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हिंदी दिवस: हिंदी-उर्दू विवाद को अंग्रेजों ने ‘फूट डालो राज करो’ के तहत दिया बढ़ावा

राष्ट्रवादी नेताओं और प्रगतिशील-लोकतांत्रिक पक्षों द्वारा इस विवाद के समाधान के रूप में हिंदुस्तानी भाषा पर जोर दिया गया।

Author नई दिल्ली | September 14, 2016 11:08 PM
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी।

उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय राजनीति एक नई दिशा ले रही थी। आजादी की लड़ाई लोकप्रिय हो रही थी। कांग्रेस के स्वरूप, भारतीय जनता के व्यापक प्रतिरोध और सामाजिक-आर्थिक अंतर्क्रियाओं के परिणामस्वरूप उस वक्त तक भारत एक इकाई के रूप में सामने आ रहा था। उपनिवेशवाद-विरोधी चेतना के कारण उस समय राष्ट्रीय प्रतीकों पर भी जोर दिया जाने लगा था। भाषा का विवाद भी उन प्रतीकों की प्रतिद्वंद्विता में शामिल हो गया और विवाद का मुख्य रूप राष्ट्रभाषा का हो गया। आजादी के आंदोलन में राष्ट्र-भाषा का मुद्दा जटिल और अत्यंत विवादास्पद था। अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, हिंदी, उर्दू के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के बीच यह विवाद चल रहा था। राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा के मुद्दे पर हस्तक्षेप करते हुए गांधी ने हिंदुस्तानी का समर्थन किया था।

आजादी के आंदोलन में राष्ट्रीयता के लिए समान/एक भाषा का महत्त्व निर्विवाद था। लगभग सभी पक्ष एक राष्ट्रभाषा के समर्थक थे। भारत में अन्य विविधताओं के साथ-साथ भाषाई विविधता भी थी, इसलिए राष्ट्रीयता के नजरिये से यह चुनौतीपूर्ण स्थिति थी। उस समय उत्तर भारत में हिंदी-उर्दू का विवाद चल रहा था, तो उत्तर और दक्षिण भारत की भाषाओं के बीच भी आर्यभाषा-द्रविड़भाषा का विवाद मौजूद था। विविधता के आधार पर अंग्रेज भारत के राष्ट्र होने और राष्ट्रीयता के दावे को खारिज करते रहे। दूसरी तरफ भाषाओं की इस विविधता और राष्ट्रीयता के आग्रह के कारण भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने किसी एक भाषा को राष्ट्र-भाषा का दर्जा देने कोशिश की। अंग्रेजों ने भाषा-विवादों को भी अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के तहत बढ़ावा दिया।

हिंदी और उर्दू की लड़ाई अंग्रेजों के भारत में आने के साथ शुरू होती है। अंग्रेजों द्वारा स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज द्वारा हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषा के रूप में स्थापित करने के बाद अदालतों और सरकारी दफ्तरों में फारसी लिपि लागू होने पर यह विभाजन पढ़े-लिखे उच्च वर्गों तक पहुंचा और लिपि-विवाद प्रारंभ हुआ। इस विवाद के पीछे अंग्रेजों द्वारा की शुरू की गई सरकारी नौकरियां, खुद को राष्ट्र के रूप में संगठित करने के क्रम में सांस्कृतिक स्तर पर समुदाय को परिभाषित करना, औपनिवेशिक सत्ता द्वारा भाषाओं को भी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति का हथियार बनाना आदि मुख्य कारण थे। भारतेंदु काल में प्रारंभ हुआ यह विवाद मूलत: नागरी और फारसी लिपि का विवाद था, जो अदालतों और सरकारी दफ्तरों के कामकाज की भाषा को लेकर शुरू हुआ। हिंदी का पक्ष आर्य समाज, दयानंद एंग्लो-वैदिक संस्थाएं, नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन आदि संस्थाओं द्वारा लिया जा रहा था तो सर सैयद अहमद खां, अंजुमन-ए-तरक्की उर्दू, मुसलिम लीग आदि द्वारा उर्दू का पक्ष लिया जा रहा था। हिंदी समर्थक पक्ष हिंदी को अधिक से अधिक संस्कृतनिष्ठ बना रहा था तो उर्दू समर्थक पक्ष उर्दू को अधिक से अधिक फारसीनिष्ठ बना रहा था। हिंदी और उर्दू के बीच का यह विवाद भारत की आजादी की लड़ाई के लिए प्रतिगामी भूमिका निभा रहा था। अंग्रेज ‘फूट डालने’ में कामयाब हो गए थे। यह समस्या भाषा तक सीमित न रह कर समुदायों तक पहुंच गई थी।

उस समय के राष्ट्रवादी नेताओं और प्रगतिशील-लोकतांत्रिक पक्षों द्वारा इस विवाद के समाधान के रूप में हिंदुस्तानी भाषा पर जोर दिया गया। महात्मा गांधी समेत कांग्रेस के कई नेताओं ने इसका समर्थन किया। प्रेमचंद और प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े लेखकों ने भी भाषा संबंधी विवादों का विरोध करते हुए लोकतांत्रिक दृष्टि से हिंदुस्तानी का महत्त्व स्वीकार किया। हालांकि यहां यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि उस समय के विमर्शों में हिंदुस्तानी की कोई एक निर्धारित परिभाषा नहीं थी, बल्कि इसका प्रसंगानुकूल अर्थ निकाला जाता था। कुछ लोग इसे हिंदी के अर्थ में प्रयुक्त करते थे, तो कुछ उर्दू के अर्थ में भी। कांग्रेस की पृष्ठभूमि के कारण हिंदुस्तानी के संदर्भ में अन्य पक्षों की अपेक्षा गांधी का पक्ष मजबूत रहा। गांधी हिंदुस्तानी को हिंदी और उर्दू की स्थानापन्न तो मानते ही थे, वे इसे राष्ट्रभाषा भी मानते थे, हालांकि वे भी हिंदुस्तानी के नाम और स्वरूप के बारे में निश्चित नहीं थे, समय के साथ उनकी हिंदुस्तानी की धारणा भी विकसित होती गई।

गांधी उर्दू-हिंदी विवाद के मद्देनजर ही राष्ट्रभाषा के प्रश्न को देख रहे थे, इसीलिए उन्होंने बीच का रास्ता निकालते हुए हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का प्रस्ताव रखा। उनके अनुसार ‘हिंदुस्तानी, वह भाषा है जिसे उत्तर हिंदुस्तान के शहरों और गांवों में हिंदू, मुसलमान आदि सब लोग बोलते हैं, समझते हैं और आपस के कारबार में बरतते हैं और जिसे नागरी और फारसी दोनों लिखावटों में लिखा-पढ़ा जाता है और जिसके साहित्यिक (अदबी) रूप आज हिंदी और उर्दू नाम से पहचाने जाते हैं।’ हालांकि गांधीजी की अवधारणा में तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, गुजराती, मराठी, ओड़िया, बांग्ला, पंजाबी, कश्मीरी, उत्तर-पूर्व में बोली जाने वाली भाषाओं के साथ-साथ उत्तर की कई सारी जनजातीय भाषाएं शामिल नहीं थीं, लेकिन भाषाई विवादों को सुलझाने का एक रास्ता वे तैयार कर रहे थे।

यह सच है कि हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर उनके अंतर्विरोध बहुत कुछ अस्पष्ट कर देते थे। कहीं वे हिंदी का समर्थन करते थे, तो कहीं हिंदी की नई परिभाषा बताते थे, जिसे वे हिंदुस्तानी की परिभाषा भी बताते थे। उदाहरण के लिए, गांधी ने एक जगह राष्ट्र-भाषा के लक्षण बताने के बाद कहा कि ‘हमें यह कबूल कर ही लेना होगा कि हिंदी भाषा में ये सब लक्षण हैं। हिंदी भाषा मैं उसे कहता हूं, जिसे उत्तर में हिंदू और मुसलमान बोलते हैं, और देवनागरी या उर्दू लिपि में लिखी जाती है।’ उन्होंने हिंदुस्तानी की परिभाषा भी इसी तरह से दी थी। इसका एक कारण यह हो सकता है कि ऐसा करके वे इन लोगों को हिंदुस्तानी के नजदीक लाना चाहते रहे हों। संभवत: इसी कारण हिंदी-हिन्दुस्तानी जैसे पद भी प्रचलित हुए थे। वैसे, गांधीजी के विचारों में इस तरह के अंतर्द्वन्द्व उनके अन्य मुद््दों पर व्यक्त विचारों में भी मिलते हैं। वस्तुत: उनके विचार वक्त के साथ विकसित होते रहे।

गांधी जिसे हिंदी-हिंदुस्तानी कहते थे, उसे राष्ट्रभाषा बनाने के लिए वे उसका पूरे भारत में प्रसार चाहते थे। इस उद््देश्य से उन्होंने दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर में अनेक संस्थाओं की स्थापना की। पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में इस भाषा का प्रचार उनके लिए विशेष रूप से आवश्यक था, इन भाषाओं के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं को वे किसी-न-किसी तरह से हिंदी या हिंदुस्तानी से संबद्ध मानते थे। इसलिए वे चाहते थे कि दक्षिण भारत की भाषाएं बोलने वाले राष्ट्रहित में राष्ट्रभाषा अर्थात हिंदी या हिंदुस्तानी सीखें। गांधीजी ने अपने प्रयासों से दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार का महती काम किया।

हम ऊपर इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि हिंदी-उर्दू विवाद मूलत: लिपि संबंधी विवाद का विस्तृत रूप है। गांधी के लिए भाषा के साथ-साथ लिपि का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण था। वैसे तो हिंदुस्तानी की परिभाषा देते हुए गांधी कहते हैं कि यह नागरी और फारसी दोनों लिपियों में लिखी जाएगी। लेकिन उनका यह विचार भी स्थायी नहीं था और वे अन्य जगह पर कहते हैं कि अंत में कोई एक लिपि विजयी होगी। उन्होंने लिखा कि- ‘लिपि की कुछ तकलीफ जरूर है। मुसलमान भाई अरबी लिपि में ही लिखेंगे, हिंदू बहुत करके नागरी लिपि में लिखेंगे। राष्ट्र में दोनों को स्थान मिलना चाहिए। अमलदारों को दोनों लिपियों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। इसमें कोई कठिनाई नहीं है। अंत में जिस लिपि में सरलता होगी, उसकी विजय होगी।’
यह गौरतलब है कि गांधीजी के भाषा संबंधी कुछ विचार हिंदी साहित्य सम्मेलन के विचारकों से मेल खाते हैं। वैसे, गांधी कई वर्षों तक सम्मेलन से जुड़े रहे, यहां तक कि उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशनों की अध्यक्षता भी की। लेकिन गांधी ने 1945 में हिंदुस्तानी और हिंदी के फर्क को समझ लिया और तब उन्होंने स्वयं द्वारा ‘सम्मेलन की भाषा और लिपि को पूरा राष्ट्रीय स्थान नहीं’ दे पाने के कारण सम्मेलन से हटने की इच्छा जाहिर की। तब टंडन ने 8 जून 1945 को जवाब देते हुए लिखा कि ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन और हिंदुस्तानी प्रचार सभा के कामों में कोई मौलिक विरोध मेरे विचार में नहीं है।… राष्ट्रीय दृष्टि से हिंदी का प्रचार वांछनीय है, यह तो आपका सिद्धांत है ही। आपके नए दृष्टिकोण के अनुसार उर्दू-शिक्षण का भी प्रचार होना चाहिए। यह काम पहले से भिन्न एक नया काम है, जिसका पिछले काम से कोई विरोध नहीं है।’ दरअसल, गांधी हिंदुस्तानी प्रचार सभा भी चलाते थे और साहित्य सम्मेलन से भी जुड़े थे।

हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी का यह विवाद असल में उत्तर भारत के शिक्षित वर्ग से संबंधित विवाद था, जिसे कांग्रेस के जरिये विस्तार मिला। इस विवाद के हल हो जाने से भारत की भाषा समस्या का समाधान नहीं होना था, क्योंकि यदि हिंदी की जगह हिंदुस्तानी राष्ट्रभाषा या राजभाषा बन जाती तो भी उसकी स्थिति आज हिंदी की स्थिति से बहुत व्यापक न होती। लेकिन यह जरूर है कि अगर हिंदुस्तानी की अवधारणा को व्यापक स्वीकृति मिलती तो हिंदी और उर्दू के बीच का विभाजन न रहता और हिंदी-उर्दू के झगड़े से हिंदू-मुसलिम समुदायों के बीच कट्टरता न फैलती, साझी संस्कृति और साझी विरासत का विभाजन न होता तथा लोकतांत्रिक व समावेशी मूल्यों की स्वीकृति होती। यह भी कोई कम उपलब्धि न होती और इस संदर्भ में गांधी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

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