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गंगा सफाई योजना अधर में क्यों

नमामि गंगे परियोजना के तहत जनवरी 2016 से ही गंगा की सफाई तीन चरणों में होनी है जिसमें अल्पकालिक योजना व पांच वर्ष की दीर्घावधि योजना शामिल है। लेकिन फिलहाल सबकुछ ठप पड़ा हुआ है।

Author नई दिल्ली | January 25, 2016 12:03 AM
नमामि गंगे परियोजना के तहत जनवरी 2016 से ही गंगा की सफाई तीन चरणों में होनी है जिसमें अल्पकालिक योजना व पांच वर्ष की दीर्घावधि योजना शामिल है। लेकिन फिलहाल सबकुछ ठप पड़ा हुआ है। (फाइल फोटो)

गंगा की सफाई और अविरलता को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) गंभीर है। उसने केंद्र से स्पष्ट कहा है कि बगैर उसकी अनुमति के उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड सरकार को कौड़ी भी मुहैया न कराएं। इतना ही नहीं, एनजीटी ने केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनर्जीवन मंत्रालय पर भी काफी तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि गंगा की सफाई पर उसके पास सुंदर-सुंदर नारों के सिवाय कुछ भी नहीं है। एनजीटी ने यहां तक कहा है कि गंगा पर सरकार का काम उसके नारों से उलट रहा है।

दरअसल, एनजीटी ने उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की सरकारों को गंगा सफाई को लेकर लापरवाही बरतने और प्रदूषण के स्रोतों को लेकर कोई संतोषजनक उत्तर न देने पर बजट रोकने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की खिंचाई इन राज्यों पर आवश्यक कार्रवाई नहीं करने की वजह से की है।

मंत्रालय की कमान उमा भारती के पास है और वे अकसर उत्तराखंड के हरिद्वार पहुंचती हैं और यहां गंगा में स्नान करती हैं। यहां यह बताना भी उचित होगा कि प्रदूषण की वजह से हरकी पैड़ी में गंगा सबसे ज्यादा मैली है। उमा भारती अकसर कहती हैं कि गंगा प्रदूषण मुक्त होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह ड्रीम प्रोजेक्ट है, वगैरह, वगैरह। लेकिन केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय घोषणाओं के सिवाय अब तक ज्यादा कुछ नहीं कर पाया है।

नमामि गंगे परियोजना के तहत जनवरी 2016 से ही गंगा की सफाई तीन चरणों में होनी है जिसमें अल्पकालिक योजना व पांच वर्ष की दीर्घावधि योजना शामिल है। लेकिन फिलहाल सबकुछ ठप पड़ा हुआ है। पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल तक 2,525 किलोमीटर में फैली इस नदी की सफाई की जानी है। इन पांच में झारखंड ही ऐसा राज्य है जहां भाजपा की सरकार है। यों तो केंद्र सरकार अलग-अलग मुद्दों पर समय-समय पर गैर-भाजपा सरकारों की खिंचाई करती रहती है; केंद्र बार-बार टिप्पणी करता है कि ये सरकारें केंद्रीय अनुदान का सही इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। लेकिन विडंबना है कि गंगा की सफाई को लेकर केंद्र ने अब तक प्रत्यक्ष रूप से इन राज्यों के खिलाफ न कोई कार्रवाई की और न ही किसी प्रकार का आरोप मढ़ा है। जबकि सभी जानते हैं कि नमामि गंगे प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है।

एनजीटी ने बजट पर रोक इसलिए लगाई कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों ने प्रदूषण के स्रोत की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। ऐसी बात नहीं कि प्रदूषण से जुड़े आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। दरअसल, नौकरशाह लापरवाह हैं। राज्य सरकारों के अलावा कई गैर-सरकारी संगठन हैं जो हर साल गंगा में फैल रहे कचरों का सर्वेक्षण कराते रहते हैं। लेकिन जब तक केंद्र और राज्य सरकारें इसमें विशेष रुचि नहीं लेंगी, तब तक गंगा यों ही मैली रहेगी।
गंगा की सफाई के नाम पर वर्ष 1985 से लेकर अब तक बाईस हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, जिसमें गंगा एक्शन प्लान का फंड, जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन व विश्व बैंक द्वारा दिया गया कर्ज भी शामिल है। इतनी भारी धनराशि लगाए जाने के बावजूद गंगा स्वच्छ क्यों नहीं हो सकी? इसकी जवाबदेही कभी तय क्यों नहीं हुई?

उत्तर प्रदेश का वाराणसी शहर जो प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र भी है, यहां वर्ष 1992 में बीओडी यानी बायोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड 5 मिलीग्राम प्रति लीटर थी जो वर्ष 2015 में बढ़ कर 8.3 हो गई है। जबकि जिन्स फिकल कोली फार्म की संख्या सौ प्रति मिलीलीटर थी, यह बढ़ कर उनचास सौ हो गई है। केवल बनारस की बात करें तो चौवालीस नालों के जरिये तकरीबन 46 एमएलडी सीवेज और कचरा गंगा नदी में प्रवाहित हो रहा है। इसके अलावा मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाटों पर एक वर्ष में इकतालीस हजार शव जलाए जाते हैं जिनमें नब्बे टन राख निकलती है और यह राख गंगा नदी में ही प्रवाहित होती है।

वाराणसी के अलावा फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर व इलाहाबाद में बढ़ते शहरीकरण से पिछले दो दशक में गंदे पानी की मात्रा में बेतहाशा वुद्धि हुई है। उत्तराखंड जहां गोमुख से गंगा का उद््गम माना गया है, इस प्रदेश में विशेष रूप से हरिद्वार में प्रदूषण की स्थिति काफी भयावह है। वर्ष 2015 के सर्वे के मुताबिक 16.8७ मिलियन टन सीवर का गंदा पानी गंगा में रोजाना मिल रहा है। केंद्र व राज्य के झगड़ों के बीच तैंतालीस सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) फंसे हुए हैं। यहां एसटीपी बारह क्षेत्रों में स्थापित होने हैं। स्टेट प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ग्रुप बावन करोड़ की योजना केंद्र को सौंप चुका है। इस पर केंद्र का स्पष्ट कहना है कि एसटीपी पर होने वाले कुल खर्च का तीन फीसद उत्तराखंड सरकार को वहन करना चाहिए। जबकि उत्तराखंड सरकार को यह मंजूर नहीं है। उसका साफ कहना है कि एसटीपी पर जो खर्च हो वह पूरा का पूरा केंद्र सरकार को वहन करना चाहिए।

उत्तराखंड में अर्द्धकुंभ शुरू हो गया है। उत्तराखंड सरकार का दावा है कि अप्रैल 2016 तक कुल एक करोड़ श्रद्धालु हरिद्वार में डुबकी लगाएंगे। ऐसे में मल-मूत्र, फूल व प्लास्टिक सभी तो गंगा में ही जाएंगे। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि वर्ष 2010 में उत्तराखंड में कुंभ के दौरान हरिद्वार में गंगा के नमूनों की पड़ताल की गई तो प्रति दस मिलीलीटर जल में हानिकारक जीवाणुओं की संख्या छह हजार पाई गई जो स्नान के पानी के लिए सरकार द्वार जारी मानकों से पंद्रह हजार फीसद ज्यादा थी। इस प्रदूषण के कारण ही हैजा, पीलिया, पेचिश व टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियां बढ़ी हैं। वैसे भी देश में आठ फीसद स्वास्थ्य समस्याएं और एक तिहाई मौतें जलजनित बीमारियों के कारण ही होती हैं।

ऋषिकेश से इलाहाबाद तक गंगा के आसपास करीब पच्चीस औद्योगिक इकाइयां स्थित हैं जिनमें चीनी, उर्वरक व कागज मिल के अलावा तेलशोधक कारखाने तथा चमड़ा उद्योग प्रमुख हैं। इनसे निकलने वाला कचरा और रसायनयुक्त गंदा पानी गंगा में गिर कर इसके पारिस्थितिकीय तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। इन कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट में मुख्य रूप से हाइड्रोक्लोरिक एसिड, मरकरी, भारी धातुएं व कीटनाशक जैसे खतरनाक रसायन होते हैं। ये रसायन मनुष्य की कोशिकाओं में जमा होकर बहुत-सी बीमारियां उत्पन्न करते हैं।

बिहार और पश्चिम बंगाल में भी गंगा में प्रदूषण, गंगा एक्शन प्लान पर काम होने के बावजूद तेजी के साथ बढ़ा है। संसदीय लोक लेखा समिति ने तो तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि पटना में गंगाजल तेजाब बन गया है। यहां तीन से ज्यादा नालों का मुंह गंगा में खुलता है। बिहार के पंद्रह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट एक अरसे से खराब हैं। फतुहा से दानापुर तक गंगा के पेट में र्इंट के भट्ठे लगते हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक पांच फीसद गंदा पानी पश्चिम बंगाल में गंगा नदी में ही प्रवाहित होता है। करीब 131 करोड़ लीटर गंदगी रोजाना गंगा में गिरती है। चौंतीस सीवेज प्लांट हैं जिनकी क्षमता 457 एमएलडी है, लेकिन चौदह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट खराब पड़े हुए हैं। इसलिए महज 214 एमएलडी पानी ही साफ हो पाता है। बोर्ड ने कोलकाता, हावड़ा व सियालदह सहित एक दर्जन शहरों में चौंसठ नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के सुझाव भी दिए हैं लेकिन वहां तृणमूल कांग्रेस की सरकार गंगा की सफाई को लेकर अब तक खामोश है।

झारखंड में भाजपा की सरकार है। यहां पर गंगा केवल साहेबगंज जनपद से होकर गुजरती है। इस प्रदेश में काफी कम काम होने के बावजूद आगामी अप्रैल 2016 से गंगा सफाई अभियान का कार्यक्रम शुरू होने की बात कही जा रही है। इसके लिए छिहत्तर गांव चिह्नित भी किए जा चुके हैं। इन गांवों में शौचालय भी बनने हैं। साढ़े ग्यारह लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में गंगा सफाई अभियान वर्ष 2019 तक चलने की संभावना है। अन्य राज्यों के मुकाबले झारखंड में गंगा सफाई में न ही ज्यादा मेहनत और न ही ज्यादा बजट की जरूरत है। फिर भी अपनी ओर से सरकार कोई भी ठोस पहल नहीं कर रही है। इस सरकार को भी नमामि गंगे के अनुदान का इंतजार है।

एनजीटी ने काफी पहले ही यह सुझाव दिया था कि गंगा के किनारे पचास मीटर का बफर जोन बनाया जाए। नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने के लिए कई देशों में बफर जोन बनाए गए हैं। बफर जोन बनने के बाद वहां किसी तरह के निर्माण-कार्य की इजाजत नहीं होगी। लेकिन किसी भी सरकार ने एनजीटी के आदेश को गंभीरता से नहीं लिया है। इसके पहले तीन मई 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों को गंगा के आसपास पॉलीथिन को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया था, लेकिन दोनों राज्य सरकारों की नींद अब जाकर खुली है और एलान किया गया है कि एक फरवरी 2016 से पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।

अब केंद्र सरकार प्रमुख गंगा घाटों पर शीघ्र ही प्रदूषण का स्तर प्रदर्शित करने वाले इलेक्ट्रानिक डिस्प्ले बोर्ड लगाने जा रही है। इससे स्नान घाट के जल की गुणवत्ता का ताजातरीन हिसाब पल-पल दिख सकेगा। लेकिन रुड़की विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि डिस्प्ले बोर्ड से ज्यादा जरूरी है गंगा की सफाई। वैज्ञानिक गंगा की सफाई और प्रदूषण-मुक्ति से जुड़े सुझाव दे सकते हैं, लेकिन कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी तो केंद्र व राज्य सरकारों की है।

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