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आरक्षण पर श्वेत पत्र की जरूरत

इस लेख के प्रारंभ में मैं बिहार चुनाव के विजेता गठबंधन के नेता माननीय नीतीश कुमार को बधाई देना चाहूंगी। नतीजों से परे, यह भारतीय लोकतंत्र की जीत है और यह बात महत्त्वपूर्ण

Author नई दिल्ली | November 10, 2015 10:30 PM
(एक्सप्रेस फाइल फोटो)

इस लेख के प्रारंभ में मैं बिहार चुनाव के विजेता गठबंधन के नेता माननीय नीतीश कुमार को बधाई देना चाहूंगी। नतीजों से परे, यह भारतीय लोकतंत्र की जीत है और यह बात महत्त्वपूर्ण है कि बिहार चुनाव के नतीजे आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार को फोन करके बधाई दी। यही हमारे लोकतंत्र की सुंदरता है। चुनाव के द्वारा सरकारों का चुना जाना आधुनिक लोकतंत्र का एक जरूरी तत्त्व है जो किसी भी हार और जीत से बहुत बड़ी चीज है। वैसे भी संघीय व्यवस्था में राज्य और केंद्र के परस्पर सहयोग से ही राजकाज चलने की परिकल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी। इस मायने में बिहार का चुनाव लोकतांत्रिक परंपरा की एक कड़ी है। मेरी कामना है कि नीतीश कुमार की सरकार, केंद्र के सहयोग से बिहार को विकास के रास्ते पर ले जाए और बिहार की जनता खुशहाल हो।

वैसे तो हर चुनाव अपने आप में विशिष्ट होता है। राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों से लेकर राजनेताओं और जनता के लिए हर चुनाव में कई सबक होते हैं। बिहार का चुनाव इस मायने में विशिष्ट रहा कि यह उत्तर भारत का शायद पहला ऐसा चुनाव था, जिसमें आरक्षण सबसे बड़ा मुद्दा बन कर उभरा। इस मुद्दे को चुनाव शुरू होने से पहले से ही उठाया जाने लगा था। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा की आवश्यकता वाले बयान के बाद पूरा चुनाव मुख्य रूप से इसी मुद्दे के आसपास लड़ा गया। कहने को यह कहा जा सकता है कि भागवत जी के बयान का वह मतलब नहीं था, जो समझा गया और इस बारे में संघ ही नहीं, खुद प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि आरक्षण को खत्म करने की किसी भी कोशिश को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस मुद्दे को लेकर महागठबंधन के सवालों का जवाब देने और अपने जवाब से जनता को संतुष्ट करने में राजग सफल नहीं हो पाया। महागठबंधन के नेता लगातार और जान-बूझ कर यह कहते रहे कि संघ और भाजपा आरक्षण को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। चुनाव नतीजों के बाद कहा जा सकता है कि इसका माकूल जवाब राजग की तरफ से नहीं दिया जा सका।

ध्यान रखने की बात है कि यह देश का आखिरी चुनाव नहीं है और जनता के मन में आरक्षण को लेकर भ्रम पैदा हो गया है, जिसे भाजपा की विरोधी शक्तियां आने वाले दिनों में और बढ़ाने की कोशिश करेंगी। इसलिए आवश्यक है कि सरकार और राजग के स्तर पर स्थिति को स्पष्ट कर दिया जाए कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को न सिर्फ कायम रखा जाएगा, बल्कि इसे और मजबूत किया जाएगा। मेरी पार्टी अपना दल और इसके संस्थापक सोनेलाल पटेल की शानदार परंपरा में सामाजिक न्याय एक बुनियादी तत्त्व रहा है और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष से अपना दल को पहचान मिली है। मेरी पार्टी यह चाहती है कि राजग सामाजिक न्याय के चैंपियन के तौर पर सामने आए और कांग्रेस तथा बाकी दलों को दिखा दे कि वास्तविक सामाजिक न्याय कैसा होना चाहिए।
इसके लिए मेरी राय है कि आरक्षण की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक श्वेत पत्र केंद्र सरकार लाए। इस श्वेत पत्र में आरक्षण से जुड़े तमाम पहलुओं पर छानबीन करके रिपोर्ट रखी जाए। इस श्वेत पत्र पर राष्ट्रीय बहस हो और उसके हिसाब से नीतियां बनें। इस श्वेत पत्र में निम्नलिखित बिंदुओं का समावेश हो।

एक, इस बात की समीक्षा करने का वक्त आ गया है कि पैंसठ साल के आरक्षण के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों की सेवाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं हो पाया है। इस बारे में सूचना के अधिकार से मिली जानकारी और तमाम अन्य स्रोत बताते हैं कि आरक्षण की वजह से जितने पद भरे जाने थे, उनमें से आधे या उससे भी कम पद अब तक भरे गए हैं। जाहिर है कि आरक्षण लागू करने में कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी हो रही है। जिन पदों को आरक्षण के द्वारा भरा जाना है, उन पदों को किसी और तरीके से कैसे भरा जा रहा है? इस बारे में जांच हो और उसकी रिपोर्ट श्वेत पत्र में शामिल की जाए।

दो, श्वेत पत्र को इस बारे में विचार करना चाहिए कि क्या आरक्षण को लेकर कानून बनाया जाना चाहिए और आरक्षण संबंधी प्रावधान के उल्लंघन को दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध घोषित करके इसके लिए आर्थिक दंड और कैद की सजा का प्रावधान होना चाहिए। आरक्षण को लागू न करना अब तक कोई अपराध नहीं है और इस वजह से संवैधानिक प्रावधान होने के बावजूद इसका मनमाने तरीके से उल्लंघन होता आया है। इसे अब तक की सरकारों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। संवैधानिक व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। श्वेत पत्र में इस बारे में स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए कि क्या मौजूदा ढीली-ढाली व्यवस्था के साथ आरक्षण का क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सकता है।

तीन, उच्च पदों पर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग की अनुपस्थिति गंभीर चिंता की वजह है। यूपीए सरकार के समय एक संसदीय प्रश्न के उत्तर में यह बताया गया था कि केंद्र सरकार के सचिव स्तर के पदों में अनुसूचित जाति और जनजाति का कोई अफसर नहीं है। यह लंबे समय से चला आ रहा है और इन पदों पर ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की अनुपस्थिति भी देखी जा सकती है। इसे देखते हुए यह आवश्यक है कि श्वेत पत्र इस बारे में विचार करे कि पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किस तरह सख्ती से अमल में आए, ताकि प्रशासन के शिखर पर भी सामाजिक विविधता नजर आए। पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान अनुसूचित जाति और जनजाति के साथ ही अन्य पिछड़े वर्ग के लिए भी लागू हो, क्योंकि उच्च पदों पर इन तीनों समूहों की उपस्थिति न के बराबर है। श्वेत पत्र में इस बारे में सुझाव शामिल होने चाहिए।

चार, श्वेत पत्र को इस बारे में भी विचार करना चाहिए कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों पर अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की उपस्थिति कैसे सुनिश्चित हो। खासकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों और केंद्र सरकार के शिक्षा संस्थानों में कुलपति, निदेशक, संकाय प्रमुख, प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर सामाजिक विविधता का घोर अभाव है। सरकार इस बारे में आरटीआई में बार-बार जानकारी देती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि स्थिति को सुधारा कैसे जाए। श्वेत पत्र को इस बारे में ठोस सुझाव देने चाहिए, ताकि ज्ञान के सृजन के केंद्रों में सामाजिक विविधता आए और शैक्षिक परिसरों का वातावरण समावेशी बने।

पांच, श्वेत पत्र में इस बात का अध्ययन शामिल होना चाहिए कि आरक्षण के प्रावधानों के अंदर ऐसी कौन-सी व्यवस्थाएं की जाएं, ताकि इनका लाभ अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की महिलाओं को भी मिले। इन समूहों की महिलाएं एक साथ, जाति और लिंग-भेद, दोनों का दंश झेल रही हैं। इनको दोहरे सहारे और संरक्षण की जरूरत है। इन वर्गों की महिलाएं देश की आबादी का चालीस फीसद से ज्यादा हिस्सा हैं, इसलिए इनकी तरक्की के बिना देश के विकास की कोई भी कल्पना साकार नहीं हो सकती। इन वर्गों की महिलाओं को महिला विकास के तमाम कार्यक्रमों में हिस्सेदार बनाने के लिए श्वेत पत्र उपाय सुझाए।

छह, श्वेत पत्र में इस बारे में विचार किया जाए कि क्या उच्च न्यायपालिका को भी आरक्षण के दायरे में लाने की आवश्यकता है। संसद की दो समितियां इस बारे में अध्ययन करके रिपोर्ट दे चुकी हैं। करिया मुंडा समिति और नचिअप्पन समिति की रिपोर्ट संसद के पास है। इनके आलोक में विचार करके श्वेत पत्र में एक दृष्टिकोण सामने आना चाहिए। हालांकि यह संवेदनशील मुद्दा है और इस बारे में तमाम संबंधित पक्षों से राय ली जानी चाहिए।

इसके अलावा और भी कई बिंदु इस श्वेत पत्र का हिस्सा हो सकते हैं, जिसके लिए सरकार सुझाव आमंत्रित कर सकती है। यह सब करते हुए सरकार को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उसका इरादा आरक्षण के प्रावधानों को मजबूत करना है। यह बात जनता तक स्पष्ट पहुंचनी चाहिए कि समीक्षा करने का मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं है। इस बारे में सरकार और सरकार में शामिल दलों और अनुषंगी संगठनों को अनावश्यक बयानबाजी से सख्त परहेज करना चाहिए। बिहार चुनाव के नतीजों से जाहिर है कि यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से कितना संवेदनशील है और इसके कितने गहरे नतीजे हो सकते हैं।

यह समझना आवश्यक है कि आरक्षण और विशेष अवसर का सिद्धांत हमारे संविधान और लोकतंत्र के मूल में है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने इसका प्रावधान मूल अधिकारों के अध्याय में ही किया है और स्पष्ट किया है कि इससे समानता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। भारत जैसा विविधतापूर्ण देश, राजकाज की संस्थाओं और अवसरों में सामाजिक विविधता सुनिश्चित किए बगैर एक मजबूत राष्ट्र नहीं बन सकता। सामाजिक विविधता इस देश की ताकत है। इसका प्रतिबिंब तमाम संस्थाओं में नजर आए, इसके लिए आरक्षण के प्रावधानों को मजबूत किया जाए।
(अनुप्रिया पटेल, लेखिका अपना दल की सांसद हैं)

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