ताज़ा खबर
 

अच्छे मानसून की आस में

कम बारिश के क्षेत्रों में ही नहीं, जहां ज्यादा बारिश होती है वहां भी पानी की समस्या से लोगों को जूझना पड़ता है जिसका समाधान पानी केबेहतर प्रबंधन में है।
Author नई दिल्ली | April 20, 2016 01:27 am
दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के सात जून तक केरल में पहुंचने की उम्मीद है।। (फाइल फोटो)

मानसून के साथ हमारा जीवन-चक्र पूरी तरह सन्नद्ध है। मानसून यानी ऋतु-चक्र में गड़बड़ी हुई तो पूरे जीवन-चक्र में गड़बड़ी। मानसून-चक्र संतुलित तो जीवन-चक्र संतुलित। इस सामान्य सच को कोई नकार नहीं सकता। निश्चय ही लगातार दो साल के सूखे और पानी के हाहाकार के बीच मौसम विभाग की यह भविष्यवाणी राहत लेकर आई है कि इस वर्ष मानूसन बेहतर होगा। मौसम विज्ञान विभाग की मानें तो इस साल औसत छह प्रतिशत अधिक बारिश होने का अनुमान है। इसके अनुसार देश में 104 से 110 प्रतिशत के बीच बारिश का अनुमान है। यानी इस साल मानसून औसत 106 प्रतिशत पर बरसेगा।

मोटामोटी देखें तो मौसम विभाग की भविष्यवाणी हाल के वर्षों में सही निकली है। उदाहरण के लिए, मौसम विभाग ने 2005 में 98 प्रतिशत बारिश की भविष्यवाणी की थी और वास्तविक बारिश हुई 99 प्रतिशत, 2006 में 93 प्रतिशत भविष्यवाणी की जगह 100 प्रतिशत, 2007 में 95 प्रतिशत की जगह 106 प्रतिशत, 2008 में 99 प्रतिशत की जगह 98 प्रतिशत, 2009 में 96 प्रतिशत की जगह 78 प्रतिशत, 2010 में 98 प्रतिशत की जगह 102 प्रतिशत, 2011 में भी 98 प्रतिशत की जगह 102 प्रतिशत, 2012 में 99 प्रतिशत की जगह 93 प्रतिशत, 2013 में 98 प्रतिशत की जगह 106 प्रतिशत, 2014 में 93 प्रतिशत भविष्यवाणी और बारिश 89 प्रतिशत तथा 2015 में 93 प्रतिशत की जगह 86 प्रतिशत बारिश हुई। इस तरह यदि एक दशक में मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अनुसार बारिश हुई है तो इस वर्ष भी होनी चाहिए।

मानसून की भविष्यवाणी को हमें फिलहाल सटीक मान कर चलना चाहिए। अच्छे मानसून के आसार के वैज्ञानिक कारण हैं। अल नीनो कमजोर हो रहा है और उसके मानसून के बीच में आने की संभावना है। वहीं ला नीना जुलाई से शुरू हो जाएगा। प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका के निकट खासकर पेरू वाले क्षेत्र में यदि विषुवत रेखा के ईर्दगिर्द समुद्र की सतह अचानक गरम होनी शुरू हो जाए तो अलनीनो बनता है। यदि तापमान में यह बढ़ोतरी आधे डिग्री से ढाई डिग्री के बीच हो तो यह मानसून को प्रभावित कर सकती है। इससे मध्य व पूर्वी प्रशांत महासागर में हवा के दबाव में कमी आने लगती है। असर यह होता है कि विषुवत रेखा के इर्दगिर्द चलने वाली ट्रेड विंड कमजोर पड़ने लगती है। यही हवाएं मानसूनी हवाएं हैं जो भारत में बारिश करती हैं।

प्रशांत महासागर में उपरोक्त स्थान पर कभी-कभी समुद्र की सतह ठंडी होने लगी है। ऐसी स्थिति में अल नीनो से विपरीत घटना होती है जिसे लॉ-नीना कहा जाता है। लॉ नीना बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को रफ्तार मिलती है, जो भारतीय मानसून पर अच्छा प्रभाव डालती है। मसलन, 2009 में अल नीनो के कारण कम बारिश हुई, जबकि 2010 व 2011 में ला नीना से अच्छी बारिश हुई। दूसरी तरफ 1997 में अल नीनो प्रभाव के बावजूद देश में अच्छी बारिश हुई। मानसूनी हवाएं मई के दूसरे सप्ताह में हिंद महासागर में उत्पन्न होती हैं और बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीपों में दस्तक देती हैं। मानसूनी हवाएं बंगाल की खाड़ी से आगे बढ़ती हैं और हिमालय से टकरा कर वापस लौटते हुए उत्तर भारत के मैदानी इलाकों को भिगोती हैं। एक जुलाई तक मानसून देश भर में छा जाता है।

मानसून का हमारी जीवन शैली सहित पूरी अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी असर पड़ता है। देश की साठ प्रतिशत से ज्यादा भूमि यदि पूरी तरह असिंचित हैं तो फिर अच्छी बारिश कितनी अपरिहार्य है यह बताने की आवश्यकता नहीं। वास्तव में बारिश से सबसे ज्यादा प्रभावित हमारी कृषि होती है और यह कई प्रकार से होती है। असिंचित क्षेत्र में बारिश ही सिंचाई का एकमात्र साधन है और फसल लहलाने का आधार भी। लेकिन जहां सिंचाई के साधन हैं वहां भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आपको अलग से सिंचाई नहीं करनी पड़ेगी। तो सिंचाई का खर्च बचता है।

कमजोर मानसून के कारण खाद्यान्न पैदावार वर्ष 2014-15 (जुलाई से जून) में घट कर 25 करोड़ 20 लाख टन रह गई जो उसके पिछले वर्ष 26 करोड़ 50 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर थी। हालांकि देश में चौदह प्रतिशत कम बरसात होने के बावजूद चालू फसल वर्ष 2015-16 में पैदावार नहीं घटी है। कुल पैदावार 25 करोड़ 31 लाख टन होने का अनुमान है। बात ठीक है। पर इसमें सिंचाई के कृत्रिम साधन अपनाने के कारण किसानों की लागत बढ़ गई। अच्छे मानसून से खेती की लागत घटती है और आम सीमांत किसान भी प्रकृति की देन से अपनी खेती बेहतर कर सकता है।

अगर पैदावार अच्छी है तो इसके प्रभाव भी कई मायनों में है। हम यह न भूलें कि कृषि का समूची अर्थव्यवस्था में योगदान भले चौदह प्रतिशत के आसपास है, मगर इस पर पचपन प्रतिशत से साठ प्रतिशत के बीच लोग निर्भर हैं। इतने लोग जिस कार्य पर निर्भर हों और उसको ताकत मानसून से मिलती तो इसका महत्त्व आप आसानी से समझ सकते हैं। अगर पैदावार अच्छी है, उसमें लागत कम है तो इसका असर महंगाई पर पड़ता है। यानी महंगाई कम होगी। इससे पूरी अर्थव्यवस्था को ताकत मिलती है। पचपन से साठ प्रतिशत लोगों की अगर आय ठीक होती है या बढ़ती है तो फिर बाजार में मांग बढ़ेगी और इससे अर्थव्यवस्था की गति तेज होगी। ब्याज दर घटेगी जिससे लोग कर्ज लेकर खरीदारी कर सकते हैं या फिर नए कारोबार आरंभ कर सकते है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि अगर मानसून अच्छा हुआ तो हमारी विकास दर आठ प्रतिशत के आसपास रह सकती है। तो विकास की गति भी मानसून पर निर्भर है।

इस समय हम कुछ क्षेत्रों में जो जल संकट देख रहे हैं उसका समाधान अच्छे मानूसन में ही निहित है। हालांकि हमारे यहां वर्षाजल के बेहतर परंपरागत प्रबंधन के ढांचे ध्वस्त होने से समस्याएं बढ़ गई हैं। कम बारिश के क्षेत्रों में ही नहीं, जहां ज्यादा बारिश होती है वहां भी पानी की समस्या से लोगों को जूझना पड़ता है जिसका समाधान पानी केबेहतर प्रबंधन में है। इसके प्रति जागरूकता बढ़ रही है। पर प्रबंधन तभी न होगा, जब बारिश हो। वैसे भी पर्याप्त वर्षा से नदियों, झीलों या हर प्रकार के जलाशयों-तालाबों में पानी भर जाता है। दूसरे, भूजल का स्तर ठीक होता है। यानी इससे जल-चक्र का नियमन होता है। यदि मानूसन अच्छा नहीं रहा तो भूजल का भी स्तर गिर जाता है और उसे निकालने के लिए काफी खर्च करना पड़ता है। पनबिजली परियोजनाओं से बिजली का अपेक्षित उत्पादन तो नदियों में जल के अपेक्षित स्तर पर ही निर्भर है। अगर मानसून अच्छा हो तभी बिजली उत्पादन घोषित लक्ष्य के अनुरूप होता है। मानसून अच्छा न होने पर बिजली उत्पादन में कमी होती है और इसका असर चारों ओर होता है।

मानसून के साथ एक और पहलू जुड़ा है और वह है इसकी मात्रा। यदि कहीं अति बारिश हो और कहीं कम, तो फिर इसका लाभ उस तरह नहीं हो सकता जैसा होना चाहिए। यानी बारिश के साथ इसका समान वितरण भी जरूरी है। मौसम विभाग का मानना है कि इस बार इसका वितरण भी समतुल्य रहेगा। औसतन जो कम बारिश और जो अति बारिश के क्षेत्र हैं वहां तो वैसा ही होगा लेकिन शेष क्षेत्र में यह सामान्य रहेगा। पश्चिमी तट और पूर्वाेत्तर के राज्यों में दो सौ से एक हजार सेमी बारिश होती है जबकि राजस्थान और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां मानसूनी बारिश सिर्फ दस से पंद्रह सेमी होती है। इसके अलावा शेष क्षेत्रों में बेहतर बारिश होगी। तो यह भी हमारे लिए राहत की भविष्यवाणी है। केरल में मानसून जून के शुरू में दस्तक देता है और अक्तूबर तक यानी करीब पांच महीने रहता है, जबकि राजस्थान में सिर्फ डेढ़ महीने मानसूनी बारिश होती है। वहीं से मानसून की विदाई होती है। तो देखते हैं क्या होता है।

मौसम विभाग ने यह भी साफ कर दिया है कि किस प्रदेश में कब मानूसन आएगा। इसके अनुसार केरल में मानसून एक जून को आएगा तो हैदराबाद और गुवाहाटी में पांच जून को, मुंबई तथा रांची में दस जून को, पटना में ग्यारह जून, गोरखपुर तेरह जून, वाराणसी पंद्रह जून, लखनऊ अठारह जून, देहरादून बीस जून, आगरा बीस जून, जयपुर पच्चीस जून, दिल्ली उनतीस जून, श्रीनगर तथा जैसेलमेर में एक जुलाई को मानूसन उतरेगा। इससे किसानों को अपनी फसलों के लिए पूर्व तैयारी का संदेश मिल गया है।

अच्छे मानसून की संभावना तथा इसकी तिथियों के मद्देनजर केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया कि वे जून से शुरू होने वाले खरीफ सत्र में फसल का रकबा और उत्पादन बढ़ाने की योजना तैयार करें। कृषि सचिव ने राज्य सरकारों से कहा है कि बीज, उर्वरक और अन्य कृषि लागतों की पर्याप्त उपलब्धता को सुनिश्चित करते हुए धान और दलहन जैसी खरीफ की फसलों की बुवाई की पहले से तैयारी कर लें। अगर मानसून की बेहतर संभावना न होती तो सरकार इतनी उत्साहित नहीं होती और न इस तरह का निर्देश जारी करने की स्थिति में होती। तो आइए दो साल की अल्प बारिश की परेशानी से निकलने के लिए तैयार रहें और झमाझम बारिश की प्रतीक्षा करें। हां यह संभव है कि कुछ क्षेत्रों में हमें बाढ़ का सामना भी करना पड़े।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.