करना या राज्यसभा का सदस्य मनोनीत करना भी संवैधानिक भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। क्या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं! भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के विरुद्ध सामान्य प्रक्रिया के तहत मुकदमा चलाने से क्या बिगड़ जाएगा।

राजनीतिक दलों के संगठनों का चरित्र बदल गया है। रैलियों पर लाखों रुपए खर्च होते हैं। कार्यालयों में पांच सितारा सुविधाएं होती हैं। यह धन कहां से आता है। अफसर, ठेकेदार और व्यवसायी धन का जुगाड़ करते हैं। किसान, मजदूर और ग्रामीण कहां से लाख और करोड़ रुपए ला पाएंगे। जो जितना धन जुटाएगा वह उतना बड़ा पद पाएगा। जाहिर है, जो लोग राजनीतिक दलों और राजनेताओं को इस तरह सुविधाएं और धन मुहैया कराने में मदद करते हैं, वे भी किसी न किसी रूप में अपना हित साधते हैं। यह भी भ्रष्टाचार का एक बड़ा क्षेत्र है।

राजनीति पर सेवानिवृत्त नौकरशाह और व्यावसायिक घराने हावी हैं। पिछले दस-पंद्रह वर्षों में राजनीति और प्रशासन में जिस अनुपात में सुख और सुविधाओं की वृद्धि हुई है उसी अनुपात में भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। उन सभी की आय के अनुपात में देश के नब्बे प्रतिशत किसान, मजदूर, ग्रामीण एवं शहरी निर्धन वर्ग की आय में वृद्धि नहीं हुई है। यह भी योजनागत भ्रष्टाचार है। इससे पार पाने के लिए किसी भी सरकार के पास कोई कारगर नीति या उपाय नहीं है।

भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए समग्रता में विचार किया जाए। केवल सरकारी दफ्तरों पर निगरानी रख कर इस समस्या से पार पाना सदा कठिन रहेगा। इसके लिए व्यापक दायरे में सोचने की जरूरत है। जरूरी है कि इसके खिलाफ निर्ममतापूर्वक ठोस कानून बनाए जाएं। चुनाव प्रणाली में सुधार किया जाए। अपराधी और भ्रष्टाचारी को रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किया जाए। अपराधी और भ्रष्टाचारी को टिकट देने वाले दलों की मान्यता समाप्त कर दी जाए। एक बार किसी भी अदालत द्वारा सजा पाए और भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार और जमानत पर रिहा लोगों को चुनाव लड़ने से वंचित किया जाए। राजनीतिक दलों के संगठन में उन्हें पद के लिए अयोग्य करार दिया जाए। इन पहलुओं पर कई बार जोर दिया गया है, पर वही ढाक के तीन पात। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते इस दिशा में कोई कारगर उपाय नहीं हो पाता।

राजनीति में जिन्हें मनोनयन करने का अधिकार होता है उन्हें अपनी जाति में ही योग्यता दिखाई पड़ती है। नई परिभाषा दी जाती है कि निर्णय नैतिक तो नहीं है, पर अवैध नहीं कहा जा सकता। जिस निर्णय में नैतिकता ही न हो, उसे वैध कैसे कहा जा सकता है। अगर भ्रष्टाचार का उन्मूलन करना है तो गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय ने जो सूत्र दिया था उस पर अमल करने के लिए संसद के स्वरूप को बदलना पड़ेगा। आज हमारा देश सरकार अभिमुख है और सरकार अफसर अभिमुख है यानी जनता सरकार की नौकर है और सरकार अफसर का नौकर है। लोहिया ने लोकसभा में कहा था कि भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए जाति प्रथा का समूल नाश करना आवश्यक है। खर्च पर सीमा लगे। न्यूनतम और अधिकतम आय को परिभाषित किया जाए। सभी सत्ताधारी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों द्वारा अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा की जाए। एक स्थायी आयोग बने, जो इसका नियंत्रण करे। अभी जनप्रतिनिधि अपनी संपत्ति का ब्योरा देने को बाध्य तो हैं, पर इस पर अंकुश नहीं लगाया जा पाता कि किस तरह उनकी संपत्ति दिन दूनी रात चौगुनी हो जाती है। सरकारी और निजी कंपनियों के अधिकारियों के वेतन, भत्ते, सुख और सुविधा में आनुपातिक संतुलन हो। निजी कंपनियों पर भी कानूनी नियंत्रण हो। कारण- उसमें भी जनता के शेयर का पैसा और सरकारी वित्तीय संस्थानों का धन लगा हुआ है।

विदेशों में कालाधन जमा करना राष्ट्रद्रोह माना जाए और वैसे लोगों को आजीवन कारावास दिया जाए और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाए। बीस वर्ष के लिए राष्ट्रीय पुनर्निर्माण कोष में जमा की गई राशि को कालाधन की श्रेणी से मुक्त कर दिया जाए। इससे लाखों करोड़ रुपए विकास के कार्य में लग सकेंगे। उपाय बहुत हैं। लेकिन करेगा कौन? विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए बहुत समय से बात हो रही है, पर अभी तक ठीक से यही पता नहीं लगाया जा सका है कि वे कौन लोग हैं जिन्होंने विदेशों में अपना पैसा छिपा रखा है और वह पैसा है कितना। इस पर व्यावहारिक कदम उठाने के लिए संसद का चाल, चरित्र, चेहरा और चिंतन बदलना होगा। विकल्प नहीं कायाकल्प के लिए धर्मयुद्ध की आवश्यकता है। विशाल जन समर्थन के द्वारा ही इसको किया जा सकता है।

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