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राजनीतिः जरूरी है गांधी को समझना

सच्ची शिक्षा उस मनुष्य ने पाई है जिसके शरीर को ऐसी तालीम दी गई है कि वह उसके बस में रह सकता है, सौंपा हुआ कार्य सहर्ष और सरलता से करता है। सच्ची शिक्षा उस व्यक्ति ने पाई है जिसकी बुद्धि शुद्ध है, शांत है और न्यायदर्शी है। सच्ची शिक्षा उसे मिली है जिसका मन प्राकृतिक नियमों (के ज्ञान) से ओतप्रोत है और जिसकी इंद्रियां उसके वश में हैं, जिसकी अंतर्वृत्ति शुद्ध है और जो नीच कामों से घृणा करता है और दूसरों को अपने समान समझता है।

भारत सरकार के स्वच्छता मिशन के लिए ही कार्य कर रहा था जिसे गांधी का नाम लेकर चलाया गया और इस कारण गांधी को स्वच्छ भारत समर्पित करने के लक्ष्य पूर्ति में लाखों लोग स्वेच्छा से भी प्रयत्नपूर्वक लग गए।

दो अक्तूबर के बाद पूरे वर्ष चर्चा गांधी के जीवन और उपलब्धियों पर केंद्रित होगी। इसमें मुख्य रूप से स्वच्छ भारत की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की पूर्णता के लिए अपनाई जा रही रणनीति को और अधिक सजगता तथा कर्मठता प्रदान करने की आवश्यकता पर भी विचार-विमर्श होगा। यह सर्वथा उचित होगा। स्वच्छता सभी के लिए आवश्यक है, सभी को प्रिय भी है, मगर उसके लिए अपने से किए जाने वाले प्रयासों को लेकर सरकार और उसकी संस्थाओं को दोष देने की प्रथा पुरानी है। इस आलोचना में हम सभी अपने को समाज के उत्तरदायित्वों से मुक्त मान लेते हैं। स्वच्छता के महत्त्व को गांधीजी ने समझा, अपनाया और परिश्रम-पूर्वक अपने घर के लोगों व सहयोगियों को सफलतापूर्वक प्रेरित किया। यह अपने में एक अद्भुत और अद्वितीय प्रारंभ था। सदियों से विरासत में मिले दृष्टिकोण को बड़े स्तर पर बदलने का प्रयास अत्यंत कठिन था, यह कठिनाई आज भी विद्यमान है।

सरकारें जब स्वच्छता मिशन जैसे कार्यक्रम अपने हाथ में लेती हैं और अपने अधिकारियों से उनके सफलतापूर्वक क्रियान्वयन की अपेक्षा करती हैं तब क्या होता है, इसका एक उदाहरण उस आइएएस अधिकारी के बर्ताव तथा व्यवहार से समझा जा सकता है जिसने एक बीमार, अशक्त, वृद्ध व्यक्ति द्वारा ‘ओडीएफ ’ परियोजना के एक बार के उल्लंघन पर जेल भेज दिया! इस उच्च शिक्षा प्राप्त अधिकारी को शिक्षा से क्या मिला? पद मिला, साधन-संसाधन मिला और उसके व्यक्तित्व को वह अहंकार मिला जो उसे संवेदनहीनता के अमानवीय स्तर तक ले गया। कितने आश्चर्य की बात है कि वह भी भारत सरकार के स्वच्छता मिशन के लिए ही कार्य कर रहा था जिसे गांधी का नाम लेकर चलाया गया और इस कारण गांधी को स्वच्छ भारत समर्पित करने के लक्ष्य पूर्ति में लाखों लोग स्वेच्छा से भी प्रयत्नपूर्वक लग गए।

यह निर्विवाद है कि स्वच्छ भारत के लक्ष्य तक पहुंचाने का रास्ता गांधी की सोच और शिक्षा की सही समझ से निकल सकेगा। यदि हमने यह लक्ष्य केवल सरकारी अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों में प्राप्त भी कर लिए, तो उन्हें बिखरने में देर नहीं लगेगी। सबसे महत्त्वपूर्ण परियोजना तो उन लोगों को तैयार करने की ही होती है जो भविष्य की पीढ़ियों को उनके पोषण और स्वास्थ्य के नैसर्गिक अधिकार के साथ उन्हें शिक्षा द्वारा मनुष्यत्व और उससे उत्पन्न कर्तव्यों और मूल्यों को भी अंतर्निहित कराए। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में ही इस दर्शन को आत्मसात कर लिया था कि समाज में हर वर्ग को, और विशेषकर पीड़ित, दलित और दबे-कुचले लोगों को सम्मानपूर्ण जीवन और न्याय कोई भी सरकार तब तक नहीं दिला सकेगी जब तक वे स्वयं अपनी भागीदारी का महत्त्व न समझें, अपने अधिकार न समझें और उन्हें हासिल करने के लिए प्रयास करने को तैयार न हों। ऐसा उनके लिए तभी संभव होगा जब शिक्षा, समझ और ज्ञान की ज्योति उनका मार्ग प्रशस्त करे। यानी उन्हें शिक्षा दी जाए, जो केवल साक्षरता तक सीमित न हो वरन जिसमें हर स्तर पर और हर कदम पर मन, शरीर और आत्मा के संपूर्ण विकास का लक्ष्य निहित हो, और सर्वविदित हो।

ऐसी कोई भी चर्चा तुरंत ही एक प्रश्न उछालती है- शिक्षा का प्रसार तो बहुत हुआ, मगर क्या वह संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के अपने अपेक्षित उद्देश्य के करीब भी पहुंची है? आज की शिक्षा अधिकांश युवाओं में आत्मविश्वास उत्पन्न नहीं करती है। कुछ के अंदर वह अहंकार और मूल्य-विहीन व्यक्ति का निर्माण कराती है जिसके अनेक उदाहरण प्रतिदिन सामने आते रहते हैं। अपनी कालजयी रचना ‘हिंद स्वराज’ (1909) में युवा मोहनदास गांधी ने (तब वे महात्मा नहीं बने थे) प्रोफेसर हक्सले को उद्धृत किया है, जिसे बार-बार दोहराया जा सकता है: ‘सच्ची शिक्षा उस मनुष्य ने पाई है जिसके शरीर को ऐसी तालीम दी गई है कि वह उसके बस में रह सकता है, सौंपा हुआ कार्य सहर्ष और सरलता से करता है। सच्ची शिक्षा उस व्यक्ति ने पाई है जिसकी बुद्धि शुद्ध है, शांत है और न्यायदर्शी है। सच्ची शिक्षा उसे मिली है जिसका मन प्राकृतिक नियमों (के ज्ञान) से ओतप्रोत है और जिसकी इंद्रियां उसके वश में हैं जिसकी अंतर्वृत्ति शुद्ध है और जो नीच कामों से घृणा करता है और दूसरों को अपने समान समझता है। ऐसा व्यक्ति वास्तव रूप में शिक्षित कहा जाएगा, क्योंकि वह कुदरत के कानून के मुताबिक चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा।’

भारत के गांव-गांव में प्रकृति को सदा ही महत्त्व दिया जाता रहा है। घोर भौतिकवाद के इस युग में इसके बिखरने के कारण समझना कठिन नहीं है, फिर भी यह आज भी अधिक गहन अध्ययन का विषय बनना चाहिए कि भारत में ऐसा क्योंकर हुआ? स्वच्छता में पिछड़ना भी इसी बदलाव का एक हिस्सा है। जो स्थिति बनी है उसकी जानकारी सभी को थी। प्रकृति भी समय-समय पर चेतावनी देती रही। गांधी ने स्वयं लिखा: ‘आज शुद्ध जल और शुद्ध पृथ्वी हमारे लिए अपरिचित हो गए हैं। हम आकाश और सूर्य के मूल्य को नहीं पहचानते, अगर हम पांच तत्वों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करें और सही व संतुलित भोजन करें, तो हम युगों का काम पूरा कर सकेंगे। इस ज्ञान के अर्जन के लिए न डिग्रियों की आवश्यकता है, न करोड़ों रुपयों की।’

दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले के सुझाव को अक्षरश: स्वीकार करते हुए मोहनदास गांधी ने साल भर देश भ्रमण किया, भारत, भारतीयों और यहां की संस्कृति और परिस्थितियों को समझा। हिंद स्वराज के बाद भी लगातार उनका जोर शिक्षा और उसकी सर्व-उपलब्धता और संपूर्णता पर बढ़ता ही गया। वैसे वे शिक्षा में चरित्र निर्माण की आवश्यता पहले ही समझ चुके थे और हिंद स्वराज में उन्होंने शिक्षा प्राप्त करने को साधना माना था जिसका उपयोग और दुरुपयोग दोनों ही संभव थे। उन्होंने इसकी तुलना डॉक्टर के उस यंत्र से की जो चीर-फाड़ कर स्वास्थ्य दे सकता था, या दुरुपयोग होने पर किसी का जीवन ले सकता था। अक्षर ज्ञान भी ऐसा ही है। बहुत से लोग इसका बुरा उपयोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे साबित होता है कि अक्षर ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान हुआ है। आज भी भ्रष्टाचार के जघन्य मामले किसी अनपढ़ व्यक्ति की करतूत नहीं होते हैं।

ऊंची से ऊंची शिक्षा प्राप्त व्यक्ति ही अरबों-खरबों का घोटाला करता है, उसका दुष्परिणाम अंतिम पंक्ति के छोर पर खड़े व्यक्ति का आगे बढ़ने का मार्ग रोक कर उसे और पीछे धकेल देने का ही होता है। अब यह भी अच्छी तरह समझा जाने लगा है कि नैतिक मूल्यों के विकास और अधिग्रहण की अनुपस्थिति शिक्षा को और व्यक्तित्व विकास को कभी भी सही दिशा नहीं दे सकती है। गांधीजी के जन्म के एक सौ पचासवें वर्ष में व्यक्ति निर्माण और शिक्षा से व्यक्तिव-विकास पर गहन विचार-विमर्श के द्वारा एक ऐसी रणनीति तैयार की जानी चाहिए जिसमें सभी की भागीदारी हो, जो शब्दों में नहीं, व्यवहार में पारदर्शिता के साथ समाज के अंतिम छोर पर अभी भी प्रतीक्षा कर रहे लोगों पर केंद्रित हो।

साथ ही देश इस पर भी बहस करे कि विशेषाधिकार प्राप्त करने की होड़ पर अंकुश कौन लगाएगा? यह विकृति कहां तक पहुंची है, इसका अंदाजा उस खबर से लगाया जा सकता है जिसमें एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अपने कार्यस्थल तक आने-जाने लिए एक विशेष मार्ग की मांग की गई थी! एक राज्य सरकार केवल वीआइपी के लिए एक फ्लाईओवर हवाई अड्डे तक बनाने जा रही थी, जिसे जनता ने प्रतिरोध कर रोक दिया था। इस उदाहरण में समस्या की गंभीरता और उसके समाधान दोनों ही निहित हैं। यदि इसका सार तत्त्व समझ लिया जाए तो हम सर उठा कर गांधी को याद करने लायक हो सकेंगे।

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