ताज़ा खबर
 

दुग्ध उत्पादन पर जलवायु की मार

भारत में 2020 तक सालाना दूध उत्पादन में चालीस लाख टन की कमी आने की संभावना जताई गई है। हाल में, मुंबई में भारतीय डेयरी संघ द्वारा आयोजित पैंतालीसवें डेयरी उद्योग सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य में दुग्ध उत्पादन की वर्तमान क्षमता को कायम रखना बड़ी चुनौती होगी।

Author March 2, 2017 6:17 AM
भारत में 2020 तक सालाना दूध उत्पादन में चालीस लाख टन की कमी आने की संभावना जताई गई है। हाल में, मुंबई में भारतीय डेयरी संघ द्वारा आयोजित पैंतालीसवें डेयरी उद्योग सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य में दुग्ध उत्पादन की वर्तमान क्षमता को कायम रखना बड़ी चुनौती होगी।

ममता सिंह

भारत में 2020 तक सालाना दूध उत्पादन में चालीस लाख टन की कमी आने की संभावना जताई गई है। हाल में, मुंबई में भारतीय डेयरी संघ द्वारा आयोजित पैंतालीसवें डेयरी उद्योग सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य में दुग्ध उत्पादन की वर्तमान क्षमता को कायम रखना बड़ी चुनौती होगी। 2015-16 में दुग्ध उत्पादन सोलह करोड़ टन था। विशेषज्ञों के मुताबिक, विशेष रूप से मिली-जुली नस्ल की गायों पर बढ़ते तापमान के असर की वजह से भविष्य में घरेलू मांग को पूरा करना काफी मुश्किल होगा। गरमी का पशुओं की प्रजनन क्षमता पर भी गहरा असर पड़ता है। हाल के अनुसंधान से पता चला है कि गरमी की वजह से पशुओं की दूध देने की क्षमता प्रभावित होती है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। वैश्विक दुग्ध उत्पादन में भारत का हिस्सा उन्नीस फीसद है। आगामी वर्षों में दूध और दुग्ध उत्पादों के भारतीय बाजार में सालाना पंद्रह फीसद गिरावट की संभावना है। नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2004-05 में लोगों के फूड बजट में दूध का हिस्सा एकाएक घटा, लेकिन 2009-10 से लेकर 2011-12 के बीच यह एकदम से बढ़ गया। ग्रामीण इलाकों में दुग्ध उत्पादों पर खर्च में एक सौ पांच फीसद की वृद्धि दर्ज हुई, जबकि शहरी इलाकों में यह नब्बे फीसद रहा।वर्ष 2004-05 की अपेक्षा 2011-12 में प्रति व्यक्ति दूध की खपत में ग्रामीण इलाकों में प्रति माह 470 मिलीलीटर इजाफा हुआ है, जबकि शहरी इलाकों में यह बढ़ोतरी 315 मिलीलीटर है। निर्यात के मामले में भी देश का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है। एग्रीकल्चरल ऐंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुताबिक 2013-14 में भारत ने 3,318 करोड़ रुपए के डेयरी उत्पादों का निर्यात किया। पर यह आंकड़ा आने वाले सालों में कम होगा।

कृषि मंत्रालय के पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग की एक रिपोर्ट से जाहिर होता है कि विदेशीं की जगह देसी मवेशियों की संख्या में इजाफा उत्साहजनक नहीं है। देश में पचपन फीसद दूध मुर्रा, मेहसाणा और सुरती जैसी भैंसों की देसी प्रजातियों से मिलता है। इसी तरह गाय की साहीवाल और गीर जैसी नस्लों को बढ़ावा मिल रहा है। लेकिन दूध की मशीन समझी जाने वाली विदेशी नस्ल की हल्स्टन, ब्राउंसवियर और जर्सी की संकर प्रजातियां अधिक दूध देने की वजह से ज्यादा पाली जा रही हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि विदेशी यानी संकर दुधारू गोवंश पशुधन में 2012 में 34.78 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि देसी नस्ल के मामले में यह वृद्धि 0.17 फीसद रही। अब तो जलवायु पविर्तन का असर देशी और विदेशी दोनों नस्लों पर पड़ेगा।
दुग्ध उत्पादन में भैंस का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन देश में भैंसों की कमी भविष्य में देखने को मिल सकती है। भारत पूरी दुनिया में भैंस का मांस निर्यात करने वाले अव्वल देशों में एक है। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में मांस उत्पादन की दर कम नहीं हुई तो जितने दूध का उत्पादन इस समय भारत में हो रहा है, 2022 के बाद उसमें कमी आएगी।

भारत में जिस तादाद में भैंसों के मांस का निर्यात बढ़ रहा है, उसका दूध उत्पादन पर असर पड़ सकता है। विभिन्न राज्यों में गाय के मांस पर पाबंदी होने की वजह से भैंस के मांस का घरेलू उपयोग बढ़ा है। भारत सरकार के पशुपालन-डेयरी और मछली पालन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लोग पोल्ट्री पैंतालीस फीसद, भैंस उन्नीस फीसद, बकरा सोलह फीसद, सूअर आठ फीसद और भेड़ का मांस सात फीसद खाते हैं।वर्ष 2014 के बाद भारत भैंस के मांस का निर्यात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन गया है। वर्ष 2015 में भारत में भैंस के मांस का कुल उत्पादन 37.96 लाख टन हुआ। इसमें से बीस लाख टन निर्यात किया गया। बाकी घरेलू खपत में गया। पश्चिमी देशों में साफ निर्देश है कि मीट के लिए वही जानवर काटे जाएंगे जो दूध देने लायक नहीं हैं। भारत में मीट के लिए प्रयोग होने वाले जानवरों संबंधी दिशा-निर्देश से ज्यादातर लोग अनजान हैं। जिस प्रकार सरकार की पोल्ट्री और मछली पालन उद्योग के लिए योजनाएं हैं, उसी प्रकार मीट वाले जानवरों को पालने की भी होनी चाहिए।

दूध के महंगा होने के पीछे मानसून की विफलता एक बड़ा कारण रहा है। इसके चलते जहां हरे चारे की उपलब्धता काफी कम हो गई, वहीं पशुचारे के रूप में इस्तेमाल होने वाले दूसरे विकल्पों के दाम तीस फीसद तक बढ़ गए हैं। देश में मांग और आपूर्ति का असंतुलन पैदा हो गया। यही वजह है कि पिछले एक माह में जहां देश के कई हिस्सों में मक्खन की उपलब्धता प्रभावित हुई है, वहीं कंपनियों ने इसके दाम में भी तीस से पैंतीस रुपए किलो तक का इजाफा कर दिया। घी की कीमत दो सौ रुपए प्रति किलो तक बढ़ा दी गई। बड़ी दूध कंपनियों ने दूध की खुदरा कीमतें भी बढ़ाई हैं।गांव की आर्थिक संरचना को मजबूत करने में दुग्ध उत्पादन का महत्त्वपूर्ण योगदान है। गांवों में हो रहे दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कई तरह से डेयरी योजनाओं के विकास पर काम कर रही है। ग्रामीण बड़े पैमाने पर दूध का उत्पादन कर सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों के लिए दुधारू मवेशी योजना के तहत लाभ दिया जाता है। इस योजना के अंतर्गत दुग्ध उत्पादन करने वाले को पचास फीसद अनुदान और पचास फीसद ऋण पर दो दुधारू मवेशी दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन इसमें में भी पशुपालकों को दिक्कतें आ रही हैं। पशुपालकों को समय पर ऋण नहीं मिल रहा है।

दुग्ध-उत्पादन के लिए केंद्र सरकार की भी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। डेयरी इंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट स्कीम के तहत दुग्ध उत्पादन करने वालों को वित्तीय सहयोग किया जाता है। यह छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों को प्रमुख रूप से देने की व्यवस्था है, लेकिन इस बारे में सत्तर फीसद किसानों को कोई जानकारी ही नहीं है।दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए कई तरह के इंजेक्शनों का प्रयोग पशुओं पर किया जाता है, हालांकि कनाडा सहित कई देशों ने दुग्ध उत्पादन में सहायक हार्मोन के इंजेक्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन भारत में इस तरह के इंजेक्शन का उपयोग धड़ल्ले से किए जा रहे हैं। इंजेक्शन दुधारू पशुओं में पैर की समस्या, स्तन में सूजन और प्रजनन को प्रभावित कर रहा है। अब वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि जलवायु पविर्तन का असर पशुओं के प्रजनन पर अधिक पड़ेगा। दुधारू पशु पहले से ही लेप्टोस्पाइरोसिस, काऊ पाक्स, टीबी, ब्रूसल्लोसिस और लिस्टिरिया जैसे रोगों से ग्रस्त हैं।
आजकल दुधारू पशुओं को दूहने के लिए बिजली द्वारा संचालित मशीनों का भी उपयोग किया जाता है। इससे भी पशुओं में समस्याएं आ रही हैं। ऐसे में दुग्ध उत्पादन की स्थिति आने वाले सालों में क्या होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों को भी आवश्यक कदम उठाना होगा। वरना आने सालों में दुग्ध के लिए हर भारतीय को संघर्ष करना पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिर्वतन का असर यों ही रहा तो 2020 से दुग्ध उत्पाद पर असर दिखेगा। साथ ही, वर्ष 2030 से देश में दुग्ध उत्पादन पर संकट के बादल छा जाएंगे। शुद्ध दूध अब भी नहीं मिल रहा है, उस समय मिलावटी दूध भी मिलना मुश्किल हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश: कैराना में बोले राजनाथ सिंह- “देखेंगे, कितना मां का दूध पिया है”

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App