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राजनीतिः अब जरूरी है गैर पारंपरिक ऊर्जा

गैर पारंपरिक ऊर्जा में सौर ऊर्जा हमारे पास एक ऐसा स्रोत है जो दुनिया के ऊर्जा उत्पादन में बड़ी भूमिका निभा सकता है। सूरज हमारे देश पर मेहरबान है। पचास डिग्री सेल्सियस से ऊपर भी वह हमें चमक देता है। इस सौर ऊर्जा को हम अधिक से अधिक सोलर पैनलों के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा बायोगैस की मात्रा का दोहन भी आसानी से किया जा सकता है। इथेनॉल भी गैर पारंपरिक ऊर्जा का बड़ा स्रोत बनाया जा सकता है।

Author August 20, 2018 5:19 AM
कर्नाटक ने गैर पारंपरिक ऊर्जा के उत्पादन में दुनिया में श्रेष्ठता हासिल कर ली है। इसमें अब तक डेनमार्क और नीदरलैंड सबसे आगे थे।

भगवती प्रसाद डोभाल

कर्नाटक ने गैर पारंपरिक ऊर्जा के उत्पादन में दुनिया में श्रेष्ठता हासिल कर ली है। इसमें अब तक डेनमार्क और नीदरलैंड सबसे आगे थे। कर्नाटक ने गैर पारंपरिक ऊर्जा के उत्पादन से प्रदेश में अन्य पारंपरिक स्रोतों की अपेक्षा अपनी क्षमता पचास फीसद तक बढ़ा ली है। वर्ष 2028 तक कर्नाटक ने गैर पारंपरिक ऊर्जा के उत्पादन को साठ फीसद तक करने का लक्ष्य बनाया है। अभी कर्नाटक 123 गीगावाट का उत्पादन कर रहा है। इस गैर पारंपरिक ऊर्जा में 26 गीगावाट हाइड्रो बायोमास, 47 गीगावाट पवन ऊर्जा और पांच गीगावाट सौर ऊर्जा शामिल है। एक गीगावाट ऊर्जा से हर साल दस लाख घरों को रोशन किया जा सकता है। अभी तक तमिलनाडु ही अकेला भारतीय राज्य था, जो गैर पारंपरिक ऊर्जा का उत्पादन अन्य राज्यों से अधिक कर रहा था।

कर्नाटक के बाद देश के अन्य राज्य भी गैर पारंपरिक ऊर्जा के उत्पादन की दिशा में काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र 86, गुजरात 73, राजस्थान 68 और आंध्र प्रदेश 67 गीगावाट का ऊर्जा उत्पादन करने में सक्षम है। आइआरईएनए के अनुसार अभी भारत की गैर पारंपरिक ऊर्जा उत्पादन की क्षमता कुल ऊर्जा उत्पादन के अन्य स्रोतों की तुलना में मात्र 20 फीसद है। एक तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि दक्षिण कोरिया की गैर पारंपरिक ऊर्जा उत्पादन की क्षमता अभी 108 गीगावाट, ग्रीस की 87, बेल्जियम की 74, न्यूजीलैंड की 72 और यूक्रेन की 64 गीगावाट की है। विश्व में अभी तक ऊर्जा के जिन स्रोतों यानी पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह वैश्विक मंचों पर आलोचना का केंद्र बना हुआ है। दुनिया के जलवायु संकट को लेकर अभी तक जितने सम्मेलन हुए हैं, उनमें विवाद का सबसे बड़ा केंद्र खनिज तेल से प्राप्त ऊर्जा है। सभी की चिंता मौसम में आ रहे बदलाव को लेकर है। ईंधन के तौर पर कोयला और खनिज तेल अभी उपयोग में आ रहा है। हालांकि इसके इस्तेमाल को एकदम नहीं छोड़ा जा सकता, लेकिन इसी के विकल्प के रूप में गैर पारंपरिक ऊर्जा पर दुनिया के देशों का ध्यान केंद्रित है।

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दूसरी ओर अध्ययनों से इस बात की भी पुष्टि हो रही है कि यदि वातावरण से कार्बन डाइआक्साइड गैस को कम करने की कोशिश की गई तो वनस्पतियां प्रभावित होंगी, क्योंकि पौधे अपना भोजन सूर्य की रोशनी की उपस्थिति में वातावरण से कार्बन डाईआक्साइड लेकर बनाते हैं। वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड का कम होना भी मनुष्य के लिए खतरे की घंटी होगी। इसलिए पृथ्वी के वातावरण को संतुलित करने के लिए वैज्ञानिकों को निरंतर नए-नए प्रयास करने होंगे।पृथ्वी पर बहुत सारे दबाव मनुष्य द्वारा सृजित हैं। इसमें वनों का कटान सबसे प्रमुख है। आज वनों को पनपाना आवश्यक है। वन हमारे बाहरी फेफड़े हैं जो हमें प्राण वायु देते हैं। पेड़ों की कटाई को लेकर हाल में राजधानी दिल्ली में विवाद खड़ा हो गया था और बड़ी संख्या में लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे लिपट गए थे। रिहायशी इमारतें बनाने के लिए सोलह हजार पेड़ों को काटने की योजना थी और इनमें से कुछ पेड़ काट भी दिए गए थे। अगर इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों को काट दिया जाएगा तो उसका असर सीधे वातावरण पर पड़ेगा।

माना कि इसकी भरपाई में नए पेड़ लगा कर करने की भी कोशिश की जाए तो क्या वे छोटे-छोटे पौधे उन वृक्षों की भरपाई कर पाएंगे जो कई गुना आक्सीजन का उत्सर्जित कर रहे थे और कार्बन डाईआक्साइड को वातावरण से सोख रहे थे। यह एक उदाहरण भर है कि हम विकास किस रूप में कर रहे हैं। विकास होना चाहिए, पर संतुलन और योजना के साथ। इस संदर्भ में कर्नाटक ने गैर पारंपरिक वैकल्पिक ऊर्जा के उत्पादन में प्रदेश को जो नई दिशा दी, वह देश के दूसरे राज्यों के लिए मिसाल है। वे भी अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करने की ओर बढ़ें तो निश्चित रूप से वह समय दूर नहीं होगा जब पारंपरिक ऊर्जा के इस्तेमाल की जरूरत नहीं होगी।

भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही इसमें रोजगार के अवसर भी बढेÞ हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार सौर ऊर्जा के क्षेत्र में लगभग 33 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। जबकि जापान, अमेरिका और चीन में सौर ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार में इजाफा नहीं हो रहा है। यूरोपीय संघ के देशों में तो नौकरियां घटी हैं। लेकिन दूसरी ओर पवन ऊर्जा के क्षेत्र में नौकरियों की रिकार्ड वृद्धि हुई है। चीन में पवन ऊर्जा पर सर्वाधिक काम हुआ है। इस क्षेत्र में अमेरिका और जर्मनी में पांच फीसद के हिसाब से रोजगार बढेÞ हैं। पवन ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक रोजगार का आंकड़ा ग्यारह लाख तक जा पहुंचा है। गैर पारंपरिक ऊर्जा के क्षेत्र बायो ऊर्जा, जिओ थर्मल, जल विद्युत, सागर, सौर और पवन हैं। इनके माध्यम से ही हम ऊर्जा का पर्याप्त उत्पादन कर सकते हैं और एक स्वच्छ विश्व के निर्माण में भागीदार बन सकते हैं।

जल विद्युत को ही लें। पहाड़ी प्रदेशों में इसका उत्पादन छोटी-छोटी इकाइयों में आसानी से किया जा सकता है। एक जमाने में पहाड़ों में पन चक्की (स्थानीय भाषा में जिसे घट कहते हैं) गेहूं, मक्का आदि को पीसने के लिए बनाई जाती थी। इनकी संख्या तीस वर्ष पहले चालीस हजार से भी अधिक की थी। ये चक्कियां छोटी-छोटी दरियाओं पर बनाई जाती थीं। आज वे एक तरह से विलुप्त हो चुकी हैं। फिर भी सरकारी प्रयासों से उन्हें जिंदा रखने का प्रयास चल रहा है। जर्मनी के सहयोग से लगभग साढ़े पंद्रह सौ पन चक्कियां उत्तराखंड में काम कर रही हैं। इनसे पांच किलो वाट तक बिजली भी पैदा कर सकते हैं। तीस साल पहले चालीस हजार पन चक्कियों से दो लाख किलोवाट बिजली का उत्पादन किया जा सकता था। यह तो सिर्फ उत्तराखंड से मिलती। लेकिन जितने पहाड़ी प्रदेश हैं, अगर सभी जगह ऐसे प्रयोग हों तो करोड़ों यूनिट बिजली का उत्पादन संभव है। लेकिन योजना के अभाव में हम जल विद्युत के इतने बड़े स्रोत को अभी तक नहीं अपना सके हैं। इस तरह उत्पादित बिजली को नेशनल ग्रिड से जोड़ कर देश में विद्युत ऊर्जा से आत्मनिर्भर बना जा सकता था। ऐसा ही मामला पवन ऊर्जा उत्पादन को लेकर है। मंगोलिया पवन ऊर्जा के क्षेत्र में अच्छा काम कर रहा है। उसके पास पवन बहने का स्रोत है। ऐसे ही स्रोत हमारे देश के पहाड़ हो सकते हैं। यहां ऊंचाइयों में खूब पवन बहती है, हमे सिर्फ उसका सदुपयोग पवन ऊर्जा के उत्पादन में करना है। समुद्र के किनारों से भी पवन ऊर्जा पैदा की जा सकती है।

गैर पारंपरिक ऊर्जा में सौर ऊर्जा हमारे पास एक ऐसा स्रोत है जो दुनिया के ऊर्जा उत्पादन में बड़ी भूमिका निभा सकता है। सूरज हमारे देश पर मेहरबान है। पचास डिग्री सेल्सियस से ऊपर भी वह हमें चमक देता है। इस सौर ऊर्जा को हम अधिक से अधिक सोलर पैनलों के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा बायोगैस की मात्रा का दोहन भी आसानी से किया जा सकता है। इथेनॉल भी गैर पारंपरिक ऊर्जा का बड़ा स्रोत बनाया जा सकता है। कोयले और खनिज तेल की खपत तब ही कम की जा सकती है, जब वैकल्पिक संसाधनों को मजबूत करने में हर व्यक्ति मदद करें। गैर पांरपरिक ऊर्जा भविष्य की जरूरत है। कहना न होगा, गैर पारपंरिक ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए हमारे पास संसाधन तो काफी हैं, लेकिन दृष्टि का अभाव है। इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टि से सोचने और काम करने की जरूरत है।

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