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अतार्किक सुधारों के परिसर

आज अगर कोई एक मुद्दा चुनना हो, जिस पर मोदी सरकार और यूपीए सरकार के दृष्टिकोण में रत्ती भर फर्क न हो, तो वह है उनकी आर्थिक नीति। आर्थिक नीति की समानता का ही परिणाम है कि शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा में परिवर्तन की दिशा समान है। मोदी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में न केवल […]

Author July 21, 2015 08:34 am

आज अगर कोई एक मुद्दा चुनना हो, जिस पर मोदी सरकार और यूपीए सरकार के दृष्टिकोण में रत्ती भर फर्क न हो, तो वह है उनकी आर्थिक नीति। आर्थिक नीति की समानता का ही परिणाम है कि शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा में परिवर्तन की दिशा समान है।

मोदी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में न केवल यूपीए सरकार द्वारा लाए गए परिवर्तनों से सहमत है, बल्कि उससे भी अधिक तेजी से उसके व्यापारीकरण, केंद्रीकरण और भगवाकरण की ओर अग्रसर है। इसीलिए बिड़ला-अंबानी समिति, सैम पित्रोदा की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, यशपाल समिति की रिपोर्ट आदि के निष्कर्षों और विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली (च्वाइस बेस्ड के्रडिट सिस्टम) और कौशल-आधारित पाठ्यक्रमों के लिए दिए जा रहे दिशा-निर्देशों के बीच एक सामान्य कड़ी दिखती है।

न केवल केंद्र सरकार, बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों की उच्च शिक्षा संबंधी नीतियों में लगभग एक सहमति बनी है कि सार्वजनिक धन से चल रहे उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता को सिलसिलेवार ढंग से नष्ट किया जाए, ताकि निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सके। गौरतलब है कि निजी क्षेत्र में पहले से ही दाखिले का प्रतिशत अड़सठ है, जबकि सार्वजनिक अनुदान से चल रही संस्थाओं में केवल बत्तीस प्रतिशत।

विश्व पैमाने पर इन तथाकथित अकादमिक सुधारों का संबंध सीधे-सीधे निजी और विदेशी पूंजी के लाभ से जुड़ा है। इसके लिए जरूरी है कि देश में जो भी शिक्षा दी जाए, उसमें एकरूपता हो। विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली (सीबीसीएस) विद्यार्थियों को निर्बाध ढंग से उच्च शिक्षण संस्थान बदलने की सुविधा प्रदान करती है और इसमें विद्यार्थियों द्वारा हासिल क्रेडिट का स्थानांतरण संभव होगा।

भारत सरकार दस वर्ष पहले ही अगस्त 2005 में दोहा चक्र की व्यापार संबंधी वार्ता में उच्च शिक्षा में ‘बाजार की पहुंच’ के लिए अपनी सहर्ष स्वीकृति दे चुकी थी, पर इसे अमली रूप इसलिए नहीं दिया जा सका कि इन वर्षों में ये व्यापार वार्ताएं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकीं। पर अब कहा जा रहा है कि इसी जुलाई से विश्व व्यापार संगठन में व्यापार वार्ताओं की प्रक्रिया को तेज किया जाएगा और इस वर्ष 15 से 18 दिसंबर को नैरोबी में होने जा रही दसवीं अंतरराष्ट्रीय मंत्री-स्तरीय बैठक में सफलतापूर्वक किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुंचा जाएगा।

विश्व व्यापार संगठन के नियमों से सहमत होने का अर्थ यह होगा कि भारत सरकार अनिवार्य रूप से निजी और विदेशी खिलाड़ियों को वही सुविधाएं और मदद मुहैया कराएगी, जो वह अपने सार्वजनिक संस्थानों को देती है। इसका नतीजा यह होगा कि सार्वजनिक शिक्षण संस्थान भी व्यावसायिकता की होड़ में शामिल होने को मजबूर होंगे। निजी संस्थान बच्चों से अधिक फीस झाड़ने के लिए स्वतंत्र होंगे, बेशक उन्हें अनुदान सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों के बराबर मिलेगा। संभव है निजी कंपनियों के दबाव में सरकार निजी संस्थानों को अधिक राशि मुहैया कराने लगे।

उच्च शिक्षण संस्थानों को दिए जाने वाले अनुदान को राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद, जो कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का स्वायत्त संस्थान है, द्वारा गे्रडिंग से जोड़ दिया गया है। कोई संस्थान अगर इस पर खरा नहीं उतरता तो उसे सरकारी अनुदान नहीं दिया जाएगा। यह वैश्विक वित्तीय संस्थानों के दबाव के कारण किया गया है, ताकि निजी संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा सके।

सात जुलाई, 2015 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि यूजीसी ने पचासी मुख्यधारा के पाठ्यक्रमों और अठारह विशिष्ट पाठ्यक्रमों के लिए एक मॉडल पाठ्यक्रम तैयार किया है। विश्वविद्यालयों को इस केंद्रीकृत पाठ्यक्रम में तीस प्रतिशत तक बदलाव करने की छूट दी गई है, शेष सत्तर प्रतिशत में विद्यार्थियों के लिए ‘मुक्त आवाजाही’ को ध्यान में रखते हुए समान विषय होंगे। कोई पूछे कि किसी पाठ्यक्रम को क्या इस तरह प्रतिशत के हिसाब से काटा या बढ़ाया जा सकता है!

ये ‘मॉडल पाठ्यक्रम’ शिक्षकों और विद्यार्थियों की उन तमाम आशंकाओं की पुष्टि करते हैं कि सीबीसीएस, दिल्ली विश्वविद्यालय के उस चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (एफवाइयूपी) के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे छात्रों और शिक्षकों के जबर्दस्त आंदोलन को देखते हुए पिछले साल समाप्त कर दिया गया था। उसे अब अखिल भारतीय स्तर पर तीन साल के लिए लागू करने का फैसला किया जा चुका है।

विश्वविद्यालयों के कुलपतियों में फिलहाल सरकारी निर्देशों को चुनौती देने का माद्दा नहीं है। प्राय: सभी हाथ बांधे यूजीसी के आगे नतमस्तक खड़े पाए जाते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भारतीय शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा की आवश्यकताओं और सीबीसीएस के तहत पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों का कितना ज्ञान है और उसके मंत्री को इसकी कितनी जानकारी है, कहना मुश्किल है।

कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) की शुरुआत की थी। इस अभियान से पहले शिक्षा की फंडिंग के लिए विभिन्न प्रक्रियाओं और स्रोतों की व्यवस्था थी, पर रूसा ने इसे एक केंद्रीकृत प्रक्रिया द्वारा संचालित व्यवस्था से बदल दिया है। अब संस्थाओं/ विश्वविद्यालयों/ राज्यों को एक ही स्रोत से अनुदान तभी मिलेगा जब वे कुछ शर्तों को लिखित में मानें। भाजपा-नीत सरकार ने यूपीए सरकार की इस नीति को चालू रखा है। अनुदान प्राप्त करने की शर्तों में च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (सीबीएससी), सेमेस्टर व्यवस्था आदि को रखा गया है।

शिक्षकों की भर्ती, कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, छात्रावासों आदि के आधारभूत ढांचे का विस्तार करने के बजाय अब उच्च शिक्षा में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी मॉडल) द्वारा विस्तार और गुणवत्ता की जिम्मेदारी निजी पहलकदमियों पर डालने की तैयारी है। निजी विश्वविद्यालयों द्वारा ली जाने वाली निषेधात्मक ऊंची फीस और निजी क्षेत्र में आरक्षण नीति के अभाव का मतलब है कि आने वाले समय में गरीब या औसत आय की पृष्ठभूमि वाले और सामाजिक तौर पर पिछड़े तबकों के विद्यार्थियों की पहुंच उच्च शिक्षा तक घट जाएगी। शिक्षा खर्च में वार्षिक कटौती अनिवार्य रूप से सार्वजनिक निवेश वाले विश्वविद्यालयों में स्थायी दरिद्रता और संसाधनों की कमी के रूप में प्रतिबिंबित होगी।

शर्म की बात है कि शिक्षा में ये बदलाव बिना किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के, शिक्षकों और छात्रों पर थोपे जा रहे हैं। कहने को हर विश्वविद्यालय में कार्यकारिणी परिषद और अकादमिक परिषद मौजूद हैं, जिनमें अधिकतर सदस्य कुलपति की हां में हां मिलाने को मजबूर हैं। शिक्षकों की नुमाइंदगी इन परिषदों में नगण्य है और वोटिंग की सूरत में शिक्षकों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का हारना सौ प्रतिशत तय होता है। इसलिए इन परिषदों के निर्णयों को अस्वीकार करने के लिए व्यापक छात्र और शिक्षक समुदाय के बीच इन मुद्दों को लाना होगा। देशव्यापी जनप्रतिरोध का निर्माण करना होगा।

आज रोजगार और शिक्षा के स्तर के बीच संबंध अधिक पारदर्शी हुए हैं। एक साधारण आदमी भी अपनी बदहाली से मुक्ति के लिए बेहतर शिक्षा प्रणाली में आशा की किरण देखता है। एसोचैम के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि पैंसठ प्रतिशत से ज्यादा अभिभावक अपने वेतन का आधे से ज्यादा हिस्सा अपने बच्चों की शिक्षा और उससे संबंधित अन्य गतिविधियों पर खर्च करते हैं, जिससे पारिवारिक बजट डगमगा जाता है। ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि अच्छी शिक्षा के लिए आंदोलन को शिक्षकों और छात्रों के दायरे से बाहर भी लाया जाए। आम मजदूरों, किसानों, युवाओं और महिलाओं को इसमें शामिल करना होगा। इस आंदोलन को उन ठेके पर काम कर रहे लाखों शिक्षकों के बेहतर वेतन और सुविधाओं से भी जोड़ना होगा।

आठ जुलाई, 2015 को ब्रिक्स देशों के पचास विश्वविद्यालयों के बारे में जारी रैकिंग की घोषणा के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय की रैंकिंग, जो 2014 में अड़तीस थी, अब 2015 में खिसक कर छियालीस पर पहुंच गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय को इस गर्त में पहुंचाने के लिए मुख्यत: यहां का प्रशासन जिम्मेदार है, जहां अंधेरगर्दी इस हद तक फैल चुकी है कि कोई भी महत्त्वपूर्ण निर्णय शिक्षकों से सलाह-मशविरा किए बिना लागू कर दिया जाता है।

सीबीसीएस को ही लें। क्या इस बारे में विश्वविद्यालय की वैधानिक निकायों से कोई बात की गई? क्यों पाठ्यक्रमों की समितियों, फैकल्टियों और स्टाफ परिषदों से लोकतांत्रिक माहौल में विचार-विमर्श करना जरूरी नहीं समझा गया? कॉलेजों के प्राचार्यों से यह नहीं पूछा गया कि उनके पास ढांचागत व्यवस्थाएं पर्याप्त हैं या नहीं!

क्या सौ से अधिक पाठ्यक्रमों को पढ़ने, समझने और उन पर सुझाव देने के लिए एक दिन या एक रात का समय पर्याप्त है? क्या यह दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद या कार्यकारिणी परिषद के साथ एक क्रूर मजाक नहीं है कि उनके सदस्यों को सिर्फ मीटिंगों में हाथ खड़े करने और ऐसे पाठ्यक्रमों को, जिनका असर विश्वविद्यालय के साठ हजार छात्रों और स्कूल ऑफ ओपन लर्निग के साढ़े चार लाख विद्यार्थियों पर पड़ने वाला है, बिना पर्याप्त समय दिए पास करने को कहा जाता है!

तेरह जुलाई, 2015 को हुई मीटिंग में अकादमिक परिषद के बाईस निर्वाचित सदस्यों ने सीबीसीएस का विरोध किया। 14 जुलाई 2015 को हुई विवि कोर्ट की मीटिंग में अठाईस सदस्यों ने सीबीसीएस को इसी वर्ष से लागू करने पर आपत्ति जताई। आज स्थिति यह है कि विश्वविद्यालय के अध्यापकों और विद्यार्थियों में अगर जनमत संग्रह कराया जाए तो नब्बे प्रतिशत इस फैसले के विरोध में वोट करेंगे। आज देश भर में पहली बार यह देखने में आ रहा है कि मसला चाहे भूमि अधिग्रहण का हो, श्रमिक कानूनों में बदलाव का या शिक्षा में सुधारों का, विचारधारा से ऊपर उठ कर सभी भुक्तभोगी देशव्यापी प्रतिरोधी आयोजनों में एकजुट हैं।

 

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