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पोषाहार योजना की सेहत

यह योजना बच्चों के मध्य जाति और वर्ग के अवरोध को मिटाने में भी नाकाम रही है। आए दिन मध्याह्न भोजन को लेकर छुआछूत की खबरें देश को शर्मसार करती हैं।

Author नई दिल्ली | February 29, 2016 12:23 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (मध्याह्न भोजन योजना, फाइल फोटो)

हाल ही में आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की यह रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि देश के अधिकतर राज्य सरकारी स्कूलों में दिए जाने वाले मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) की गुणवत्ता की जांच के प्रति लापरवाह हैं और उनके पास गरीब बच्चों की पहचान के लिए कोई निश्चित मापदंड नहीं है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि लेखा परीक्षा में नमूना जांच में पाया गया कि अधिकतर विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं मसलन रसोई शैडो, समुचित बर्तन और पेयजल सुविधा का घोर अभाव है और यह जानना भी मुश्किल है कि स्कूली बच्चों की आड़ में मध्याह्न भोजन को कौन निवाला बना रहा है। कैग ने इस योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार को सलाह दी है कि वह उन बच्चों की पहचान करे जो वास्तव में इस योजना का फायदा नहीं ले पा रहे हैं और उनके नाम पर आबंटित धन किसी और की जेब में जा रहा है।

कैग का कहना है कि मध्याह्न भोजन योजना छात्रों को स्कूल तक लाने का एक सशक्त जरिया है और इस लिहाज से स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़नी चाहिए। योजना को लागू करते समय तर्क दिया गया था कि अधिक छात्रों के नामांकन और अधिक छात्रों की नियमित उपस्थिति के संबंध में स्कूल भागीदारी पर मध्याह्न भोजन का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। माना गया कि अधिकतर बच्चे खाली पेट स्कूल पहुंचते हैं और उन्हें दोपहर तक भूख लग आती है, इस वजह से वे अपना ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित नहीं कर पाते। मध्याह्न भोजन बच्चों के लिए पूरक पोषण का काम करेगा और उनका ध्यान पढ़ाई की तरफ केंद्रित होगा। जो बच्चे स्कूल नहीं आते वे भी मध्याह्न भोजन से आकर्षित होकर आएंगे।

लेकिन कैग ने अपनी पड़ताल में पाया है कि जिन स्कूलों में यह योजना चलाई जा रही है, उनमें छात्रों की संख्या पिछले वर्षों में लगातार कम हुई है। रिपोर्ट की मानें तो वर्ष 2009-10 से 2013-14 तक देश भर के स्कूलों में छात्रों की संख्या 14.69 करोड़ से घट कर 13.87 करोड़ रह गई है। जबकि इसी दौरान निजी स्कूलों में छात्रों की संख्या में अड़तीस फीसद का इजाफा हुआ है और वह संख्या 4.02 करोड़ से बढ़ कर 5.53 करोड़ हो गई है। नि:संदेह छात्रों की घटती संख्या की ढे़र सारी वजहें हो सकती हैं। लेकिन इसका एक कारण योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार भी है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2009-10 से 2013-14 के बीच, नौ राज्यों के नमूना जांच में पाया गया कि अधिकांश विद्यालयों में बच्चों को निर्धारित पोषणयुक्त भोजन नहीं दिया गया।

इस योजना में सुनिश्चित किया गया है कि छात्रों को भोजन परोसने से पहले शिक्षक उसकी गुणवत्ता की जांच करें। लेकिन कैग की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि असम, बिहार, दमण-दीव, गोवा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, मणिपुर और लक्षद्वीप में बच्चों को प्रदान किए जा रहे भोजन की गुणवत्ता की जांच में शिक्षक शामिल नहीं रहे। साथ ही छत्तीसगढ़, मेघालय, सिक्किम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में पके हुए भोजन में प्रदत्त न्यूनतम कैलोरी तथा प्रोटीन सुनिश्चित करने के लिए किसी रजिस्टर की व्यवस्था नहीं की गई। कैग की पड़ताल में यह भी पाया गया है कि विद्यालयों में खुले स्थानों पर अस्वास्थ्यकर स्थिति में भोजन बनाया जा रहा है जिससे बच्चों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। आए दिन मध्याह्न भोजन में कीड़े मिलने और छात्रों के बीमार पड़ने की खबर आए दिन आती रहती है।

इस सब के बावजूद मध्याह्न भोजन की स्वच्छता और गुणवत्ता को लेकर सतर्कतापूर्ण कदम नहीं उठाया जा रहा है। इसकी बानगी देखिए। पिछले वर्ष बिहार में सीवान जिले के महाराजगंज अनुमंडल के हसपुरवा पंचायत स्थित विद्यालय में मध्याह्न भोजन से दो दर्जन से अधिक छात्र बीमार पड़ गए। गत वर्ष जलंधर के कई स्कूलों में मध्याह्न भोजन की जांच हुई और उसमें कीड़े पाए गए। राजस्थान के कंचनपुर क्षेत्र के पंजीपुरा आंगनबाड़ी केंद्र में दूषित मध्याह्न भोजन से तेईस बच्चे मौत के मुंह में जाते-जाते बचे। राजधानी दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में मध्याह्न भोजन में कीड़े पाए गए और उसे खाकर बीस बच्चे बीमार पड़ गए। इसी तरह 22 जनवरी 2011 को नाशिक (महाराष्ट्र) के नगर निगम के एक स्कूल में जहरीला भोजन खाने से इकसठ बच्चे बीमार पड़े। 25 नवंबर 2009 को दिल्ली में त्रिलोकपुरी स्थित एक विद्यालय में जहरीला खाना खाने से दस दर्जन छात्राओं की हालत बिगड़ गयी। 24 अगस्त 2009 को मध्यप्रदेश के सिवनी में एक सरकारी स्कूल में मध्याह्न भोजन करने से आधा दर्जन छात्र बीमार पड़े। यहां भोजन में मरी छिपकली पाई गई। 12 सितंबर 2008 को झारखंड के एक स्कूल में जहरीला भोजन करने से पांच दर्जन छात्र बीमार पड़ गए।

याद होगा, जुलाई, 2013 में बिहार के सारण जिले में एक सरकारी विद्यालय में कीटनाशक पदार्थों से युक्त मध्याह्न भोजन खाने से तेईस बच्चों की मौत हुई थी। तब सभी राज्य सरकारों ने मिड-डे मील की गुणवत्ता को लेकर ढे़र सारे दिशा-निर्देश जारी किए। लेकिन आज भी मिड-डे मील में प्रयुक्त खाद्य सामग्रियों की समुचित जांच-परख नहीं हो रही है। भ्रष्टाचार की शिकार बन चुकी इस योजना को लेकर न तो राज्य सरकारें फिक्रमंद हैं और न ही केंद्र सरकार। विगत पांच वर्षों में इस योजना पर चालीस हजार करोड़ रुपए से अधिक धन खर्च हो चुका है। लेकिन उसका अपेक्षित परिणाम नहीं आया है।

भारत में प्राथमिक शिक्षा किस कदर बदहाल है, पिछले वर्ष आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट इसका खुलासा करती है। ‘एजुकेशनल फॉर आॅल ग्लोबल मॉनिटरिंग 2013-14’ नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में निरक्षर युवाओं की तादाद अट्ठाईस करोड़ से अधिक है और यह आंकड़ा दुनिया के निरक्षर युवाओं की कुल तादाद का तकरीबन सैंतीस फीसद है। इस रिपोर्ट में प्राथमिक शिक्षा की बदहाली के बहुतेरे कारण गिनाए गए हैं जिनमें एक कारण बच्चों का स्कूल न जाना भी है। यह स्थिति तब है जब देश में एक अप्रैल 2010 से छह से चौदह वर्ष के बच्चों को अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार हासिल है। मजे की बात यह कि पिछले चार वर्षों में तकरीबन सवा लाख करोड़ रुपए इस पर खर्च भी किए जा चुके हैं। मध्याह्न भोजन योजना और सर्वशिक्षा अभियान के जरिए बच्चों को स्कूल पहुंचाने की तमाम कवायद के बाद भी आज छह से चौदह वर्ष के करोड़ों बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं।

मध्याह्न भोजन योजना 15 अगस्त 1995 को प्रारंभ की गई। इस योजना के मुख्य तीन लक्ष्य निर्धारित किए गए। एक, सरकारी स्थानीय निकाय और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल और ईजीएस व एआईई केंद्रों तथा सर्वशिक्षा अभियान के तहत सहायता प्राप्त मदरसों एवं मकतबों में कक्षा एक से आठ तक के बच्चों के पोषण-स्तर में सुधार करना। दूसरा, वंचित वर्गों के बच्चों को नियमित रूप से स्कूल आने और कक्षा के कार्यकलापों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करना, और तीसरा, ग्रीष्मावकाश के दौरान अकाल-पीड़ित क्षेत्रों में प्रारंभिक स्तर के बच्चों को पोषण संबंधी सहायता प्रदान करना।

इस योजना के अंतर्गत सर्वप्रथम कक्षा एक से पांच तक प्रदेश के सरकारी, परिषदीय और राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले सभी बच्चों को अस्सी फीसद उपस्थिति पर प्रतिमाह तीन किलोग्राम गेहूं अथवा चावल दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। मगर योजना के अंतर्गत छात्रों को दिए जाने वाले खाद्यान्न का पूर्ण लाभ विद्यार्थी को न प्राप्त होकर उसके परिवार में बंट जाता था। बाद में उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर 1 सितंबर 2004 से पका-पकाया भोजन प्राथमिक विद्यालयों में उपलब्ध कराने की योजना शुरू हुई। अक्टूबर 2007 से इसे शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े ब्लॉकों में स्थित उच्चप्राथमिक विद्यालयों तथा अप्रैल 2008 से देश के सभी ब्लॉकों और शहरी क्षेत्रों में स्थित उच्चप्राथमिक विद्यालयों तक लागू कर दिया गया।

आज की तारीख में यह योजना देश के 13.36 लाख स्कूलों के तकरीबन बारह करोड़ बच्चों को अपने दायरे में लिये हुए है। मध्याह्न भोजन योजना से चौबीस लाख रसोइयों को रोजगार मिला है और भोजन बनाने के लिए 5 लाख 77 हजार किचन बनाए गए हैं। निश्चित रूप से यह योजना एक हद तक बच्चों की भूख मिटाने और उन्हें पढ़ाई के प्रति आकर्षित करने में कारगर सिद्ध हुई है। यह भी सही है कि प्रारंभ में इस योजना से सरकारी और सहायता-प्राप्त विद्यालयों से छात्रों का पलायन रुका और छात्रों की संख्या में इजाफा हुआ। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह यह योजना भ्रष्टाचार का शिकार बनी उससे इसके सार्थक उद्देश्यों पर न सिर्फ पानी फिरा है बल्कि गुणवत्ता-रहित भोजन छात्रों की सेहत और जिंदगी पर भारी पड़ा है।

यह योजना बच्चों के मध्य जाति और वर्ग के अवरोध को मिटाने में भी नाकाम रही है। आए दिन मध्याह्न भोजन को लेकर छुआछूत की खबरें देश को शर्मसार करती हैं। बेहतर होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक की सलाह को गंभीरता से लें और योजना की निगरानी के लिए कारगर तंत्र विकसित करें। साथ ही गरीब बच्चों की पहचान के लिए मानदंड निर्धारित करें और यह सुनिश्चित करें कि तय मानकों के मुताबिक ही बच्चों को पोषाहार उपलब्ध हो। उन्हें समझना होगा कि बच्चे राष्ट्र की पूंजी हैं और उनकी जिंदगी से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।

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