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किसानों की फिक्र किसे है

बाईस मार्च को सरकारी आकाशवाणी पर अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में एकजुट विपक्ष द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून-2013 के संशोधनों पर उठाई गई आपत्तियों को ‘झूठ का पुलिंदा’ कहने के बाद इसे किसानों के हितों को हानि पहुंचाने की साजिश करार दिया। यह इकतरफा सरकारी प्रचार है, जहां विपक्ष […]

बाईस मार्च को सरकारी आकाशवाणी पर अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में एकजुट विपक्ष द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून-2013 के संशोधनों पर उठाई गई आपत्तियों को ‘झूठ का पुलिंदा’ कहने के बाद इसे किसानों के हितों को हानि पहुंचाने की साजिश करार दिया।

यह इकतरफा सरकारी प्रचार है, जहां विपक्ष को किसानों के मन की बात रखने का कोई मंच उपलब्ध नहीं कराया गया। यहां बिना किसानों से पूछे, केवल सरकार इकतरफा ढंग से तय कर रही है कि किसानों के ‘हित’ क्या हैं, मानो उन्हें इसका कोई इल्म न हो। यह कुछ-कुछ ऐसा है मानो किसानों को कोई यह समझाए कि भूख क्या होती है और कि वे आत्महत्या क्यों करते हैं।

मोदी ने किसानों को यह नहीं बताया कि इन आत्महत्याओं को रोकने के लिए उनकी सरकार क्या कदम उठाने जा रही है। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री को यह पता नहीं है कि इस वर्ष के शुरू के पैंतालीस दिनों में केवल मराठवाड़ा में तिरानबे किसानों ने आत्महत्या की है। पिछले वर्ष यहां 569 किसानों ने आत्महत्या की थी। पश्चिम बंगाल में तो ममता बनर्जी आत्महत्याओं की खबर को सिरे से नकार रही हैं, जबकि इस वर्ष केवल बर्द्धमान जिले में एक सौ छह किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह सिलसिला रुकता नजर नहीं आ रहा।

जब तमाम रास्ते किसानों के लिए बंद हो जाते हैं तभी वे यह बेहद दुखद कदम उठाते हैं। पर सरकारी मशीनरी किसानों की सुध लेने के बजाय आंकड़ों की हेरफेर से यह दिखाने की कोशिश करती है कि आत्महत्या करने वालों में ‘गैर किसान’ कितने हैं। हर खेती करने वाले के पास जमीन का पट््टा नहीं होता, प्राय: गांवों में खेतिहर-औरतों के नाम जमीन नहीं होती। इस तरह ऐसे लोग जो आत्महत्या करते हैं, उन्हें ‘किसानों की आत्महत्या’ के आंकड़ों में न गिन कर इस संख्या को सरकारी फाइलों में कम करके दिखाया जाता है। इस तरह सरकार सुप्रीम कोर्ट तक को गुमराह करने का प्रयास करती है। एक सरकारी प्रवक्ता ने हाल ही में सर्वोच्च अदालत में कहा कि 2009 से किसानों की आत्महत्याएं लगातार कम होती गई हैं।

हाल में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि देश के कृषि आधारित परिवारों में से बावन प्रतिशत कर्ज के बोझ तले दबे हैं। जन-धन योजना जैसी तमाम लंबी-चौड़ी बातों के बावजूद, आज स्थिति यह है कि छोटे किसानों को सस्ता ऋण देने की कोई सरकारी योजना कारगर सिद्ध नहीं हुई और उन्हें स्थानीय महाजनों, आढ़तियों और व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो बड़ी ऊंची दरों पर कर्ज देते हैं।

खेती अब घाटे का सौदा बन कर रह गई है। गन्ना उत्पादकतो हर वर्ष अपना दुखड़ा रोते हैं, उन्हें मिल मालिक उनका बकाया नहीं देते। दूसरे, राज्य सरकारें भी उचित मूल्य निर्धारित नहीं करतीं। अन्य कई फसलों में तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव गिरने से समस्या बद से बदतर होती जाती है। किसानों की तकलीफ इससे और बढ़ जाती है, जब सरकार आए दिन डीजल, खाद आदि पर सबसिडी कम करने के संकेत देती रहती है, जबकि वह ‘समर्थन मूल्य’ बढ़ाने में आनाकानी करती है।

भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में लिखा था कि वह ‘किसानों को उनकी लागत पर कम से कम पचास प्रतिशत लाभ मिलना सुनिश्चित’ करेगी। और कृषि उत्पाद वितरण के लिए रेल नेटवर्क बनाएगी। पर आज स्थिति यह है कि किसान दो रुपए किलो आलू बेचने को मजबूर है फिर भी कोई नहीं ले रहा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों ने पिछले चुनावों में भाजपा को जम कर वोट दिया था, आज उन्हें लग रहा है जैसे उनके साथ धोखा हुआ है। वहां प्राय: हर गन्ना किसान के सिर पर आठ लाख रुपए कर्ज का बोझ है। सीएसडीएस ने कुछ माह पूर्व अठारह राज्यों में किसानों का विस्तृत सर्वेक्षण किया था जिसमें पाया गया कि आर्थिक तकलीफों के कारण एक तिहाई किसान चाहते हैं कि उनकी औलाद खेती में अपना जीवन बरबाद न करे। दस में छह किसान खेती छोड़ने को तैयार हैं, बशर्ते उन्हें वैकल्पिक रोजगार मिले।

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में लिखा था, ‘कृषि भारत की आर्थिक वृद्धि का इंजन है और सबसे बड़ा रोजगारदाता भी है और भाजपा कृषि-विकास, किसानों की आय में बढ़ोतरी और ग्रामीण विकास को सबसे अधिक अहमियत देती है।’ पर मोदी सरकार ने फसलों के जो समर्थन मूल्य घोषित किए वे यूपीए सरकार द्वारा दिए गए समर्थन मूल्य से भी कम हैं।

इसके अलावा सरकार ने किसानों के जख्मों पर नमक उस नीतिगत फैसले से भी छिड़का जिसके अंतर्गत राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया गया कि वे केंद्र सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य से अधिक नहीं दे सकतीं। 2015 के बजट में केंद्र द्वारा संचालित योजनाओं जैसे कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, ग्रामीण भंडारण योजना आदि में कुल निर्धारित राशि में साढ़े पांच हजार करोड़ रुपए की कटौती कर दी गई है।

किसानों के नाम पर आज तक जितनी भी सरकारी योजनाएं घोषित की गई हैं, उन सबमें सबसे हास्यास्पद मोदी सरकार की ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ है। इसका तथाकथित लक्ष्य ‘हर खेत को पानी’ पहुंचाना है और इसके लिए मोदी सरकार ने केवल एक हजार करोड़ रुपयों का प्रावधान रखा है और इस दिखावटी प्रेम को भी अभी हकीकत में नहीं उतारा गया है। वित्त मंत्रालय ने संसद में स्वीकार किया है कि इसके लिए संदर्भ-नोट तैयार किया जा रहा है।

मोदीजी क्या यह नहीं जानते कि पिछले तीन वर्षों में फसलों की खरीद के जो मूल्य बढ़े हैं, उससे कहीं ज्यादा उत्पादन की लागत बढ़ी है। कृषि और किसान दोनों संकट में हैं, पर विडंबना यह है कि उपरोक्त तमाम समस्याओं का हल मोदीजी ने किसानों को भूमिहीन बनाने के लिए प्रस्तावित नए कानून से दिया है। दरअसल, उन्हें किसानों के कर्ज से अधिक अपना कर्ज उतारने की फिक्र है। आखिरकार जिन लोगों ने उनके चुनाव अभियान में दिल खोल कर अपना धन लगाया था, उनका दबाव होना लाजमी है। पहले से ही बदहाल भारतीय किसान की कीमत पर ‘घरेलू और विदेशी’ दोनों तरह के कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने में उनके उतावलेपन का नतीजा है नया भूमि अधिग्रहण विधेयक।

सभी राजनीतिक दलों की रजामंदी से पारित किए गए भूमि अधिग्रहण कानून-2013 को मोदी सरकार ने छह महीने के अंदर ही अध्यादेश द्वारा पलट दिया। इस कानून में यह प्रावधान था कि जिस क्षेत्र में जमीन का अधिग्रहण किया जाना है, पहले वहां की आबादी पर पड़ने वाले प्रभावों का सामाजिक आकलन किया जाए।

अधिसूचित क्षेत्र में सत्तर प्रतिशत किसानों की सहमति लेना अनिवार्य था, मुआवजा बाजार दर से चार गुना देने का प्रावधान था। इसके बरक्स नया विधेयक पूंजीपति घरानों को लूट की खुली छूट की गारंटी देता है। कॉरपोरेट घरानों से मोदी सरकार का याराना जगजाहिर है। यह महज संयोग नहीं है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इतने कम समय में अडानी परिवार की संपत्ति में पचीस हजार करोड़ रुपयों का इजाफा हुआ है।

यह एकदम स्पष्ट है कि किसानों के लिए नहीं, चंद अमीर घरानों को अपनी पूंजी बेतहाशा बढ़ाने के लिए ही नया भूमि अधिग्रहण विधेयक लाया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने किसानों से ‘विकास संबंधी जरूरतों’ को समझने की बात तो की, पर यह बात छिपा गए कि इसकी आड़ में किसानों से उपजाऊ जमीन भी छीनी जाएगी। अगर राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य राजमार्गों और रेलवे लाइनों के दोनों तरफ विकास के नाम पर एक किलोमीटर जमीन अधिग्रहीत की जाती है तो यह देश की कुल कृषियोग्य भूमि का लगभग बत्तीस प्रतिशत बैठेगी।

वर्ष 2013 के कानून में यह प्रावधान था कि अगर अधिग्रहीत जमीन का इस्तेमाल सरकार पांच वर्षों तक न कर पाए तो जमीन वापस उसके मूल मालिक को लौटा दी जाएगी। इसे अब संशोधित कर दिया गया है। मोदी सरकार के मंत्री ने राज्यसभा में हाल ही में सूचित किया कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) के लिए अधिग्रहीत जमीन में से करीब आधी जमीन का कोई भी इस्तेमाल पांच साल बीत जाने के बाद भी नहीं हुआ है।

यमुना एक्सप्रेस-वे के निर्माण के लिए बहुत ज्यादा जमीन अधिग्रहीत कर ली गई थी, बाद में उसी जमीन को एक बड़े बिल्डर जेपी गु्रप को सौंप दिया गया। ऐसे कई तथ्यों को मोदी ने किसानों से ‘मन की बात’ में छिपा लिया।

देश की एक सौ बीस करोड़ जनता भी जानती है कि अगर किसानों ने खेती करना बंद कर दिया तो उसका जीना मुहाल हो जाएगा। इसलिए यह मुद््दा किसानों तक सीमित नहीं है। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में खेती का हिस्सा घट कर तेरह फीसद तक आ गया है। आज देश की सबसे पहली जरूरत खेती को पटरी पर लाने की होनी चाहिए, न कि एक किसान परिवार में एक नौकरी देने का प्रलोभन देकर उससे जमीन छीनने की।

खेती को बचाना आज देश को बचाने के समान है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि मोदी सरकार मानने को तैयार नहीं कि कृषि संकट में है और किसान मौत के कगार पर हैं। उलटे भाजपा ने नए भूमि अधिग्रहण विधेयक पर सख्त तेवर अपनाए हैं।

पार्टी की दो दिनों की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद निर्मला सीतारमण से जब यह पूछा गया कि क्या कार्यकारिणी के सदस्यों ने भूमि विधेयक के किसी भी पहलू पर चिंता जताई है तो उनका जवाब था कि अगर कोई चिंता है तो वह विपक्ष के ‘दुष्प्रचार अभियान’ को लेकर है। मोदी सरकार, खेती और किसानों की सुध लेने के बजाय मीडिया द्वारा यह प्रचारित करने की आकर्षक योजना बनाने में लगी है कि साधारण जनता, जिसमें किसान शामिल हैं, को जोर-शोर से बताया जाए कि उसके ‘अच्छे दिन’ आ चुके हैं, पर उसे इसका पता नहीं है।

अभी मोदी सरकार के कार्यकाल का एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ, जनता यह कहने लगी है कि इससे अच्छे तो हमारे ‘बुरे दिन’ थे!

अजेय कुमार

 

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