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खेती पर गहराता संकट

निरंकार सिंह यूपीए सरकार के दस साल में डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या की। मोदी सरकार के समय भी यह सिलसिला रुक नहीं रहा। महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, पंजाब, बुंदेलखंड में किसानों की खुदकुशी के मामले बढ़े हैं। तमिलनाडु और गुजरात में भी कुछ घटनाएं हुई हैं। किसानों की खुदकुशी के पीछे सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि जैसे […]

निरंकार सिंह

यूपीए सरकार के दस साल में डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या की। मोदी सरकार के समय भी यह सिलसिला रुक नहीं रहा। महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, पंजाब, बुंदेलखंड में किसानों की खुदकुशी के मामले बढ़े हैं। तमिलनाडु और गुजरात में भी कुछ घटनाएं हुई हैं। किसानों की खुदकुशी के पीछे सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि जैसे कुदरती कारणों के अलावा दूसरे कारण भी हैं।

किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ने, पैदावार का वाजिब दाम न मिलने और कर नीति की विसंगतियों से लेकर आयात-निर्यात के गलत फैसलों से भी समस्याएं बढ़ी हैं। खेती की समस्याओं को दूसरी समस्याओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता। देश में खाद्य वस्तुओं की मांग और आपूर्ति में संतुलन बिगड़ने से खाद्यान्न की कीमतें तो बढ़ी हैं, पर किसानों का घाटा कम नहीं हो रहा है। इससे किसान संकट में हैं। दाल और खाद्य तेलों के आयात पर हमारी निर्भरता बढ़ी है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने भी इस साल कृषि उत्पादन में गिरावट का अनुमान लगाया है।

इस समय खाद्यान्न की कमी के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, आबादी के अनुपात में खाद्यान्न की वृद्धि न हो पाना। दूसरा, कल-कारखानों और बस्तियों के विस्तार के कारण खेती की जमीन में लगातार कमी। तीसरा, पुरानी विधियों और बीजों से अब खाद्यान्न उत्पादन में कोई वृद्धि न हो पाना। इसके अलावा खाद्यान्न के रखरखाव में भारी खामियां हैं, जिनके चलते लाखों टन खाद्यान्न सड़ जाता है। ऐसे में अगर तत्काल कुछ उपाय नहीं किए गए, तो खाद्य संकट और महंगाई के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ जाएंगी।

खेती योग्य भूमि की उर्वरता और क्षरण को लेकर कई अध्ययन हुए हैं। पर पहली बार अमदाबाद के स्पेस एप्लिकेशन सेंटर ने सत्रह अन्य एजेंसियों की मदद से पूरे देश की कृषि भूमि की दशा का ब्योरा पेश किया है। इसके अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का चौथाई हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो गया है। कुल बत्तीस फीसद भूमि की गुणवत्ता घटी है। वहीं देश की उनहत्तर फीसद जमीन शुष्क क्षेत्र में शुमार की गई है। जमीन की गुणवत्ता को जल्द खराब होने से बचाने का बड़ा अभियान शुरू नहीं किया गया, तो देश की आबादी के बड़े हिस्से के लिए न सिर्फ आजीविका का संकट और गहरा जाएगा, बल्कि जैव-विविधता का जबरदस्त नुकसान होगा।

अब तक राजस्थान और कुछ हद तक गुजरात को रेगिस्तान के लिए जाना जाता है। मगर यह अध्ययन बताता है कि रेगिस्तान की प्रक्रिया बर्फीली वादियों और जंगलों के लिए मशहूर जम्मू और कश्मीर तक में चल रही है। राजस्थान का 21.77 फीसद, जम्मू और कश्मीर का 12.79 फीसद और गुजरात का 12.72 फीसद क्षेत्र रेगिस्तान बन चुका है।

भारत का पश्चिमी और उत्तरी इलाका इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है। इस रुझान को तुरंत थामे जाने की जरूरत है। रेगिस्तानीकरण, भूमि कटाव और क्षरण का सबसे बड़ा कारण है भूजल के स्तर में कमी आना। भूजल के अंधाधुंध दोहन, जमीन के कटाव और 1999 के बाद से मानसून के अनियमित होने से देश की जमीन का खासा हिस्सा बंजर भूमि में तब्दील हो गया है। दूसरा बड़ा कारण वनस्पति क्षेत्र का सिकुड़ना है। जंगल विकास परियोजनाओं और अवैध कटाई की भेंट चढ़ रहे हैं। इसके अलावा चराई, एक ही तरह की फसल लेना जैसी वजहें मौजूद हैं।

अब खनन, उद्योग, ऊर्जा उत्पादन, शहरीकरण आदि तेजी से जमीन लील रहे हैं। जो जमीन बची है उस पर अन्न की पैदावार बढ़ाने का दबाव है। जमीन के टिकाऊपन का खयाल किए बगैर उसमें रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों को झोंक दिया जाता है।

पंजाब और हरियाणा जैसे हरित क्रांति वाले इलाकों में खेतों में नहर का पानी जरूरत से ज्यादा छोड़े जाने से जमीन के क्षारीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई है। इस समस्या के पूरे विस्तार में जाने और अलग-अलग राज्यों या क्षेत्रों में कारणों के समुचित अध्ययन पर आधारित कार्रवाई योजनाएं बनाने की जरूरत है।

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आइएफपीआरआइ) के शोध-पत्र में बताया गया है कि गुजरात में सन 2000 से कृषि मूल्यवर्धन 9.6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है, जो भारत की विकास दर के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है और पंजाब में हरित क्रांति के दौरान हासिल की गई विकास दर के मुकाबले अधिक है। इसके अलावा हजारों की संख्या में चेक डैम बनाए गए हैं, ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा दिया गया है और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क में भारी बढ़ोतरी की गई है। सिंचित क्षेत्र में हर साल 4.4 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है और करार खेती से विपणन में मदद मिली है।

अगले चालीस साल में देश की आबादी 160 करोड़ से ऊपर हो जाएगी। इसके साथ ही खाद्यान्न की हमारी मांग भी लगभग दोगुनी बढ़ जाएगी। पर कृषि के विस्तार के लिए हमारे पास बहुत सीमित संभावनाएं बची हैं। लेकिन खाद्य आपूर्ति बढ़ाने के लिए इसकी जरूरत तो पड़ेगी ही। पिछले पच्चीस साल में कृषि में निवेश लगातार घट रहा है। जीएम खाद्य के अलावा कृषि पर होने वाला शोध भी बहुत ज्यादा नहीं हो रहा। हरित क्रांति के दौरान हमने फसलों की पैदावार को तीन से छह फीसद तक बढ़ा लिया था, अब यह बस एक फीसद की रफ्तार से बढ़ रही है। कुछ जगह तो इस पर विराम ही लग गया है। इस संकट को ऐसे भी समझा जा सकता है कि उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि के बावजूद सरकार को गेहूं आयात करना पड़ा है। हालांकि इसका एक कारण कुप्रबंधन भी था।

यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान गरीबों पर खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने की मार तो पड़ी ही, इस दौरान खाद्यान्न की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी काफी कम हुई। यह आंकड़ा 2002 में 494 ग्राम प्रतिदिन से ज्यादा था, जो पांच साल बाद घट कर 439 ग्राम पर पहुंच गया। विश्व भूख सूचकांक में भूख से लड़ रहे अट्ठासी देशों की सूची में भारत का स्थान छियासठवां है। ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार ऐसे एक सौ अस्सी देशों की फेहरिस्त में भारत का स्थान चौरानबेवां है और अगर बाल कुपोषण सूचकांक को देखें तो वहां भारत एक सौ सत्रहवें स्थान पर है, सिर्फ बंग्लादेश से आगे।
खाद्य संकट गहराने के कई कारण हैं। बौद्धिक संपदा अधिकार के जरिए संकर प्रजाति तैयार करने के लिए जो शोध किया जा रहा है वह विकसित देशों के धनी किसानों की जरूरतों पर आधारित है। ऐसे में उन उष्णकटिबंधीय फसलों को नजरअंदाज किया जाता है, जिन पर बड़ी संख्या में लोग निर्भर हैं। और चूंकि बीज कंपनियां धनी देशों से ताल्लुक रखती हैं, इसलिए आइपीआर का परिणाम संसाधनों के दक्षिण से उत्तर की ओर स्थानांतरण के रूप में देखने को मिल रहा है। इसके अलावा अब खाद्य उत्पादक की प्रधानता घट रही है और पेटेंट के अधिकारी का वर्चस्व बढ़ रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत ओलेवियर डी शटर ने वाणिज्यिक बीजों पर बढ़ती निर्भरता पर चिंता प्रकट की है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि बीजों पर आइपीआर के बढ़ते शिकंजे के परिणामस्वरूप किसानों की निर्भरता से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं और विकासशील देशों की सरकारों को इस दिशा में तत्काल आवश्यक कदम उठाने चाहिए। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि विकासशील देशों को बौद्धिक संपत्ति का चुनाव अपनी जरूरतों के मुताबिक करना चाहिए न कि उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए। इस बारे में भारत सरकार को खासतौर से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि भारत भी इस जाल में फंसता जा रहा है।

किस फसल की पैदावार सबसे कम है और कहां शोध की जरूरत है, इस बारे में कोई मसौदा तैयार किए बगैर सरकार ने जैव विविध बीज कंपनियों द्वारा तैयार सूची को स्वीकार कर आसान रास्ता चुन लिया है। सबसे बुरी स्थिति यह है कि राज्य कृषि विश्वविद्यालय जैसे सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित संस्थानों ने भी इस रणनीति को अपना लिया है और अब वे मोनसेंटों जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा चिह्नित फसलों पर शोध कर रहे हैं।

शटर की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी मोनसेंटों की वैश्विक बाजार में तेईस प्रतिशत हिस्सेदारी है। मोनसेंटों इन संस्थानों को शोध के लिए मुफ्त में बीज भी मुहैया करा रही है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने कुछ सब्जियों और खाद्यान्न का चयन किया है, अब उसे अपने शोध एजेंडे के पक्ष में दलील तैयार करनी है। चिंता की सबसे बड़ी वजह यह है कि वाणिज्यिक बीज प्रणाली कृषि जैव विविधता के लिए एक चुनौती बन सकती है।
जैव विविधता में पहले ही डेढ़ सौ कृषि फसलों की कमी हो चुकी है। शटर ने श्रीलंका का उदाहरण दिया है, जहां 1959 में करीब दो हजार किस्मों के धान की खेती होती थी, वह संख्या आज घट कर सौ से भी कम रह गई है। जैव विविधता इसलिए दबाव में है कि सभी पर एक जैसे उन्नत बीजों को अपनाने का जोर लगातार बढ़ रहा है। भारत में पिछली आधी शताब्दी के दौरान करीब एक हजार किस्में गायब हो गई हैं।

हमारा अपना शोध भी अब महज विदेशों में विकसित प्रौद्योगिकियों पर आधारित नहीं हो सकेगा। मसलन अब हम यह मान कर नहीं चल सकते कि मैक्सिको की ज्यादा फसल और उत्पादन देने वाले उन बीजों की, जिन्हें हमने हरित क्रांति के आरंभ में उपयोग किया था, आगे भी सुगम उपलब्धता के बारे में आश्वस्त हो सकेंगे। इस संबंध में अमेरिका द्वारा बासमती चावल उगाने के नए तरीकों को पेटेंट कराने की कोशिशों को याद रखना होगा। अगर हमने खाद्यान्न का आयात शुरू कर दिया तो बहुत से विकसित देश अनाज का निर्यात करना अपना धंधा बना लेंगे। एक बार हमने अपने लोगों के लिए अनाज आयात करना शुरू किया, तो विदेशी कंपनियां और सरकारें अपने व्यापारिक और दूसरे किस्म के लाभों के लिए, राजनीतिक दांव-पेचों का इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे। यह भी संभव है कि वे शर्तनामे तैयार करते वक्त उसमें तरह-तरह की शर्तें लगाना भी शुरू कर दें, जिससे उन पर हमारी निर्भरता स्थायी हो सकती है।

ऐसी स्थितियों का सामना करने के लिए हमें अपने और इस प्रकार के छद्म दबावों को व्यर्थ करने के लिए अपने दबाव भी बनाने की कला सीखनी होगी और चूंकि जलवायु में होने वाले परिवर्तन कृषि को भी प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए हमें नवीनतम प्रासंगिक तथ्यों को छानते रहना चाहिए, ताकि हम अपनी कृषि की सुरक्षा के लिए पहले से तैयार रहें।

 

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