कुदरत का कहर और सबक

जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए शहरी और ग्रामीण विकास नीति को अलग-अलग करना होगा।

जलवायु परिवर्तन का दिखने लगा है रौद्र रूप। फाइल फोटो।

अतुल कनक

जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए शहरी और ग्रामीण विकास नीति को अलग-अलग करना होगा। पहले भी वैज्ञानिक इस बात पर जोर देते आए हैं कि भारत में भूमि उपयोग की नीतियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

जाते मानसून ने इस बार केरल और उत्तराखंड सहित कई जगह जिस तरह का रौद्र रूप दिखाया, उसने सामान्य जन को भी यह सोचने पर विवश कर दिया है कि यह प्रकृति का प्रगल्भ प्रकोप मात्र था या प्रलय की संभावनाओं की आहट? उत्तराखंड और केरल भौगोलिक दृष्टि से भारत भूमि की दो विपरीत दिशाओं में स्थित हैं। यदि परस्पर इतनी दूर स्थित दो राज्यों में बारिश अफरा-तफरी मचाती है, वह भी आधा अक्तूबर गुजर जाने के बाद, तो यह सोचने पर विवश होना ही पड़ेगा कि कहीं जलवायु में ऐसे परिवर्तन तो नहीं हो रहे जो आने वाले समय में सामान्यजन के लिए इससे भी अधिक कठिन हालात उत्पन्न कर दें? यह आशंका इसलिए भी बलवती होने लगी है क्योंकि आंकड़ों की दृष्टि से पूरे मौसम में जितनी बारिश हुई है, उसे भारतीय प्रायद्वीप के लिए असहज या अपूर्व नहीं कहा जा सकता।

जलवायु अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि आंकड़ों के अनुसार बारिश अधिक नहीं हो रही है। यों भी इस मौसम में अच्छी या अधिक बारिश होने को असामान्य नहीं कहा जा सकता है। लेकिन वातावरण में बढ़ी हुई आर्द्रता कई बार अतिवृष्टि जैसी स्थिति कायम कर देती है। इस तथ्य को समझने के लिए हमें यह बात समझनी होगी कि पिछले एक सौ तीस वर्षों में धरती का औसत तापमान करीब 1.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। इतना तापमान बढ़ने के कारण जब धरती की सतह पर मौजूद जल स्रोतों से वाष्पीकरण होता है तो वातावरण में नौ से दस प्रतिशत तक आर्द्रता यानी नमी बढ़ जाती है। यह नमी हवाओं में टिकी रहती है। जब लंबे समय तक बारिश नहीं होती तो हवा उस नमी को धारण किए रहती है और बारिश प्रारंभ होने पर संपूर्ण संचित नमी को कुछ ही क्षणों में छोड़ देती है। यही कारण है कि इन दिनों बादल फटने जैसी स्थितियां बार-बार बन रही हैं।

जलवायु अध्ययन से जुड़े अनेक वैज्ञानिकों का कहना है कि वस्तुत: इन दिनों हम जिस तेज बरसात को बादल फटने का परिणाम समझ लेते हैं, वस्तुत: वह तेज बरसात हवा में संचित नमी के बारिश के पानी में घुल जाने के कारण होती है। पूरे मौसम में होने वाली बारिश यदि कुछ ही दिनों में बरस जाए तो आंकड़े बारिश की कुल मात्रा सामान्य दिखाऐंगे ही, लेकिन जिन इलाकों में भीषण बारिश होती है, उन इलाकों के लोग समझ ही नहीं पाते कि उन पर कुदरत का यह कहर क्यों टूटा।

पृथ्वी के तापमान में वृद्धि के कारण हवा में नमी बढ़ने के मूल में कार्बन उत्सर्जन है। सारी दुनिया अब कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सकारात्मक योजनाएं लागू करने पर बल दे रही है। लेकिन कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण पाना इतना आसान भी नहीं है। बिजली के उपभोग से लेकर परिवहन तक में मनुष्य प्रकृति के आंचल में अनियंत्रित कार्बन छोड़ रहा है और यह कार्बन उत्सर्जन दुनिया भर में जलवायु संकट का कारण बन रहा है। क्या कोई आसानी से इस तथ्य पर विश्वास कर सकेगा कि जब हम आनलाइन किसी गाने को सुनते हैं, तब भी वातावरण को अवांछित कार्बन उत्सर्जन सौंप देते हैं। इंटरनेट से अपने फोन पर जिस फाइल को डाउनलोड किया जाता है या सीधा लिया जाता है तो वह फाइल किसी सर्वर में सुरक्षित रहती है। सर्वर को ठंडा करने के लिए और उसे चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है और अनियंत्रित विद्युत उपभोग भी तो दुनिया में उस कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है, जिसके कारण दुनिया भर के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद चिंतित हो रहे हैं।

हाल में केरल और उसके तुरंत बाद उत्तराखंड में जो बारिश हुई, उसमें भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाओं ने आबादी के एक बड़े हिस्से को अस्त-व्यस्त कर दिया। वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण ही पिछले कुछ सालों में भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। जलवायु परिवर्तन अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डा. राक्सी मैथ्यू ने एक जगह कहा भी है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए शहरी और ग्रामीण विकास नीति को अलग-अलग करना होगा। पहले भी वैज्ञानिक इस बात पर जोर देते आए हैं कि भारत में भूमि उपयोग की नीतियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। हमें ऐसी नीतियों को अपनाना होगा जो जलवायु परिवर्तन की अनियमितताओं को सामना कर सकें।

दरअसल, पिछले कुछ सालों में भारत के विभिन्न शहरों में आई बाढ़ों की स्थिति का आकलन किया जाए तो यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आएगा कि आसमान से बरसते समय पानी ने उतना तांडव नहीं किया, जितना रौद्र रूप बस्तियों या सड़कों पर पानी जमा होने के कारण देखने में आया। कारण स्पष्ट है। हमने अपने विकास को इस तरह नियोजित किया कि बारिश के पानी की निकासी के परंपरागत मार्ग तक बंद कर दिए। दक्षिण पूर्वी राजस्थान के कोटा शहर के उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है। कोटा शहर उस हाड़ौती के पठार के सबसे निचले हिस्से में बसा है, जो हाड़ौती का पठार काल के किसी खंड में प्रसिद्ध गोंडवाना पठार का हिस्सा रहा था।

स्वाभाविक तौर पर पठार के ऊपरी हिस्से में बरसने वाला पानी तेजी से नीचे की ओर आता था। इसे देखते हुए सन 1346 ईस्वी में बूंदी के राजकुमार धीरदेह ने इस पठार के विभिन्न हिस्सों में तेरह तालाब इस तरह बनवाए कि बस्तियों की ओर बहते पानी को अपने विस्तार में सहेज सकें। लेकिन आजादी के बाद विकास के नाम पर ये तालाब अतिक्रमण के शिकार होते चले गए और वहां बाजार, बस्तियां बसती चली गर्इं। इससे बरसात के पानी के प्रवाह अवरुद्ध हो गया तो पानी ने बस्तियों में तांडव मचाना शुरू कर दिया। यही सब पहाड़ी इलाकों में हुआ है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की घटनाओं की बाद जो जल प्रलय देखने को मिलने लगा है, उसके मूल में भी पहाड़ों पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण है। केरल में नदियों के किनारे बनी इमारतें भी जलधारा में बह जाने और तटीय जमीन धंसने की घटनाएं भी इसीलिए हो रही हैं कि हम प्राकृतिक स्रोतों का रास्ता रोकने लगे हैं।

जलवायु पर काम कर रहे वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि केरल या उत्तराखंड जैसी प्राकृतिक आपदाएं दुनिया के किसी भी हिस्से को त्रस्त कर सकती हैं, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के देशों को जहां जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा है और अनियंत्रित तरीके से जमीनों को अतिक्रमित करने की प्रवृत्ति आम है। इसलिए नीति नियंताओं को सजगता और दूरदृष्टि के साथ ऐसी योजनाएं लानी होंगी जिनके कारण पानी के प्रवाह का मार्ग अवरूद्ध न हो और बरसात में एकत्र हुआ पानी सहजता से निकास पा सके। जलवायु परिवर्तन के कारण उपस्थित होने वाली आपात स्थितियों से बचने के लिए हमें उन स्थितियों पर भी नियंत्रण स्थापित करना होगा जो अवांछित जलवायु परिवर्तन की कारक हैं। कार्बन उत्सर्जन उनमें प्रमुख है। पेरिस समझौते का सहभागी होने के कारण भारत को यों भी अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य होने तक की स्थिति पर लाना है। यह उल्लेखनीय है कि दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद कार्बन उत्सर्जन की दृष्टि से भारत तीसरे नंबर पर है। कहा जा सकता है कि केरल या उत्तराखंड की घटनाओं के बहाने प्रकृति ने हमें आगाह किया है कि हम पारिस्थिकी के प्रति संवेदनशील हों और जलवायु परिवर्तन के प्रति सजग।

पढें राजनीति समाचार (Politics News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

Next Story
प्रधानमंत्री का बैंक
अपडेट