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राजनीतिः विकास की नैतिक बुनियाद

यदि विकास को सही पटरी पर लाना है और उसे टिकाऊ तौर पर समतावादी व पर्यावरण की रक्षा के अनुकूल, न्यायसंगत व सभी जीवों की रक्षा के अनुकूल बनाना है तो ऐसे विकास के लिए इसके अनुकूल ही जीवन-मूल्य लोगों में होने चाहिए, यानी सही और संतुलित विकास के लिए एक नैतिक आधार या एक नैतिक बुनियाद का होना जरूरी है।

मनुष्य के लिए जीवन का बड़ा उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह अपने जीवन को बेहतर दुनिया बनाने से जोड़े।

भारत डोगरा

विश्व स्तर पर विकास की बहस में कुछ समस्याएं बार-बार उभर कर आ रही हैं। अनेक अध्ययनों व विमर्शों से यह सोच निकल रही है कि जब तक उपभोक्तावाद, अंतहीन लालच और ऐंद्रिक सुखों की दौड़, संकीर्ण स्वार्थों और उनसे जुड़ी तीखी स्पर्धा व हिंसा का मानव-जीवन पर असर कम नहीं होगा, तब तक विकास भी सही पटरी पर नहीं आ सकता है। यह अपने आप में एक उपलब्धि है कि देर से ही सही, अब विकास के विश्व स्तर के विमर्श में मानव जीवन पर हावी इन प्रवृत्तियों को न्यूनतम करने का महत्त्व समझा तो जा रहा है। पर्यावरण का विनाश कम करने में, भ्रष्टाचार व अपराध कम करने में सफलता प्राप्त करनी है तो इस समय हावी जीवन मूल्यों को भी बदलना पड़ेगा, इस सोच को मान्यता मिली है। समतावादी व टिकाऊ विकास मात्र बेहतर नियोजन से ही नहीं आ जाएगा, इसके लिए अनुकूल जीवन मूल्य भी समाज में मजबूती से कायम करने होंगे।

हाल के वर्षों में देखा गया है कि कई गंभीर समस्याओं- जैसे पर्यावरण विनाश, भ्रष्टाचार और यौन हिंसा आदि पर विमर्श बहुत बढ़ा है। समाधान के नाम पर उपाय भी पहले से कहीं अधिक किए गए हैं, पर समस्याएं पहले से कम होने के बजाय ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसी स्थिति में ही विद्वानों और बुद्धिजीवियों की यह समझ बढ़ रही है कि विकास को सही रास्ते पर लाने के लिए, उसमें आई विकृतियों व विसंगतियों को दूर करने के लिए, इस उद्देश्य के अनुकूल जीवन मूल्यों के विस्तार का कार्य समाज में व्यापक स्तर पर, कई मोर्चों पर और निरंतरता के साथ होना चाहिए। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यदि विकास को सही पटरी पर लाना है और उसे टिकाऊ तौर पर समतावादी व पर्यावरण की रक्षा के अनुकूल, न्यायसंगत व सभी जीवों की रक्षा के अनुकूल बनाना है तो ऐसे विकास के लिए इसके अनुकूल ही जीवन-मूल्य लोगों में होने चाहिए, यानी सही और संतुलित विकास के लिए एक नैतिक आधार या एक नैतिक बुनियाद का होना जरूरी है। इस तरह का नैतिक आधार तैयार करने के लिए टिकाऊ तौर पर समाज का ऐसा आध्यात्मिक विकास जरूरी है जिसके माध्यम से जीवन के आरंभिक दिनों में ही व्यापक स्तर पर बुनियादी नैतिकता ग्रहण हो जाए और यह प्रक्रिया निरंतरता से आगे बढ़ती रहे।

किसी भी मनुष्य में प्राय: अच्छी व बुरी प्रवृत्तियों और मजबूतियों व कमजोरियों का मिलन होता है। मनुष्य के जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह दुख-दर्द कम करने में योगदान दे, एक बेहतर दुनिया बनाने में योगदान दे। अपनी क्षमताओं व रुचि के अनुसार इस बुनियादी कार्य के लिए उचित माध्यम का चुनाव करे और इसके लिए क्षमताओं को भरपूर मेहनत व निष्ठा से विकसित करे। उदाहरण के लिए, यदि किसी ने अपना माध्यम खेती-किसानी चुना है तो उसका प्रयास यह होना चाहिए कि धरती के उपजाऊपन की रक्षा करते हुए अच्छी गुणवत्ता के खाद्य व उपज उपलब्ध करवाए, इसके लिए जरूरी ज्ञान हासिल करे। कोई लेखक है तो उसे समाज में बुराइयां कम करने और अच्छाइयां बढ़ाने के लिए अपनी लेखनी चलानी चाहिए। इसके लिए अपनी भाषा, शैली, ज्ञान में निरंतर प्रगति करनी चाहिए। कोई उद्योग चलाता है तो उसे अच्छी गुणवत्ता के उत्पाद, मजदूरों से अच्छे व्यवहार, बेहतर रोजगार सृजन के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपने-अपने कार्य को बेहतर दुनिया बनाने के लक्ष्य से जोड़ते हुए सभी लोग उसे मेहनत, ईमानदारी व निष्ठा से करें तो यह हमारे विश्व को बेहतर बनाने में एक बड़ी सफलता होगी। लेकिन प्राय: लोग कहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में चाह कर भी इस तरह से कार्य करने में कठिनाई है। किसान हो या लेखक हो, या फिर उद्योगपति, अक्सर कहते मिल जाएंगे कि इस राह को निभाना कठिन हो गया है, व्यावहारिक नहीं है। हालांकि इसमें सच्चाई का एक बड़ा अंश हो सकता है, पर कुछ हद तक यह विफलता मनुष्य की अपनी कमजोरियों से भी जुड़ी है।

बेहतर दुनिया बनाने का दूसरा पक्ष हमारे आपसी संबंधों से जुड़ा है। हम आपसी संबंधों का आधार सामंजस्य, सहयोग, सेवा, भाईचारा, सहायता व बंधुत्व को जितना ज्यादा रखेंगे और परस्पर व्यवहार को मधुर व अहिंसक बनाएंगे, उतना ही हम बेहतर दुनिया बनाने में योगदान देंगे। पर कड़वी सच्चाई तो यह है कि आपसी संबंधों में अपना स्वार्थ आगे बढ़ाने, अपनी बात को किसी न किसी तरह मनवा लेने की प्रवृत्ति हावी रहती है। आपसी संबंध प्राय: स्वार्थ और आधिपत्य पर आधारित होते हैं, व इसी कारण इनमें प्राय: मानसिक व शारीरिक हिंसा, अपनी व दूसरों की, दोनों पक्षों की क्षति जुड़ी रहती है। हालांकि मौजूदा सामाजिक व्यवस्था भी ऐसे संबंधों के लिए जिम्मेदार है। लेकिन यदि हम चाहें तो अपने व्यक्तिगत स्तर पर भी इन संबंधों को बेहतर करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके बावजूद व्यापक स्तर पर ऐसा नहीं हो रहा है तो इसके लिए मनुष्य की अपनी कमजोरियों व आध्यात्मिक विकास के अभाव की जिम्मेदारी अधिक है। यह विफलता और मौजूदा विकास की गंभीर कमियां नजदीकी तौर पर एक-दूसरे से मिली-जुली हैं। आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों की बुनियाद मजबूत होने से इन दोनों स्तरों पर स्थिति संभालने में बहुत सहायता मिलेगी।

मनुष्य के लिए जीवन का बड़ा उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह अपने जीवन को बेहतर दुनिया बनाने से जोड़े। पर उसके स्वभाव की अनेक कमजोरियां उसके इस राह पर चलने में बाधा बनती हैं। उसके स्वभाव की एक बड़ी कमजोरी उसका लालच है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद उसमें यह वृत्ति है कि अधिक से अधिक संचय करे, अधिक से अधिक भोग-विलास करे, अधिक से अधिक ऐंद्रिक सुखों का भोग करे। इसके लिए वह गलत-सही, न्याय-अन्याय सब तरह के उपायों को अपनाने के लिए तैयार हो जाता है और इन्हीं कारणों से बहुत-सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। यह समझते हुए इतिहास के बहुत से दार्शनिकों और सुधारकों ने विविध तरह के लालच को नियंत्रण में रखने के लिए विभिन्न समाजों में अनेक मर्यादाओं को स्थापित किया था। ये परंपरागत व्यवस्थाएं प्राय: अपने में पूर्ण या दोषहीन तो शायद कभी न थीं, पर इन्होंने अनेक बुराइयों को कम रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आधुनिक दौर में अनेक शक्तिशाली तत्त्वों ने बहुत शोषण-दोहन कर जब अत्यधिक संचय कर लिया, तो अपने भोग-विलास के जीवन में उन्होंने इन जीवन-मूल्यों को एक बाधा पाया। अत: जो आधी-अधूरी मान्यताएं समाज में पहले से लालच, नशे आदि के विरुद्ध चल रही थीं, उन मान्यताओं को भी उन्होंने तहस-नहस किया और इस तरह पहले लालच, उपभोक्तावाद, ऐंद्रिक सुखों के हावी होने, भ्रष्टाचार, गलत ढंग से पैसा कमाने व खर्च करने के विरुद्ध जो मूल्य मौजूद थे, वे लुप्त होने लगे।

इस स्थिति में यह बहुत जरूरी हो गया है कि परिवार व शिक्षा स्थान दोनों स्तरों पर सादगी, संयम, संतोष, ईमानदारी, समानता, सब तरह के भेदभाव से ऊपर उठना, सहयोग, सामंजस्य, करुणा, न्यायप्रियता जैसे बुनियादी नैतिक गुणों का प्रसार जीवन के आरंभिक दिनों से और निरंतरता से किया जाए। यह शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। लेकिन दुर्भाग्यवश हाल के वर्षों में यही शिक्षा का सबसे उपेक्षित पक्ष भी रहा है। ये जीवन मूल्य शिक्षा संस्थानों में तो प्राथमिकता प्राप्त करने ही चाहिए। इसके साथ इनके प्रति निरंतरता बनाएं रखने में परिवार व अनेक अन्य सामाजिक मंचों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यदि समाज के आध्यात्मिक विकास से इन अति महत्त्वपूर्ण नैतिक गुणों का प्रसार निरंतरता से व व्यापक स्तर पर होगा, तो जीवन-मूल्यों की वह बुनियाद तैयार हो सकेगी जिससे सही समतावादी विकास, टिकाऊ विकास व पर्यावरण की रक्षा की राह को दृढ़ता से व दीर्घकालीन स्तर पर अपनाया जा सकता है।

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