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मसर्रत आलम रिहाई: अंतर्विरोध को साधने की कवायद

जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की जेल से रिहाई को अस्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा है कि ऐसा भारत सरकार को जानकारी दिए बिना किया गया है। देश की एकता और अखंडता के लिए जो भी जरूरी होगा, सरकार करेगी। वे संसद में मुफ्ती मुहम्मद सईद के नेतृत्व वाली […]

Author March 12, 2015 10:12 AM
जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की जेल से रिहाई पर हंगामा

जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की जेल से रिहाई को अस्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा है कि ऐसा भारत सरकार को जानकारी दिए बिना किया गया है। देश की एकता और अखंडता के लिए जो भी जरूरी होगा, सरकार करेगी। वे संसद में मुफ्ती मुहम्मद सईद के नेतृत्व वाली राज्य की पीडीपी-भाजपा सरकार के मसर्रत की रिहाई के फैसले पर विपक्ष द्वारा आक्रोश प्रकट करने पर बोल रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि हमें कोई देशभक्ति का पाठ न पढ़ाए। हमें कोई ऐसी हरकत स्वीकार नहीं है जो देश की एकता और अखंडता में बाधक हो, मैं देश के आक्रोश में अपना स्वर भी मिलाता हूं।

प्रधानमंत्री की यह चिंता स्वाभाविक है, संसद ने इस पर संतोष भी प्रकट किया है। लेकिन मूल प्रश्न तो यही है कि जब कानून और व्यवस्था संविधान के अनुसार राज्य का विषय है तो वहां सरकारों को कितना अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त होगी? यह कहा जा सकता है कि संविधान के अनुसार व्यवस्था का संचालन करना राज्य का दायित्व है, वह इसमें तसाहुली या असावधानी करे तो यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। केंद्र तो संघात्मक व्यवस्था का दायित्व निभाने वाला है, लेकिन इसमें भी राज्य को पूर्ण माना गया है।

संवैधानिक प्रमुख निर्वाचित व्यक्ति नहीं बल्कि केंद्र द्वारा नामित राज्यपाल होता है, सरकारें राज्यपाल के ही नाम पर व्यवस्था का संचालन करती हैं। मंत्रिपरिषद तो उसे परामर्श देने वाली संस्था है। लेकिन जब भावी व्यवस्था का प्रश्न उठता है तो राज्यपाल निर्णय अपने विवेक के अनुसार करते हैं।

केंद्र सरकार को भी यह अधिकार प्राप्त है कि वह विधानसभाओं को निलंबित या बर्खास्त कर सकती है। ऐसी स्थिति में राज्यपाल राज्य के सभी दायित्वों का संचालन अपने हाथ में ले लेता है।

यही प्रश्न उस समय भी फंसा था जब 1955 में शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया गया। उसके बाद राज्यपाल के विवेक को भी राष्ट्रपति शासन के दौरान प्रदेश की जनता की सहमति माना गया। उसके बाद जम्मू-कश्मीर भी अनुच्छेद-370 के बावजूद केंद्र के अधीन एक राज्य बन गया, जहां सरकार बर्खास्त हो सकती है और नई व्यवस्था तक उसका संचालन राज्यपाल ही करता है।

अब सवाल उठता है कि जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति संविधान में वर्णित अनुच्छेद-370 के बावजूद बदल गई है, लेकिन तब भी संविधान में जो राज्यों का वर्गीकरण और अधिकारों का विभाजन हुआ है उसमें आज भी कानून और व्यवस्था राज्य के ही विषय हैं। इसीलिए जब अपराधों पर नियंत्रण के लिए केंद्रीय एजेंसी बनाने का प्रश्न था तो कश्मीर ही नहीं बल्कि कई राज्यों ने इसका विरोध और इसे अस्वीकार किया था, यह कहते हुए कि हम इसमें केंद्र को दखलंदाजी नहीं करने देंगे।

अब भी अपराधों की जांच-पड़ताल के लिए जिस केंद्रीय जांच ब्यूरो का गठन किया गया है वह स्वयं न तो कोई मामला अपने हाथ में ले सकता है और न केंद्र के आदेश से उसमें कोई दखलंदाजी कर सकता है। जब राज्य कोई मामला उसे जांच के लिए सौंपता है तो वह उसे स्वीकार या अस्वीकार करता है।

इसी प्रकार उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जिन प्रकरणों को सीबीआइ को जांच के लिए सौंपते हैं वह उन्हें स्वीकार करती है, क्योंकि न्यायालय संवैधानिक संस्थान हैं, उन्हें केंद्र के अधीन के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता बल्कि उनकी स्वतंत्रता किस प्रकार बनी रहे, इसके लिए समय-समय पर विचार होते रहते हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार ने जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के चयन के लिए अलग से बोर्ड बनाया तो भी कुछ लोगों को आपत्ति यही थी कि इसे तो सर्वोच्च न्यायालय के विवेक पर ही छोड़ देना चाहिए। लेकिन चूंकि देश का संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति है, उसके अधिकार और सीमाओं में न्यायालय और सेनाएं भी आती हैं, वही सर्वोच्च सेनापति भी है और वही नियुक्ति संबंधी आदेश भी जारी करता है, इसलिए यह माना गया कि सर्वोच्च न्यायालय भी संविधान, संसद और राष्ट्रपति से परे संस्थान नहीं है। लिहाजा, न्यायाधीशों को हटाने के लिए संसद ही महाभियोग पर विचार करती है और निर्धारित संवैधानिक विधि के अनुसार वे फैसले मान्य भी होते हैं।

अब मसर्रत आलम की रिहाई राज्य सरकार द्वारा की गई, लेकिन जिन मामलों में स्पष्ट विधिक व्यवस्था है, राज्य सरकारें भी उसके विपरीत आचरण नहीं कर सकतीं। इसलिए राज्य सरकार, जो सभी विचाराधीन मामलों में अभियोक्ता और प्रथम पक्ष है, उसे यह भी अधिकार है कि न्यायालय में किसी विचाराधीन प्रकरण को वापस ले ले, लेकिन यह बिना न्यायालय की सहमति और स्वीकृति के नहीं हो सकता। इसीलिए कई प्रकरणों में राज्य के आदेशों को भी न्यायाधीशों ने स्वीकार नहीं किया। लिहाजा, संविधान ही प्रमुख है, उसके अधीन संचालित संस्थाएं नहीं।

सवाल यह उठता है कि राज्यों को कितनी स्वायत्तता होगी? राज्य क्या केंद्र की इच्छा का पालन करेंगे? अगर ऐसा हुआ तो फिर यह राज्य नाम की संस्था, स्वतंत्रता जिसका प्रमुख गुण है, अपने महत्त्व को कैसे बचा पाएगी। भारत जैसे बहुदलीय संसदीय प्रणाली वाले देश में विभिन्न विषयों पर वैचारिक एकता संभव नहीं है इसलिए इसका प्रभाव भी अलग-अलग क्षेत्रों में पड़ सकता है।

राज्यों को विधायी अधिकार भी हैं, जिससे वे अलग से भी कानून का सृजन करते हैं, जो राज्य तक ही सीमित हैं लेकिन उन्हें असंवैधानिक नहीं माना जाता। वे संस्थाएं जाब्ता फौजदारी, जाब्ता दीवानी में भी संशोधन कर सकती हैं, जो कई व्यवस्थाओं के संबंध में है भी। इसलिए यह राज्य की अधिकार-सम्मत प्रणाली मानी गई है।

जिन व्यक्तियों के खिलाफ मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं उनका अभियोक्ता तो राज्य ही होगा। इसलिए वह किसी बंदी की माफी या रिहाई के संबंध में अगर निर्णय करता है तो चूंकि राज्य का संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल है, आदेश उसी के नाम से होता है। हालांकि जब तक विधिवत निर्वाचित सरकारें हैं तब तक उनके परामर्श के विपरीत राज्यपाल स्वयं कोई कदम नहीं उठा सकता, इसलिए वह सदन में जो अभिभाषण करता है वह भी निर्वाचित सरकारों द्वारा ही तैयार होते हैं।

बंगाल में तो ऐसी स्थिति आई थी जब एक अभिभाषण में राज्यपाल पर भी टिप्पणी की गई थी। लेकिन जब उन्होंने उसे नहीं पढ़ा तो यह सवाल उठा कि उसमें संशोधन करने का अधिकार राज्यपाल को नहीं है इसलिए यह अनुचित था।

राज्य नामक संस्था और उसके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए, यह प्रमुख प्रश्न है। केंद्र अगर किसी राज्य की व्यवस्था और उसके निर्णयों से संतुष्ट नहीं है तो उसके पास कई विकल्प हैं। वह राज्य से किसी प्रश्न पर रिपोर्ट मांग सकता है और उस पर अपनी राय भी बना सकता है, लेकिन कार्रवाई के लिए तभी सक्षम होगा जब रिपोर्ट में बताई गई स्थिति संविधान-सम्मत की परिभाषा में न आती हो। इसलिए केंद्र को यह अधिकार तो प्राप्त है कि वह राज्यपाल की रिपोर्ट न होने पर भी, इस निष्कर्ष पर पहुंच करकि उसे ज्ञात हुआ है कि अमुक राज्य की व्यवस्था संवैधानिक ढंग से संचालित नहीं हो पा रही है, इसलिए उस सरकार को बर्खास्त किया जा सकता है। देश में ऐसे कई प्रयोग हुए भी हैं।

वर्ष 1957 में निर्वाचित केरल की बहुमत वाली सरकार को कानून-व्यवस्था के नियंत्रण में विफलता के नाम पर ही बर्खास्त किया गया था। और 1977 में तो एक नया उदाहरण भी बना, जब लोकसभा के चुनावों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि अमुक राज्य में अब सरकार को जनता का विश्वास प्राप्त नहीं है और उन सरकारों के साथ विधानसभा को भंग करके नए चुनाव कराए गए थे। उत्तर प्रदेश में अयोध्या प्रकरण, जिसमें विवादित स्थल को ढहाया गया था, उसमें सहयोग के आरोप पर मध्यप्रदेश और हिमाचल की सरकारों को भी बर्खास्त किया गया था। जब यह प्रश्न उच्च न्यायालय में गया तो उसने इस बर्खास्तगी को अनुचित माना लेकिन तब तक इन राज्यों में नए निर्वाचन के फलस्वरूप नई सरकारें बन चुकी थीं। इसलिए पुरानी स्थिति बहाल नहीं हो पाई और यह निर्णय केवल कागजों और विचारों तक सीमित रह गया क्योंकि निर्वाचन को पलटना संभव नहीं था।

इन संवैधानिक जटिलताओं के फलस्वरूप केंद्र की इच्छा पूरी तरह से लागू हो पाना भी संभव नहीं है। इसलिए कश्मीर, जहां केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी सरकार की सहयोगी ही नहीं बल्कि अंग है, वहां किस निर्णय को सरकार का माना जाए? और जब तक वह मंत्रिपरिषद कायम है तब तक इसका दोष अकेले मुख्यमंत्री पर तो लग नहीं सकता। इसलिए इस स्थिति के बारे में उसे गंभीरता से सोचना होगा कि पहले कौन-सा अपेक्षित कदम उठाया जाए।

प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के समक्ष संवैधानिक बाध्यताओं के कारण सीमित विकल्प हैं, क्योंकि भाजपा की इच्छा या सरकार के निर्णयों का विरोध राजनीतिक हो सकता है लेकिन अंतत: कश्मीर में व्यवस्था कैसे चले यह निर्णय तो राज्य सरकार को ही करना है।

यह बात दूसरी है कि मोदी, मुफ्ती की सरकार बनवा कर एक प्रकार से फंस गए हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांगे्रस, जिन्हें विरोध की राजनीति करनी है, पीडीपी के नेताओं पर अधिकतम यही आरोप लगा सकते थे कि वे भाजपा का खेल बना रहे हैं।

लेकिन यहां तो इच्छाएं और कार्यक्रम सब मुफ्ती के हैं, सरकार में सहयोगी के रूप में बदनामी झेलना भाजपा के हिस्से में जा रहा है। दोनों दलों द्वारा स्वीकार किए गए न्यूनतम साझा कार्यक्रम में यह कहीं बंदिश नहीं है कि वे इसके अतिरिक्त संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह भाजपा से पूछ कर ही करेंगे।

अब इस मुश्किल में केंद्र की सरकार भी फंसी है। लेकिन मजबूरियां यही हैं कि विपरीत विचारों के बावजूद जब तक मोदी की सरकार है, तब तक केंद्र कोई विपरीत कदम भी तो नहीं उठा सकता। इसलिए पहले तो दो महीने की मशक्कत के बाद जिस लालच या मजबूरी में यह साझा सरकार बनी है उससे मुक्ति का प्रयत्न होगा। इस प्रकार मोदी के सामने कश्मीर में विकल्प बहुत सीमित हैं।

शीतला सिंह

 

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