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मलेरिया से मुक्ति का रास्ता

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि भारत में मलेरिया की वजह से हर साल बाईस हजार लोगों की मौत होती है, जबकि दो करोड़ लोग इसकी चपेट में आते हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: September 16, 2016 12:57 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

अपने मुल्क के लिए मलेरिया से मुक्ति की राह आसान नहीं दिख रही है। खासकर, मध्य भारत और आदिवासी क्षेत्रों में। आदिवासी क्षेत्रों में मलेरिया बीते पांच सालों से तीन से छह फीसद की रफ्तार से बढ़ रहा है। फेल्सिपेरम मलेरिया की अधिकता की वजह से दूर-दराज गांवों में स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है। अब तो भारत के शहरी क्षेत्र भी मलेरिया की गिरफ्त में आ चुके हैं। दिल्ली में पांच साल बाद हुई दो मौतों ने सरकार के कान खड़े कर दिए हैं। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में हर साल पच्चीस से अट्ठाईस लाख लोग मलेरिया की चपेट में आते हैं, जिनमें से करीब आठ सौ लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं। सरकारी रिकार्ड में सिर्फ वही मौतें दर्ज हो पाती हैं, जिनकी जानकारी सरकारी अस्पतालों और जांच केंद्रों से प्राप्त होती है। दूर-दराज के गांवों में मलेरिया से मरने वालों की सूचनाएं दब जाती हैं। 2014 में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने भारत में मलेरिया से मरने वालों की संख्या दो लाख तक बताई थी। पर भारत सरकार इसे खारिज करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि भारत में मलेरिया की वजह से हर साल बाईस हजार लोगों की मौत होती है, जबकि दो करोड़ लोग इसकी चपेट में आते हैं। भारत में नब्बे फीसद मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं। डब्ल्यूएचओ कई बार कह चुका है कि मलेरिया से मरने वालों और प्रभावितों की सटीक संख्या भारत सरकार संग्रह नहीं कर पाती है। इस मामले में उसका नेटवर्क बीते पैंतीस सालों से कमजोर पड़ा हुआ है। जब तक भारत सरकार इस दिशा में मुस्तैद नहीं होगी, मलेरिया पर नियंत्रण या फिर उसे जड़ से उखाड़ फेंकना काफी कठिन है।

श्रीलंका यों ही नहीं मलेरिया मुक्त देश घोषित हुआ है। उसने जमीनी स्तर पर काम किया है। दक्षिण-पूर्व एशिया में मालदीव के बाद श्रीलंका दूसरा मलेरिया मुक्त देश है। श्रीलंका में अंतिम बार मलेरिया का प्रकरण अक्तूबर 2012 में आया, जो नवंबर में शून्य हो गया। उसके बाद साढ़े तीन-चार साल में एक भी मामला वहां उजागर नहीं हुआ है। दक्षिण एशिया में मलेरिया से पचहत्तर फीसद में से तिहत्तर फीसद मौतें भारत में होती हैं। यह बात अलग है कि भारत सरकार ने 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स योजना के तहत आठ प्रमुख बिंदुओं के एक मसौदे पर कार्य शुरू किया है, जिसमें मलेरिया को भी विशेष रूप से शामिल किया गया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र भी अपना मकसद पूरा नहीं कर पा रहा है। वह अमेरिका जैसे देशों की कठपुतली बना हुआ है। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में तीन साल पहले तक सिंगल ड्रग के इस्तेमाल से मच्छरों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी, लेकिन अब मल्टी ड्रग थेरेपी के इस्तेमाल से प्रतिरोधक क्षमता घटाने में काफी कामयाबी मिली है। हालांकि सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि दवाओं के असर को जानने के लिए हर साल पचास से सौ मरीजों का अध्ययन किया जाता है। भारत सरकार भले कुछ भी दावे करे, लेकिन सच्चाई यह है कि हर आठ भारतीयों में से एक मलेरिया की गिरफ्त में आ सकता है। एनवीबीडीसीपी के आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब तेरह करोड़ लोगों में मलेरिया के लक्षण देखे गए हैं। एक करोड़ लोगों में मलेरिया की पुष्टि हुई है।

भारत में मलेरिया 1970 के दशक में तेजी के साथ लौटा। 1980 के दशक से एक नए प्रकार का मलेरिया प्लाज्मोडियम फेल्सिपेरम भारत में तेजी से बढ़ रहा है। 2009 में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा ने करीब बीस लाख मलेरिया रोगियों की जानकारी दी। शोधकर्ता मानते हैं कि भारत में ऐसे रोगियों की संख्या सात से आठ करोड़ प्रति वर्ष हो सकती है। 1953 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया जो घरों के अंदर डीडीटी के छिड़काव तक केंद्रित था। राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम 1958 में शुरू किया गया। 2005 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन भी शुरू किया। मलेरिया निवारण और उन्मूलन कार्यक्रम की ही उपलब्धि है, जो 1995 से 2014 की अवधि में इस रोग से ग्रस्त होने वालों की संख्या में तीन गुना कमी हुई है। लेकिन इसके सहारे मलेरिया उन्मूलन के मामले में भारत अपनी सफलता का डंका नहीं बजा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि देश की मात्र ग्यारह फीसद आबादी मलेरिया की आशंका से मुक्त क्षेत्र में निवास करती है। सड़सठ फीसद आबादी उन इलाकों में रहती है, जहां दस में से एक व्यक्ति मलेरिया से पीड़ित है। जबकि बाईस फीसद आबादी के लिए यह आंकड़ा और ज्यादा है। देश में मलेरिया से मुक्ति का लक्ष्य आगे खिसक कर 2030 हो गया है।

मलेरिया के जीवाणु पलट कर हमला करने में काफी माहिर हैं। यह दुनिया भर में हर साल पच्चीस से पचपन करोड़ लोगों पर हमला करके आठ से नौ लाख लोगों की जान ले रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में हर साल मलेरिया से करीब पच्चीस लाख लोग प्रभावित होते हैं, जिनमें हर साल एक हजार लोगों की मौत होती है। आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड और ओड़ीशा जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा मलेरिया का प्रभाव बीते बीस साल से देखने को मिल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अगले पंद्रह से अट्ठारह साल तक फंड तिगुना करना पड़ेगा तभी 2030 तक भारत मलेरिया से मुक्त हो पाएगा। लेकिन फंड को लेकर भारत में अभी मंथन होना बाकी है। एक सर्वेक्षण एजेंसी ने भारत में मलेरिया उन्मूलन से संबंधित तमाम आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद पाया कि 2014 में मलेरिया नियंत्रण के बजट का नब्बे फीसद हिस्सा केवल प्रशासनिक कार्यों में खर्च हो गया। मेडिकेटेड मच्छरदानी और छिड़काव के लिए दस फीसद बजट बचा। भारत में इस बीमारी के चलते हर साल करीब सोलह हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। सर्वेक्षण एजेंसी ने माना है कि ऐसे फंड में ज्यादातर वित्तीय अनियमितताएं होती हंै। मलेरिया पर काबू पाने के प्रयासों में कम से कम नौ अरब नब्बे करोड़ डॉलर की आवश्यकता है। मलेरिया बच्चों के विकासशील मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचाता है। बच्चों में ज्यादातर दिमागी मलेरिया होने की संभावना बनी रहती है और ऐसा होने से दिमाग में रक्त की आपूर्ति कम हो जाती है। गर्भवती महिलाओं को भी मलेरिया से काफी नुकसान पहुंचता है। इससे गर्भ की मृत्यु, निम्न जन्म भार और शिशु मृत्यु की संभावना प्रबल होती है।

शोधकर्ताओं की मानें तो एलोपैथ, होम्योपैथ और आयुर्वेद की दवाइयां भी ज्यादा कारगर साबित नहीं हो रही हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि दवा को लेकर भी अब नए अनुसंधान की जरूरत है। कंबोडिया से लगभग आठ सौ किलोमीटर दूर थाइलैंड और वर्मा की सीमा पर मलेरिया के ऐसे परजीवी मिले हैं, जिन पर दवाओं का तीस फीसद भी असर नहीं हो रहा है। इस बारे में टेक्सास बायोमेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के डाक्टरों का कहना है कि इससे मलेरिया से निपटने के उपायों को काफी तगड़ा झटका लगेगा। कई नए स्थानों पर भी इसका प्रकोप बढ़ेगा। नए पाए गए परजीवी दूसरी प्रजातियों से आनुवंशिक रूप से काफी अलग हैं। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने एक नया उपकरण तैयार करने का दावा किया है। यह उपकरण ठीक उसी तरह काम करेगा जैसे शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों का ब्रीथेलाइजर टेस्ट किया जाता है, हालांकि इस पर अभी काम बाकी है। अगर सफल हो गया तो इसमें मौजूदा जांच के तरीकों की अपेक्षा बहुत कम खर्च आएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर साल छह लाख लोग मलेरिया के चलते इसलिए मर जाते हैं कि इनमें अधिकतर की जांच ही नहीं हो पाती। इस उपकरण के सफल हो जाने पर सांस की जांच की आसान और सस्ती तरकीब इस समस्या से निजात दिला सकती है।

मलेरिया के लगातार बढ़ते प्रकोप के बीच सरकारी तंत्र की लचर कार्यप्रणाली जिस तरह से अपने देश में आमजन के जीवन पर भारी पड़ रही है, वह न केवल बेहद चिंताजनक, बल्कि भविष्य के प्रति गंभीर चेतावनी है। सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय के स्तर पर इस भयावह स्थिति को गंभीरता से न लिया जाना और भी अफसोसजनक है। सबसे बड़ी बात यह कि सरकारी आंकड़े न तो वास्तविक तस्वीर सरकार और जनता के सामने रख पा रहे हैं और न ही मलेरिया की रोकथम और मरीजों के उपचार की दिशा में कोई ठोस पहल होती दिख रही है। सरकार को सबसे पहले इस महामारी की सही तस्वीर सामने लाने की दिशा में कारगर कदम उठाने की जरूरत है। अचरज इस बात को लेकर भी है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग के पास इसके लिए पर्याप्त कानूनी और संवैधानिक अधिकार हैं। लेकिन उनके उपयोग और अनुपालन की दिशा में किसी भी स्तर पर कोई ठोस पहल होती नहीं दिख रही है। यह स्थिति निस्संदेह सरकार की इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े करती है। सरकार को जन-स्वास्थ्य अधिनियम और क्लीनिकल एस्टेबलिशमेंट एक्ट का पालन सुनिश्चित करने की जरूरत है। खासकर केंद्र सरकार और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करते हुए इस महामारी के खिलाफ समय रहते कारगर अभियान छेड़ना भी बेहद जरूरी है, ताकि इस त्रासदी से लोगों को निजात दिलाई जा सके।

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