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संपादकीयः मुसलिम समाज, कानून और अदालत

आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमात-ए-उलेमा-ए-हिंद और दारुल उलूम जैसे संगठनों को जहां लगता है कि शरिया कानून जालिम है और भारत का कानून दयावान, वहां वे भारत का कानून मानते हैं। पर जब सवाल उनके अपने वजूद का, या पुरुष-प्रधान समाज की दीवारें गिरने का आता है, तो वे शरिया की आड़ लेने लगते हैं।

Author April 8, 2016 2:49 AM
(File Photo)

मुसलिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तीन बार एक साथ बोले गए तलाक की संवैधानिकता की जांच करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित है। शायरा बानो नमक एक महिला की याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय महिला आयोग सहित शायरा के पूर्व पति को भी इस बारे में नोटिस जारी किया है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि इस प्रक्रिया की समीक्षा जरूरी है, क्योंकि इसके द्वारा महिलाओं को वस्तु की तरह उपयोग किया जाता है। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह का एकतरफा तलाक, जिसमें इस्लाम द्वारा मनोनीत सुलह का कोई रास्ता नहीं है, अन्यायपूर्ण ही नहीं, बल्कि समाज द्वारा स्वीकृत वैवाहिक बंधनों की कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता। इस पर आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जो कि अन्य समय एक निष्क्रिय संस्था है, ने यह कह दिया कि चूंकि मुसलिम पर्सनल लॉ का जन्म कुरान के सूराओं से हुआ है, न कि भारतीय संविधान के अंतर्गत बनाए कानून से, लिहाजा इसकी समीक्षा सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र के बाहर है।

एक साथ बोले गए तीन तलाक का मसला इस तकनीकी युग में काफी गंभीर रूप धारण कर रहा है। अब मुसलिम पुरुष फेसबुक, स्काइप जैसे एप्स पर या मोबाइल फोन में एसएमएस भेज कर भी तलाक दे रहे हैं। एक सशर्त अधिकार का मुसलिम पुरुषों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है। सबसे बुरी बात यह है कि महिलाओं को अपनी बात कहने का कोई मौका ही नहीं मिलता। एक काजी का लिखा तलाकनामा उनके वैवाहिक जीवन को खत्म कर देता है। इस तरह का कोई रास्ता महिलाओं के लिए नहीं है। अगर उनके वैवाहिक जीवन में कलह है और उन्हें रोजाना पति के हाथों उत्पीड़ित होना पड़ता है तो यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक पति ही उन्हें न छोड़ दे। कुरान-ए-पाक में इस तरह के एकतरफा, पुरुषप्रधान वैवाहिक जीवन का कोई उल्लेख नहीं है। बल्कि कुरान-ए-पाक में तो इस तरह के कई धर्मादेश हैं जिनमें पुरुष को अपनी ब्याहता के साथ न्यायसंगत और निष्पक्ष तरीके से पेश आने को कहा गया है। पर पुरुष-प्रधान समाज में इन धर्मादेशों का कोई उल्लेख नहीं करता। महिलाओं के बचाव के धर्मादेशों का अनुसरण सिर्फ इसलिए नहीं होता क्योंकि मुसलिम पर्सनल लॉ का संहिताकरण (कोडिफिकेशन) नहीं हुआ है।

मुसलिम पर्सनल लॉ के संहिताकरण को रोकने के लिए अक्सर यही दलील दी जाती है की चूंकि यह कानून कुरान-ए-पाक की सूराओं पर आधारित है, सो इनसे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। पर कुरान की हर सूरा के कई अनुवाद हैं और हर अनुवाद की कई व्याख्या। इसीलिए कुरान में महिलाओं के संरक्षण के अनेक धर्मादेश होने के बावजूद उन्हें अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ता है। दिवंगत मुसलिम अध्येता असगर अली इंजीनियर के अनुसार, जो मुसलिम पर्सनल लॉ अभी भारत में चलता है वह दरअसल एंग्लो-मोहम्मडन कानून है जिसे सिर्फ शरिया का मुखौटा दे दिया गया है। यह कानून स्वतंत्रता सेपहले के अंग्रेज जजों द्वारा दिए गए फैसलों पर आधारित है और कुरान का असली भावार्थ नहीं दर्शाता।

असगर अली इंजीनियर ने इस विषय पर काफी अध्ययन किया था और उन्होंने मुसलिम पर्सनल लॉ के संहिताकरण के लिए मुसलिम समाज में सर्वसम्मति बनने की भरसक कोशिश की थी। उन्होंने लिखा था कि ‘‘सब सोचते हैं कि जो मुसलिम पर्सनल लॉ भारत में चल रहा है वह शरिया पर आधारित है। पर ऐसा है नहीं। जो मुसलिम वर्तमान कानून की सिफारिश करते हैं वे असल में शरिया कानून और वर्तमान कानून के बीच का फर्क समझते ही नहीं। यह कानून असल में स्वतंत्रता के पहले एंग्लो-मोहम्मडन कानून के नाम से जाना जाता था जिसे बाद में मुसलिम पर्सनल लॉ का नाम दे दिया गया। जब अंग्रेजों ने मुगलिया सल्तनत से दिल्ली का राज छीन लिया, तब उन्होंने अपनी अदालतें बनाए जिनमें मुसलमानों के विवाह, तलाक और उत्तराधिकार संबंधी मामले भी सुने जाते थे।

इन अदालतों में या तो अंग्रेज या फिर गैर-मुसलिम जज होते थे जिन्हें शरिया कानून के बारे में विशेष पता नहीं होता था। जो मुसलिम जज भी होते थे वे भी अंग्रेजी कानून में ही प्रशिक्षित होते थे। ये जज हनाफी अध्येता मिरघयानी की किताब ‘हिदायाह’ के हैमिलटन द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद का सहारा लेते थे। कभी-कभी ये जज किसी मौलवी से भी परामर्श करके फैसला सुनाते थे। चूंकि ये मामले अंग्रेजी अदालतों में सुने जाते थे, इनका प्रक्रियात्मक कानून अंग्रेजी था और तात्त्विक कानून हिदायाह पर आधारित, इसलिए इसे एंग्लो-मोहम्मडन कानून पुकारा जाने लगा। इन अदालतों के फैसले आने वाले फैसलों के लिए मानक बन गए।’’

इस्लाम द्वारा मनोनीत तीन बार बोल तलाक अनायास या लापरवाही से नहीं बोला जा सकता। मुसलिम अध्येता सईदा सैयिदैं हामिद ने लिखा है कि तीन बार एक साथ बोला हुआ तलाक इस्लाम में तलाक-ए-बिदात या गलत और अधार्मिक नवाचार का तलाक बन जाता है। यह इस्लाम की रूह के खिलाफ है। उन्होंने आगे लिखा है कि इस्लाम के दूसरे खलीफा, हजरत उमर की हुकूमत के दौरान देखा गया कि अरब में अचानक तलाक की संख्या कई गुना बढ़ गई। लोग अपनी बीवियों को अकारण ही तलाक देने लगे। कुरान-ए-पाक के इस अमानवीय अनुवाद से नाराज होकर खलीफा ने आदेश जारी किया कि हर उस शख्श का सर कलम कर दिया जाएगा जो अपनी बीवी को तलाक देगा। बेरुत के अल्लामा समसनी ने यह वाकया अपनी किताब ‘फलसफा शरिया-उल-इस्लाम’ में लिखा है। एक साथ तीन बार बोला गया तलाक इस्लाम की रूह के खिलाफ है। कुरान में साफ निर्देश है कि तलाक दो महीनों में दो बार बोला जाए और उसके बाद बीवी को या तो फिर से कुबूल कर लिया जाए या उसे दया के साथ छोड़ दिया जाए। इसके अलावा यह भी साफ लिखा है कि बीवी को जो भी दिया जा चुका है वह वापस नहीं लिया जा सकता।

इस तरह इस धर्मादेश का मतलब साफ है। तलाक को समय देकर बोलना होगा। यह समय इसलिए निर्धारित किया गया है कि इस दौरान अगर संभव हो तो पति-पत्नी के बीच सुलह करा दी जाए। इस काम में दोनों तरफ के संभाषी भी लगाए जाते है। दूसरे, तलाक बोले जाने के बाद भी समय दिया जाता है जिसमें पति यह विचार कर सकता है कि क्या वह अपनी बीवी को नेकीपूर्वक तीसरा तलाक बोल कर छोड़ देगा या फिर मर्यादापूर्वक उसे फिर से अपना लेगा। तीसरे महीने में, दो तलाक बोले जाने के बाद और तीसरा तलाक बोलने से पहले, उसे यह फैसला लेना होगा। पर इसके साथ ही एक परम धर्मादेश है कि वह अपनी छोड़ी जाने वाली बीवी से उसे दिया गया कोई भी सामान वापस नहीं ले सकता। तलाक और तलाकशुदा औरत के विषय में कुरान-ए-पाक में इस तरह के कई धर्मादेश हैं जो औरतों के अधिकार के प्रति संवेदनशील हैं।’

तीन बार एक साथ तलाक बोल कर बीवी को छोड़ देना अवश्य ही इस्लाम की रूह के खिलाफ है। इस्लाम धर्म औरतों को कतई वह दर्जा नहीं देता जो समाज के ठेकेदारों ने उनके लिए चुन रखा है। इस पर जमात-ए-उलेमा-ए-हिंद का फिर से यह दोहराना कि मुसलिम पर्सनल लॉ की समीक्षा भारत का कोई भी न्यायालय नहीं कर सकता, बेमतलब लगता है। वह इसलिए कि कोई भी ऐसी मान्यता-प्राप्त संस्था नहीं है जो कुरान के सूराओं का अधिकृत अनुवादकहो। जब एक ही सूरा के कई अर्थ निकाले जाते हैं, तब पुरुष-प्रधान समाज औरतों को उनके अधिकार से वंचित रखने में कामयाब हो जाता है। ऐसे में सरकार और कानून बैठ कर तमाशा तो नहीं देख सकते?

पहले, मुसलिम संस्थाएं या तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला मान लिया करती थीं या फिर सरकार पर दबाव डाल कर कानून को अपने पक्ष में बदलवा लिया करती थीं। 1985-86 में शाह बानो मामले में यही हुआ था। जब तलाक के बाद गुजारे की राशि देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इन संस्थाओं ने नहीं माना, तो इन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर दबाव डाल कर ‘मुसलिम वीमेन (प्रोटेक्शन आॅफ राइट्स आॅन डाइवोर्स) एक्ट 1986’ बनवा डाला, जो कि औरतों के खिलाफ था। सुप्रीम कोर्ट का रवैया इस मामले में साफ है। खुर्शीद आलम खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में अदालत ने कड़े शब्दों में कहा था कि किसी भी प्रथा को सिर्फ इसलिए कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि वह किसी धर्म द्वारा स्वीकृत है। किसी भी प्रथा को नैतिकता, स्वास्थ्य और समाज में सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए नियंत्रित किया जा सकता है।

आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमात-ए-उलेमा-ए-हिंद और दारुल उलूम जैसे संगठनों को जहां लगता है कि शरिया कानून जालिम है और भारत का कानून दयावान, वहां वे भारत का कानून मानते हैं। पर जब सवाल उनके अपने वजूद का, या पुरुष-प्रधान समाज की दीवारें गिरने का आता है, तो वे शरिया की आड़ लेने लगते हैं। वे यह भी भूल जाते हैं कि तीन बार एक साथ बोला जाने वाला तलाक पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित कई मुसलिम देशो में वर्जित है। मुसलिम संस्थाएं शरिया को समान तरीके से लागू नहीं करना चाहतीं और न ही वे यह चाहती हैं कि भारत के मुसलमान एक संहिताबद्ध कानून के दायरे में आएं। वे वर्तमान स्थिति से खुश हैं और बदलाव इसलिए नहीं चाहतीं क्योंकि इससे उनका मुसलिम समुदाय पर शिकंजा ढीला पड़ जाएगा।

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