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राजनीति: मजबूत बैंकों की जरूरत

अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे और कमजोर सरकारी बैंकों में पूंजी डालने का फैसला बैंकिंग सुधार की दिशा में बड़ा कदम है। इससे सरकारी बैंकों की माली हालत सुधरेगी और बैंक फिर से खड़े हो सकेंगे। इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती ही बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने की है। इसके लिए सबसे बड़ी और पहली जरूरत गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की समस्या का समाधान करना है। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कर्ज वसूली प्रणाली को बेहतर बनाना होगा।

भारतीय रिजर्व बैंक। (फाइल फोटो)

जयंतीलाल भंडारी

पिछले हफ्ते आई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की एक शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों के विलय और कंप्यूटरीकरण के कारण बैंकों की दक्षता बढ़ी है। साथ ही बैंकों में नौकरियों में कटौती करने से जो खर्च बचा है उससे सरकारी बैंकों ही हालत में सुधार आया है। उल्लेखनीय है कि एक अप्रैल को बैंक आॅफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक के विलय के बाद भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बैंक ऑफ बड़ौदा दूसरा सबसे बड़ा बैंक बन गया है। इसके साथ ही देना बैंक और विजया बैंक की सभी शाखाएं बैंक ऑफ बड़ौदा की शाखा के रूप में काम करने लगीं। अब इस एकीकरण के बाद बैंक आॅफ बड़ौदा के पास साढ़े नौ हजार से अधिक शाखाएं और करीब साढ़े तेरह हजार एटीएम हो गए हैं। एकीकरण के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा एक करोड़ बीस लाख से ज्यादा ग्राहकों को सेवाएं दे रहा है। इस एकीकरण के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा का महाराष्ट्र, गुजरात, केरल तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में पूरक शाखाओं का नेटवर्क बढ़ गया है।

गौरतलब है कि बैंक आॅफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक के विलय के बाद देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञ इसे बैंकिंग सुधार की दिशा में बड़े एवं मजबूत कदम के रूप में देख रहे हैं। पिछले दो वर्षों से सरकारी बैंकों को मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं। 23 अगस्त, 2017 को कैबिनेट ने सार्वजनिक बैंकों के एकीकरण में तेजी लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। पिछले वर्ष 24 जुलाई को केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक से उन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के बारे में राय मांगी थी जिनका विलय किया जा सकता है। बैंकिंग क्षेत्र में दो तिहाई से ज्यादा हिस्सेदारी सरकारी बैंकों की है। सरकार की रणनीति अगले तीन वर्षों में सरकारी बैंकों की संख्या घटा कर दस से बारह के बीच लाने की है। उल्लेखनीय है कि छोटे बैंकों को बड़े बैंक में मिलाने का फार्मूला केंद्र सरकार पहले भी अपना चुकी है। दो साल पहले एक अप्रैल 2017 को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) के पांच सहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक (बीएमबी) का एसबीआइ में विलय किया गया था। भारत में स्टेट बैंक आॅफ इंडिया जैसे बड़े बैंकों में सहायक बैंकों के विलय से उद्योग कारोबार व विभिन्न वर्गों की कर्ज की बड़ी जरूरतें पूरी करने में आसानी हुई है।

यह बात महत्त्वपूर्ण है कि सरकार ने बैंकिंग सुधारों के लिए जो कदम उठाए गए हैं, उनसे भी सरकारी बैंकों की स्थिति सुधरने लगी है। पिछले वर्ष 22 नवंबर को केंद्र सरकार ने बैंकों के साथ धोखाधड़ी करके विदेश भागने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों के अध्यक्ष, प्रबंध निदेशकों और मुख्य कार्याधिकारियों को अधिकार सम्पन्न बनाया है। इस अधिकार के बाद कर्ज चुकाने में जानबूझ कर चूक करने वाले कजर्दारों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने और उनके लिए लुकआउट नोटिस जारी करने का आग्रह अब बैंक के शीर्ष अधिकारी सीधे गृह मंत्रालय से कर सकेंगे। बैंक प्रमुखों को ऐसा अधिकार पहले नहीं था। सामान्यत: जांच एजेंसियां जानबूझ कर चूक करने वाले कर्जदारों के खिलाफ शिकायत पर एफआइआर दर्ज करने में खासा समय ले लेती थीं। इस संबंध में केंद्र सरकार के नए अहम कदम से बैंक के चूककर्ताओं के लिए देश से भागने की कोई गुंजाइश नहीं होगी।

पिछले दिनों वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) में जो अतिरिक्त पूंजी डाल रही है, उससे बैंकों में फंसे कर्ज (एनपीए) की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2019 के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बहुत ज्यादा बाहरी पूंजी की जरूरत नहीं होगी। अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे और कमजोर सरकारी बैंकों में पूंजी डालने का फैसला बैंकिंग सुधार की दिशा में बड़ा कदम है। इससे सरकारी बैंकों की माली हालत सुधरेगी और बैंक फिर से खड़े हो सकेंगे। इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती ही बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने की है। इसके लिए सबसे बड़ी और पहली जरूरत गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की समस्या का समाधान करना है। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कर्ज वसूली प्रणाली को बेहतर बनाना होगा। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि लंबे समय तक दबाव में रहने के बाद अब बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति सुधार के रास्ते पर है। बैंकों पर एनपीए का बोझ कम होने लगा है। सितंबर 2018 तक की अवधि में सकल एनपीए अनुपात में कमी आई है। पिछले तीन साल के दौरान इसमें यह पहली गिरावट है। यह बढ़ते दबाव के समक्ष बैंकों के मजबूती से खड़े होने की क्षमता के तौर पर सकारात्मक संकेत है। वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट 2019 के मुताबिक बैंकों का सकल एनपीए अनुपात सितंबर 2018 में घट कर 10.8 प्रतिशत रह गया, जो मार्च 2018 में 11.5 प्रतिशत पर पहुंच गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए सभी बैंकों का सकल एनपीए मार्च 2019 तक कम होकर 10.3 प्रतिशत रह जाने का अनुमान है।

सरकार की जनहित की योजनाएं सरकारी बैंकों पर ही आधारित हैं, ऐसे में मजबूत सरकारी बैंकों की जरूरत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। देश भर में चल रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था करने और उन्हें बांटने की जिम्मेदारी सरकारी बैंकों को सौंपी गई है। सरकारी बैंकों मुद्रा लोन, शिक्षा के लिए कर्ज और किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए बड़े पैमाने पर कर्ज बांट रहे है। चूंकि बीमा या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेने के लिए बैंक खाता जरूरी है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सुविधाओं की भारी कमी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च, 2018 तक जनधन योजना के तहत 31.44 करोड़ खाते खुले थे। 2014 से 2017 के बीच दुनिया में इक्यावन करोड़ बैंक खाते खुले। इसमें से छब्बीस करोड़ खाते केवल भारत में जन-धन योजना के अंतर्गत खुले। भारत में इस अवधि में छब्बीस हजार नई बैंक शाखाएं भी खुलीं। ऐसे में भारत की नई बैंकिंग जिम्मेदारी बैंकों के निजीकरण से संभव नहीं है। ऐसी जिम्मेदारी मजबूत सरकारी बैंक ही निभा सकते हैं।

निसंदेह सार्वजनिक क्षेत्र के छोटे और कमजोर बैंकों का एकीकरण नए बैंकिंग युग की जरूरत है। इस समय जहां देश के बैंकिंग क्षेत्र में बड़े आकार के बैंकों की जरूरत है वहीं यह भी जरूरी है कि सरकार बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के कार्य पर निगरानी और नियंत्रण भी रखे। बैंकों को दी गई भारी-भरकम नई पूंजी के आबंटन की उपयोगिता और प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक इसका इस्तेमाल कितने प्रभावी ढंग से करेंगे और फंसे हुए कर्ज से कैसे निपटेंगे। बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के साथ-साथ बड़े और मजबूत सरकारी बैंकों को आकार देने की रणनीति भी लाभप्रद होगी। ऐसा होने पर ही बैंकों में नए निवेश से सभी प्रकार के छोटे-बड़े उद्योग लाभान्वित होंगे और बैंक अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में टिक सकेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के कमजोर और मजबूत बैंकों के एकीकरण की प्रक्रिया को जारी रखेगी। देश के सरकारी बैंकों द्वारा नई तकनीकी क्षमताओं के साथ खर्च में कमी की जाएगी। बैंक डिजिटल भुगतान के लिए इस्तेमाल की जा रही पुरानी पड़ गई पाइंट आॅफ सेल (पीओएस) मशीनों को बदल कर परिष्कृत पीओएस मशीनों का उपयोग करने की दिशा में बढ़ेंगे। आर्थिक सुधारों की असली कुंजी मजबूत बैंकिंग क्षेत्र ही है।

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