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अमेरिका में नवाज शरीफ की नाकामी

पता नहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके रणनीतिकारों को इस स्थिति की उम्मीद थी या नहीं कि अमेरिका से उनको बुलावा कोई स्वागत-सत्कार या संबंधों को सकारात्मक नया..

Author नई दिल्ली | Published on: October 27, 2015 6:02 PM

पता नहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके रणनीतिकारों को इस स्थिति की उम्मीद थी या नहीं कि अमेरिका से उनको बुलावा कोई स्वागत-सत्कार या संबंधों को सकारात्मक नया आयाम देने के लिए नहीं, बल्कि कुछ मामलों पर खरी-खरी बात करने के लिए आया है। इतिहास में ऐसे कम अवसर होंगे जब किसी नेता की दूसरे देश की यात्रा इतनी विफल हुई होगी। वास्तव में अमेरिकी यात्रा के दौरान जो कुछ हुआ वह सब पाकिस्तान की उम्मीदों के प्रतिकूल था। पाकिस्तानी प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आ रही टिप्पणियों को देखें तो उनकी ऐसी लानत-मलानत हो रही है मानो वे पाकिस्तान की इज्जत गंवा कर आए हैं।

इसमें थोड़ी अतिशयोक्ति हो सकती है, पर नवाज शरीफ और उनके सहयोगी वहां ऐसे लाचार अतिथि की तरह थे जिनकी कोई बात या अनुरोध अमेरिका मानने को तैयार नहीं था और अपनी ओर से यह बता रहा था कि आपको क्या करना है और क्या करना चाहिए। बताने का तरीका ऐसा था कि आपके पास उसमें न कहने का विकल्प नहीं और अगर न कहते हैं तो फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिए। हालांकि शरीफ अमेरिका से एफ-16 विमान पाने में कामयाब रहे, लेकिन वह एक रक्षा-सौदे के तहत था। जब नवाज शरीफ और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन कैरी से मिल रहे थे तो उन्हें कैरी के गुस्से का सामना करना पड़ा।

हालांकि नवाज शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मुलाकात के बाद वाइट हाउस ने एक बयान में कहा कि शरीफ की यात्रा अमेरिका-पाक के स्थायी रिश्तों को रोशन करेगी और आपसी हितों के मुद्दों पर दोनों देशों के सहयोग को मजबूत बनाने का अवसर देगी। इसमें आर्थिक विकास, व्यापार और निवेश, स्वच्छ ऊर्जा, वैश्विक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, नाभिकीय सुरक्षा, आतंकवाद-निरोध और क्षेत्रीय स्थायित्व शामिल हैं। लेकिन यह केवल शब्दों की औपचारिकता थी। एक-एक पहलू का विश्लेषण करें तो निष्कर्ष कुछ और सामने आएगा।

ओबामा के निमंत्रण पर शरीफ वहां गए थे। संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दौरान भी यह बैठक हो सकती थी, लेकिन अमेरिका ने रणनीति के तहत इसे नहीं होने दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शिखर वार्ता की। अभी अमेरिका ने शरीफ की यात्रा को द्विपक्षीय राजनयिक यात्रा का ओहदा दिया ही नहीं। सबसे बड़ा धक्का तो यही था। जब ओबामा से बातचीत के बाद शरीफ उनके साथ प्रेसवार्ता कर रहे थे, उनके हाव-भाव बहुत कुछ बता रहे थे। उनके हाथ में एक पुर्जा दिया हुआ था जिसे वे कैमरे की नजर बचा कर पढ़ने की कोशिश करते आसानी से देखे जा सकते थे। यह सामान्य द्विपक्षीय संबंधों का प्रमाण नहीं था।

जॉन कैरी और ओबामा दोनों ने आतंकवाद पर दोहरे रवैये और नाभिकीय हथियार के विस्तार को लेकर नवाज को खरी-खोटी सुनाई। साफ कहा गया कि आपको हक्कानी समूह के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी, मुंबई हमले के लिए जिम्मेवार लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी, जिन आतंकवादियों के नाम चिह्नित हैं उनको कानून के शिकंजे में लाना होगा। इसमें कोई किंतु-परंतु नहीं चलेगा। पाकिस्तान ने इनके खिलाफ कार्रवाई की प्रतिबद्धता जताई है। वाइट हाउस के प्रेस उप-सचिव एरिक शुल्ज ने कहा कि हम इस बात को लेकर पाकिस्तान सरकार के सामने बहुत स्पष्ट रहे हैं कि इस प्रतिबद्धता के क्रियान्वयन के लिए पाकिस्तान को सभी आतंकवादी समूहों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करनी होगी।

संयुक्त बयान में बताया गया है कि शरीफ ने ओबामा को लश्कर-ए-तैयबा और उसके सहयोगी संगठनों समेत संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवादी घोषित लोगों और संगठनों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप प्रभावी कार्रवाई करने के पाकिस्तान के संकल्प से अवगत कराया। बैठक के बाद शरीफ ने बताया कि उनकी सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह पूछे जाने पर कि क्या वे लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अपनी प्रतिबद्धता पूरी करेंगे, शरीफ ने कहा कि आतंकवाद के सभी तत्त्वों के खिलाफ कार्रवाई करना हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। ओबामा ने शरीफ पर लश्कर के खिलाफ कार्रवाई की प्रतिबद्धता जाहिर करने को लेकर दबाव बनाया तो आतंकवाद के एजेंडे पर शरीफ की एक न चली।

नवाज शरीफ की पिछले एक वर्ष से पूरी रणनीति कश्मीर मसले के अंतरराष्ट्रीयकरण की है। शरीफ ने सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर बॉब कोरकर और अन्य सदस्यों से कहा कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का मुख्य कारण है और इसके समाधान और भारत-पाक वार्ता प्रक्रिया में गतिरोध दूर करने के लिए तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता है जो अमेरिका कर सकता है। अगर भारत तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार नहीं करता, अगर कोई द्विपक्षीय वार्ता नहीं होती तो गतिरोध बना रहेगा। अमेरिका का जवाब था कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच मसलों को सुलझाने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि वे सीधे बातचीत करें। अमेरिका ने साफ किया कि उसकी नीति में बदलाव नहीं हुआ है।

अमेरिकी प्रवक्ता ने कहा कि हमने अमेरिका की इस प्रतिबद्धता की पुष्टि की कि हम तभी शामिल होंगे जब भारत और पाकिस्तान चाहेंगे। भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता किस प्रकार की होनी चाहिए, किन शर्तों पर होनी चाहिए या उसके लिए किसी प्रकार की सिफारिश करना, इस प्रकार की कोशिशें करना अमेरिका की नीति नहीं है। उन्होंने कहा कि हम केवल यह उम्मीद करते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता हो, संबंध सामान्य हों और वे क्षेत्र में शांति की ओर मिल कर कदम बढ़ाएं तथा अपने-अपने लोगों की समृद्धि के लिए काम करें। तो यहां भी विफलता।

अब आइए नाभिकीय करार संबंधी खबरों पर। पाकिस्तान अमेरिका से भारत की तरह 123 असैन्य नाभिकीय समझौते के लिए आग्रह करता रहा है। भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते की तरह असैन्य नाभिकीय समझौते संबंधी समाचार पर अमेरिकी प्रवक्ता ने कहा कि मुझे स्पष्ट रूप से यह बताने दीजिए कि हमने पाकिस्तान के साथ 123 समझौते पर कोई वार्ता नहीं की है और न ही हम असैन्य नाभिकीय निर्यात मुहैया कराने के लिए नाभिकीय आपूर्ति समूह में पाकिस्तान के लिए छूट की मांग करेंगे। पाकिस्तान के साथ 123 समझौता किए जाने के संबंध में मीडिया की अटकलें पूरी तरह गलत हैं।

हां, (उनके अनुसार) पाकिस्तान के साथ नाभिकीय हथियारों के विस्तार और उनकी सुरक्षा के मसले पर आवश्यक गंभीर बातचीत हुई जो आगे भी होगी। पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम और इस कार्यक्रम के संबंध में विभिन्न गतिविधियों को लेकर हम लंबे समय से उससे वार्ता कर रहे हैं।

हम विशेष रूप से चिंतित हैं और हमने पाकिस्तान को अपनी चिंताओं के बारे में बताया है कि नाभिकीय हथियार संपन्न सभी देशों के लिए इन हथियारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और सामरिक स्थिरता को प्रोत्साहित करने के लिए हर वह काम करना जरूरी है जो वह कर सकता है। इसलिए हम पाकिस्तान के साथ वार्ता जारी रखेंगे। पाकिस्तान उसके नाभिकीय शस्त्रागार को उसकी जमीन से काम कर रहे आतंकवादी समूहों के हाथ पड़ सकने के खतरों से भलीभांति परिचित है, जिनमें उसके सैन्य प्रतिष्ठानों के सभी पहलुओं को खतरा भी शामिल है। तो कहां असैन्य परमाणु समझौते की कल्पना और कहां एटमी हथियारों की सुरक्षा की गारंटी मांगना- दोनों में कितना अंतर है!

पाकिस्तान का चौथा एजेंडा था, यह साबित करना कि भारत की एजेंसियां उसके यहां आतंकवादी गतिविधियां चला रही हैं, बलूचिस्तान में अलगावाद को हर तरह की मदद दे रही हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने अमेरिकी विदेशमंत्री कैरी को इससे संबंधित तीन डोजियर सौंपे। ओबामा प्रशासन ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान के इस कदम का संज्ञान ही नहीं लिया। ध्यान दीजिए, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि वे पाकिस्तान की ओर से सौंपे गए किसी डोजियर के अमेरिका द्वारा स्वीकार किए जाने से अवगत नहीं हैं। हमारा मानना है कि भारत और पाकिस्तान को राजनीतिक सहयोग से लाभ होगा। हम तनाव कम करने के लिए दोनों देशों को सीधे वार्ता में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। अमेरिकी विदेशमंत्री ने भी रेखांकित किया कि मसलों को सुलझाने का सबसे बेहतर तरीका दोनों पड़ोसियों के बीच सीधी बातचीत है। हम ऐसी वार्ता को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। हमें ये डोजियर अभी मिले हैं और इस समय उनकी विषयवस्तु पर हम कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।

अब आप स्वयं निष्कर्ष निकालिए कि भारत पर आरोप को लेकर जिस डोजियर को वे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रहे थे उसे अमेरिका ने अपने किसी अलमारी में रखना भी स्वीकार किया या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। कश्मीर पर हस्तक्षेप के मंसूबे को सहयोग मिला नहीं, आतंकवाद पर दबाव बढ़ा, कैरी के तो गुस्से तक का सामना करना पड़ा और सबसे बढ़ कर सामान्य द्विपक्षीय यात्रा तक का दर्जा नहीं मिला। यूएस इंस्टीच्यूट के भाषण के दौरान तो ‘फ्री बलूचिस्तान’ तथा ‘तुम लादेन के दोस्त हो’ के नारे ने उनका मजा और किरकिरा कर दिया। नवाज शरीफ अगर इस सबके बावजूद अपनी सरकार के व्यवहार में सुधार नहीं करते तो फिर हम-आप क्या कर सकते हैं। वे करें भी तो कैसे, सेना उनके बस में तो है नहीं।  (अवधेश कुमार)

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