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राजनीति: नेपाल के बढ़ते संकट

नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के विभिन्न घटकों में टकराहट बढ़ी हुई है। प्रचंड भारत से बेहतर संबंध चाहते हैं। उन्हें ओली की भारत विरोधी नीतियां पसंद नहीं हैं। नेपाल के वरिष्ठ माओवादी नेता भट्टराई को भी ओली की नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास को चोट पहुंचाने की कोशिशें रास नहीं आ रही हैं। यह गतिरोध अभी और आगे बढ़ सकता है। इससे कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल के टूटने की संभावनाएं गहरा गई हैं।

नेपाली पीएम केपी शर्मा ओली का चीन के प्रति झुकाव से उनकी अपनी पार्टी में ही विरोध बढ़ा रहा है।

ब्रह्मदीप अलूने

साम्यवादी सरकारें संस्कृतिवाद को दरकिनार कर वैचारिकतावाद में जकड़ती जा रही हैं। चीन और नेपाल की राजनीति में यह बखूबी देखा जा सकता है। भारत और नेपाल के आपसी संबंधों का मजबूत आधार ऐतिहासिक तौर पर सांस्कृतिक सामीप्य रहा है, जिसे नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चुनौती देकर लगातार समस्याएं बढ़ा रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ओली चीन से इतने प्रभावित हैं कि मंत्रिमंडल की बैठक से लेकर राजनीतिक प्रशिक्षण तक में चीन की भागीदारी बढ़ने लगी है। ऐसा लगता है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ओली, अपने देश की घरेलू राजनीति में साम्यवादी कट्टरता को मजबूत करके सत्ता में बने रहने की रणनीति पर चल निकले हैं।

नेपाल की लोकतांत्रिक राजनीति में वामपंथियों का सत्ता में उभार जितनी तेजी से हुआ था, उतनी ही तेजी से वामपंथ के सत्ता के खत्म होने की संभावनाएं भी बलवती होती चली गईं। मौजूदा प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ओली सत्ता में बने रहने के लिए जिस प्रकार भारत विरोध को बढ़ावा और चीन को अपने देश में हावी होने दे रहे हैं, उसकी सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं वामपंथ के लिए ही जी का जंजाल बन गई हैं। काठमांडो में चीनी राजदूत हाओ यांकी से उनकी निकटता के चलते ही नेपाल के विदेश मंत्रालय को विदेशी राजनयिकों के लिए नियम बदलने को मजबूर होना पड़ा। हाओ यांकी की नेपाल के आंतरिक मामलों में बढ़ती दिलचस्पी से वहां के आम जनमानस और राजनीति के स्तर पर लगातार कड़ी आलोचना हुई।

हाओ यांकी ने सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेताओं के अलावा राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी तक सीधी पहुंच बना ली थी। ओली की सत्ता को बचाने के लिए पूरी शिद्दत से जुटीं चीनी राजदूत यांकी के इस तरह के बढ़ते कदमों को नेपाल के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप माना गया। इसके बाद ही नेपाल के विदेश मंत्रालय ने विदेशी राजनयिकों के लिए नियमों में बदलाव करने का फैसला किया। नए नियमों के तहत अब कोई भी विदेशी राजनयिक किसी भी शीर्ष नेता से सीधे मुलाकात नहीं कर सकेगा।

नेपाल ने विदेशी राजनयिकों के लिए जो नए नियम बनाए गए हैं, उसके व्यापक कूटनीतिक असर हो सकते हैं। इससे न केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नेपाल को अपनी तर्ज पर ढालने का मंसूबा ध्वस्त होने की संभावनाएं बनी हैं, बल्कि इसके साथ नेपाल की आंतरिक राजनीति में भारी उथल-पुथल और उदार जनतांत्रिक पार्टियों के उभरने की संभावनाएं भी मजबूत हो गई हैं।

यह कोई छिपी बात नहीं रह गई है कि चीन नेपाल के लोगों में गहरी पैठ बनाने के लिए वहां बड़ी संख्या में स्कूल खोल रहा है। चीन के साथ संबंधों को मजबूती देने के अलावा ओली ने भारत विरोध की नीति को भी बढ़ावा दिया है। उन्होंने नेपाल का नया नक्शा जारी कर भारतीय क्षेत्रों कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को 1816 की सुगौली संधि का आधार बता कर नेपाल का बताया। जबकि ये क्षेत्र पहले से भारत के नक्शे में शामिल रहे हैं। वहीं नेपाल की सरकार ने चीन और नेपाल सीमा मुद्दे पर अब तक अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की है। जबकि ओली के सामने चीन से अपनी जमीन वापस लेने की चुनौती है। तिब्बत क्षेत्र में नेपाल और चीन की 1439 किलोमीटर लंबी सीमा एक-दूसरे के साथ लगी है।

नेपाल के उत्तरी गोरखा में रुई गांव और उत्तरी संखुवासभा में च्यांग और लुंगडेक गांव पर 1960 के दशक से चीन ने कब्जा कर रखा है। हिमालय के क्षेत्रों में प्राकृतिक सीमाएं तेजी से बदलती है और इससे नेपाल पर सीमा का संकट गहरा गया है। माउंट एवरेस्ट के आसपास के दुर्गम इलाकों पर चीन अपना दावा कर चुका है और सामरिक रूप से वह मजबूती के लिए उन्हें नेपाल को वापस कर दे, यह अब नामुमकिन है।

भारत और चीन को लेकर नेपाली प्रधानमंत्री के अलग-अलग दृष्टिकोण और रामजन्म भूमि को लेकर अप्रत्याशित बयान को लेकर उन्हें अपनी ही पार्टी में भारी विरोध झेलना पड़ रहा है। कभी चीन के कट्टर समर्थक रहे वामपंथी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने ओली की नीतियों को आत्मघाती बताया, वहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के उप-प्रमुख बिष्णु रिजल ने ओली के राम जन्मभूमि नेपाल में ही होने के दावे की कड़ी आलोचना करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण और उकसावे का कृत्य बताया था। माओवादी सभासद के नाम से विख्यात नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.बाबूराम भट्टराई ने यह कहने से गुरेज नहीं किया कि यह प्रधानमंत्री का असंगत और राष्ट्रहित के विपरीत आचरण है और उन्हें पद से बिदा करना ही होगा।

इस समय ओली मुश्किलों में घिरे हैं। एनसीपी प्रमुख प्रचंड और प्रधानमंत्री ओली के बीच गहरे मतभेद हैं। 2018 में कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता का दावा करने वाले प्रचंड स्वयं असहज हैं और वे ओली को सत्ता से हटाना चाहते हैं। सत्तारूढ़ ओली के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें अपने सहयोगियों सीपीएन-यूएमएल और माओवादी सेंटर की जरूरत है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के विभिन्न घटकों में टकराहट बढ़ी हुई है। प्रचंड भारत से बेहतर संबंध चाहते हैं। उन्हें ओली की भारत विरोधी नीतियां पसंद नहीं हैं। नेपाल के वरिष्ठ माओवादी नेता भट्टराई को भी ओली की नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास को चोट पहुंचाने की कोशिशे रास नहीं आ रही हैं।

यह गतिरोध अभी और आगे बढ़ सकता है। इससे कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल के टूटने की संभावनाएं गहरा गई हैं। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा देश में लोकतंत्र और समाजवाद स्थापित करना चाहता है। ओली की विचारधारा नेपाल की धार्मिक प्रतिबद्धताओं को खत्म कर रही है और साम्यवाद की तानाशाही संस्कृति को थोपना चाहती है। वे लगातार चीन को नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का अवसर दे रहे हैं।

नेपाल के तराई और मैदानी क्षेत्रों में मधेशी बड़ी संख्या में रहते हैं। ये इलाके भारत की सीमा के आसपास हैं। मधेशियों के परिवार सीमा के दोनों ओर हैं। ओली उनके हितों को नजरअंदाज करके नेपाल की आंतरिक शांति को लगातार चोट पहुंचा रहे हैं। नेपाल के लाखों लोग भारत में रह कर रोजगार के जरिए अपने परिवारों का पालन पोषण करते है। भारत की सेना में गोरखाओं की संख्या बहुतायत में है और उन्हें वहीं सहूलियतें प्राप्त है जो आम भारतीय को है। भारत नेपाल की सीमा खुली है और सदियों से उसमें कभी समस्याएं नहीं आई,लेकिन ओली की नीतियों से दोनों देशों के नागरिक असहज है।

चार धाम की यात्रा दोनों देशों के नागरिकों की धार्मिक अनिवार्यता मानी जाती है,नेपाल के व्यापार व्यवसाय पर भी भारत का प्रभाव है। ओली यह समझने में नाकाम रहे हैं कि भारत उनका परंपरागत मित्र है जबकि चीन के लिए तिब्बत सामरिक मजबूरी है और इसीलिए वह नेपाल को महत्त्व दे रहा है। इसलिए नेपाल का आम जनमानस आशंकित है कि चीन नेपाल की आर्थिक सहायता करके उसे अपना उपनिवेश बना सकता है।

इस समय नेपाल की आंतरिक राजनीति में ओली की नीतियों को लेकर बैचेनी बढ़ रही है। नेपाल का उदार और धार्मिक समाज अपने देश में सत्ता की निरंकुशता और सांस्कृतिक बिखराव को रोकना चाहता है। आम जनमानस अब अपने वर्तमान प्रधानमंत्री की चीन परस्त और भारत विरोधी नीतियों के दुष्प्रभाव को समझने लगा है और ओली की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आ रही है।

इससे वामपंथी सरकार की बिदाई और कम्युनिस्ट पार्टी के गठबंधन के टूटने के संकेत मिलने लगे हैं। जाहिर है ओली की बिदाई से नेपाल और भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक संबंध मजबूत होंगे और हिमालय क्षेत्र में दोनों देशों की सुरक्षा हितों की रक्षा को लेकर सामने आई चुनौतियां भी कम होने की उम्मीद बढ़ेगी।

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